क्या जान बूझकर अर्थव्यवस्था को डुबाया जा रहा है? नैगेटिव कौन?

जग्गी वासुदेव को देखिए. वो भी दूसरे भक्तों की तरह राष्ट्रभक्त हैं. राष्ट्रभक्त जो अगर कोई सरकार से किसी भी चीज़ पर जवाब मांगे तो कहते हैं कि देश की बदनामी हो रही है. कहते हैं कि देश मोदी का विरोध करते करते विरोधी देश का विरोध करने लगे हैं. चलते फिरते कोई भी कुछ कहे तो उसे मोदी विरोध घोषित कर दो. इससे लगेगा कि पूरा देश सिर्फ मोदी के बारे में बात करना चाहता है. लेकिन सरकार और उसके पिट्ठू कुछ भी करे तो देश की बदनामी नहीं होती.


दावोस में विश्व आर्थिक सम्मेलन या कहें कि वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की बैठक चल रही है. दुनिया भर के निवेशक वहां आए हैं और कई तरह के पेड अनपेट पुरस्कार भी बांटे जा रहे हैं. पहले हमारे देश में भी बड़ा पुरस्कार वहां से आ चुका है. खैर जग्गी वासुदेव इस विश्व इकोनोमिक फोरम में पहुंच गए हैं. क्यों गेए हैं पता नहीं. वो न तो व्यापारी हैं. न निवेशक न किसी सरृकार के प्रतिनिधि. और ये साहब वहां जाकर कह रहे हैं कि जिस देश में विरोध के दौरान बसें जलती हैं वहां कौन निवेश करेगा.

दावोस के मंच पर इस बयान का क्या मतलब समझा जाए. क्या जग्गी वासुदेव निवेशकों को भड़का रहे हैं कि भारत मत आना. क्यों ये ड्रामा चल रहा है. क्या भारत में नये कानून के खिलाफ आंदोलनों से इतना बौखला गए हैं कि निवेशकों से कह रहे हैं कि भारत न आएं.


समझ नहीं आ रहा कि ये देशभक्त हैं या देश के दुश्मन. हाल ही में सीएए के मामले पर मलेशिया ने कोई टिप्पणी कर दी. वहां से खाद्य तेल का आयात बंद कर दिया. नतीजा ये हुआ है कि तेल बेतहाशा मंहंगे हो गए हैं और तो और अडानी साहब की तो लॉटरी ही निकल गई है. वैसे तो पिछले कई साल से दैनिक लॉटरी के विजेता हैं लेकिन ये क्या था. तेल निर्यात पर ज्यादा पैसे खर्च करना ऐसी मंदी में मंद बुद्दि नहीं तो क्या है. इतनी अकड़ किस काम की.


अमेजॉन के मालिक और दुनिया के सबसे अमीर आदमी जैफ बेजोस निवेश करने आए तो पीएम ने उनसे सीधे मुंह बात नहीं की. देश का वित्त मंत्री बिलावजह हड़का रहा था . क्यों भैया. आन दो ना पैसे लेकर आ रहा है. अगर उनके स्वामित्व का अखबार वाशिंगटन पोस्ट मोदी जी के खिलाफ लेख छाप रहा है तो ये उस संपादक की आजादी है. वाशिंगटन पोस्ट के संपादक पर दबाव डालने के लिए आप कमजोर अर्थ व्यवस्था को और कमज़ोर करेंगे.


खैर ये तो सरकार का आर्थिक फ्रंट पर दोहरा चरित्र है. अब बताते हैं कि राजनीतिक फ्रंट पर क्या हाल है.
आदरणीय मोदी जी के परम आदरणीय समर्थक अक्सर एक शब्द का इस्तेमाल करते हैं. ये शब्द है नैगिटिविटी यानी नकारात्मकता. जिन्होंने मनोविज्ञान पढ़ा है वो जानते हैं कि जिस संदर्भ में नेगेटिविटी शब्द इस्तेमाल किया जाता है वो यहां लागू ही नहीं होता. लेकिन फिर भी ये सदस्य जिसे नकारात्मकता कहते हैं उसे ही मान लिया जाए. तो फिर उन्हें दोबारा से कुछ भाषण सुनना चाहिए. खुद प्रधानमंत्री की भाषा नकारात्मकता से भरी होती है. उनके भाषण प्रधानमंत्री के भाषण न होकर विपक्ष के नेता के भाषण होते हैं जिनमें वो अपने कामकाज की बात करने से ज्यादा विरोधियों के पर भ़ड़कने और तो और उनके प्रति नागरिकों को भड़काने का काम करते.

अपने ही देश के लोगों के प्रति नफरत से भरी हुई और भड़काऊ. क्या ये प्रधानमंत्री की भाषा है कि देश में टुकड़ा टुकड़ा गैंग काम कर रहा है. प्रधानमंत्री कहते हैं कि विपक्ष पाकिस्तान की भाषा का इस्तेमाल कर रहा है.
उनके मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथकी भाषा में एक लोकतांत्रिक शासक का सौजन्य नहीं होता उनकी भाषा बेहद अकड़वाले किसी अहंकारी व्यक्ति की होती है. वो लोगों को भड़काते नजर आते हैं. चुनौती देते नजर आते हैं और विरोध करने वालों के प्रति दंडात्मक रवैया रखते हैं.

चाहे डॉक्टर कफील का मामला हो या सीएए के खिलाफ लोगों के प्रदर्शन का मामला, मुख्यमंत्री की भाषा और व्यवहार में कतई बड़प्पन नहीं दिखता. ये एक मुख्यमंत्री की भाषा है कि वो आंदोलन कर रहे लोगों को कहे कि उन्होंने महिलाओँ को सड़क पर बैठा रखा है. और खुद घर में छिपे बैठे हैं.
अमित शाह की भाषा का मैं यहां जिक्र नहीं करूंगा क्योंकि आपकी भी पढ़ने की सीमा है. लेख बेहद लंबा हो जाएगा. बाकी लोग बात करने लायक नहीं हैं. क्या क्या बकते हैं आप अखबारों में पढ़ते ही होंगे. अब ये कौनसी कंपनी की सकारात्मकता है ये लोग ही जानें. (फेसबुक पर आजतक के डिप्टी एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर गिरिजेश वशिष्ठ का लेख)