फेसबुक पर छाया विवेक तिवारी की हत्या का केस, पढ़िए एक पत्रकार की आंखें खोल देने वाली पोस्ट

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ये तस्वीरें विवेक तिवारी की बेटी की हैं. वो रोज़ पापा का इंतज़ार करती थी ताकि उसके पापा आएं तो पप्पी दे सके. सरकार की हत्यारी नीतियों के कारण उसके पापा अब कभी घर नहीं आएंगे. विवेक तिवारी पहला शख्स है जिसे पुलिस ने बिना कसूर मार दिया. वो ऐसा आखिरी शख्स भी नहीं है. यूपी की पुलिस खून से खेलने के अभियान पर लंबे समय से है. इस बार बड़ा आदमी था इसलिए लीपा-पोती नहीं हो सकी. उसे क्रिमिनल साबित करना भी आसान नहीं था.


कल्पना कीजिए किसी प्रदेश में सरकार बदलती है और उसके बाद अचानक बदमाशों के हौसले बढ जाते हैं. पुलिस उनसे आत्मसमर्पण करने को कहती है और वो गोली चलाने लगते हैं और जवाबी गोलीबारी में वो मारे जाते हैं. भैया ऐसी कहानिया कई गुना ऐसे ही थोड़ी बढ़ जाती है. कुछ तो बदला होगा? मेरी सरकार मेरे देश के नागरिकों को मार रही है. हत्या कर रही है. इन हत्याओँ का महिमामंडन ऐसे किया जाता है कि जैसे कोई क्रांति हो रही हो. उधर भक्त समाज मुदित होकर तालियां बजाने लगता है. ये भूलकर की वो जनता पहले हैं भक्त होकर भी जनता ही रहेगा. ये समझे बगैर कि किसी मनमानी गोली का शिकार वो भी हो सकता है. कोई कभी मारकर उसे भी बदमाश घोषित कर सकता है.<img
जिन्होंने एनकाउंटर के नाम पर नृशंष हत्याओं की वकालत की थी वो इस मासूम बच्ची का चेहरा देखें. कल्पना करें कि कितनी ऐसी ही मासूम बच्चियां हत्यारी सरकार ( जी हां पुलिस सरकार का ही हिस्सा होती है नागरिकों का नहीं ) की नीतियों के कारण अपने पिता का इंतज़ार करते करते उदास बैठी रही होंगी. कितनी बच्चियों के आंसू सूख भी नहीं पाते होंगे. कितनी बच्चियों को उनके स्कूल में दूसरे बच्चों ने कहा होगा कि तेरे पापा मर गए. कितनी बच्चियों के पास अगल महीने की फीस के पैसे नहीं रहे होंगे . किसी के बाप में दम हैं तो इन मासूमों को पापा लौटा दे. वरना डूब मरे और संकल्प ले कि फिर किसी बेकसूर की हत्या पर तालियां नहीं पीटेेगा. थू है ऐसी मूर्खतापूर्ण राजनीतिक प्रतिबद्धता पर.

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आप जानते हैं कि यूपी पुलिस ने किसी के सिर पर भी इनाम घोषित करने की छूट एसपी लेवल के अफसर को दे रखी है. जिसे चाहते हैं उठा लाते हैं. इनाम घोषित होता है. दूसरे दिन एनकाउंटर में इनामी अपराधी मारा जाता है. ये कपोल कल्पना नहीं है. कई ऐसे एनकाउंटर सामने आ चुके हैं.

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नोएडा के जिम ट्रेनर को एक एएसआई ने गोली मारी, कहा प्रमोशन के लिए एनकाउंटर कर रहा हूं. बॉस को फोन पर सूचना दी. मामला इसलिए बड़ा नहीं बना क्योंकि वो उच्चवर्ग का व्यक्ति नहीं था. अभिजात्य की जान पर नहीं बनी थी. अलीगढ़ के दो 24 साल के मज़दूर मुठभेड़ में मार दिए गए. मामला फिर भी नहीं बना. परिवार बिलखता रह गया. उन्हें इनामी अपाराधी करार दिया गया था. गैगस्टर बोला गया उन्हें. कोई रिकॉर्ड नहीं लेकिन गैंगस्टर कैसे भैया ?
ग्रेटर नोएडा में सुमित गुर्जर के उपर 50 हज़ार का इनाम घोषित करते हए उसे पुलिस ने मार दिया. कहा गया कि वो हिस्ट्रीशीटर था. इनामी बदमाश था. लेकिन परिवार वालों का कहना था कि उस पर कभी थप्पड़ मारने का केस तक नहीं लगा. इनामी कैसे हो गया. गांव के लोग थे . सड़कों पर जाम लगाया तो मीडिया भी पहुंचा मानवाधिकार ने नोटिस भेजा जांच चल रही है. लेकिन सोशल मीडिया पर लोग मुठभेड़ का बचाव करते रहे . कहते रहे कि योगी सरकार अपराध मुक्त समाज बना रही है. क्या देश में अभिजात्य की जान ही कीमती है. बड़ी जात हो. बड़ी जात के साथ मालदार भी हो, उंचे पद पर हो तो हम सब की आत्मा झंकार मारने लगती है. विवेक तिवारी के मौके पर जितना हम सब उग्र है पहले नहीं हुए. अब भी मौका है. सभी मुठभेड़ों की न्यायिक जांच हो और राज्य से बाहर इन मामलों का ट्रायल हो. ये भी पता लगाया जाए कि अचानक ये वैधानिक हत्याएं कैसे बढ़ गई . किसके आदेश पर लोग मारे जा रहे थे और हत्या कि बाद किसे रिपोर्ट किया जा रहा था.

 

1 टिप्पणी

  1. योगी साहिब कब तक निर्दोष व्यक्तियों की हत्या से अपने हाथ रंगते रहोगे। इस क्नॉकिंग न्यूज़ में जिन व्यक्तियों को मारने का उल्लेख किया गया है, उनकी भी जांच के आप आदेश दीजिये। आपको सत्यता का ज्ञान हो जाएगा। विवेक तिवारी की मासूम बच्चों की शक्ल देख कर ह्रदय नहीं पसीजता। बड़ा दुःख हुआ, निर्मम हत्या देख कर।

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