दिल्ली में शिक्षकों की परीक्षा में पूछा- ‘चमार’ का स्त्रीलिंग क्या होगा ?

हाल ही में गठित DSSSB(दिल्ली राज्य सबऑर्डिनेट स्टाफ सेलेक्शन बोर्ड) की शिक्षक चयन परीक्षा में एक बेदह आपत्ति जनक सवाल पूछा गया है. इस सवाल ने हलचल मचा दी है. मामला सीधे सीधे एससीएसटी एक्ट का है और घटिया मानसिकता है. लेकिन दिल्ली सरकार के मंत्री राजेन्द्र पाल गौतम ने इस पर खेद जताकर फर्ज निभा लिया है.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक हिंदी भाषा और बोध अनुभाग के प्रश्न पत्र में पूछे गए एक सवाल के उत्तर में कथित तौर पर पूछा गया है कि :

“पंडित का विलोम पंडिताइन तो चमार का विलोम क्या होगा ?

जिसके उत्तर में चार विकल्प थे ….

  1. चमाराइन
  2. चमारिन
  3. चमारी
  4. चामिर”

 

दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री राजेन्द्र पाल गौतम ने इस पर चिंता जताई है. उन्होंने कहा कि कि यह बेहद ही गंभीर है और किसी भी सूरत में इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.

प्रस्तुत संदर्भ में DSSSB के पास यह विकल्प था कि वह हिंदी की परीक्षा के प्रश्नपत्र में हिंदी साहित्य के वाल्मिकी, तुलसी, सूर, कबीर, रविदास दिनकर, मैथिलीशरण, निराला आदि की हिंदी से प्रश्न पूछता. पर जाति आधारित छिछले सवाल पूछकर DSSSB ने अपनी, भारतीय संविधान की, हिंदी की, और इस देश की संस्कृति की गरिमा को चोट पहुँचाई है .

दिल्ली सरकार के मुताबिक सर्विस डिपार्टमेंट अभी भी उपराज्यपाल के अधीन है और इसी डिपार्टमेंट के DSSSB विभाग द्वारा ली जाने वाली प्राइमरी टीचर की प्रतियोगिता परीक्षा के प्रश्न संख्या 61 पर पूछे जाने वाले सवाल का क्या मतलब है.

जिन शिक्षकों पर बच्चों के उज्जवल भविष्य की नींव डालने की जिम्मेदारी होती है, अगर उसकी प्रतियोगिता परीक्षा में इस तरह का सवाल पूछा जा रहे हों तो आने वाले समय में शिक्षक भी तो इसी तरह के पाठ पढ़ाएंगे.

इससे देश उसी दिशा की ओर जाता हुआ प्रतीत हो रहा है जैसा आज से हज़ार साल पहले के सामंतवादी युग में था जहां जातियों में बांटकर जनता को वर्ण व्यवस्था में बांधकर उन्हें प्रताड़ित किया जाता रहा हो.

ऐसे समाज की स्थापना फिर से होना बेहद ही चिंताजनक स्थिति है देश के लिए, और मुझे विश्वास है कि मुख्य सचिव ऐसे कुकृत्यों की भर्त्सना भी करेंगे तथा कड़ी कार्रवाई भी.