केजरीवाल के इस कदम पर तिलमिला क्यों रहो हो नेता जी, पढ़िए तीखा लेख

ये लेख पत्रकार गिरिजेश वशिष्ठ का है जो आजतक मेें वरिष्ठ पद पर हैं. फेसबुक पर उन्होंने निजी राय के तौर पर ये लेख लिखा है. दिल्ली में केजरीवाल ने महिलाओं को भाई दूज के दिन से मुफ्त बस यात्रा देने का एलान किया है. इससे पहले वो एक हद तक इस्तेमाल होने वाले बिजली और पानी को भी मुफ्त कर चुके हैं. इससे राजधानी की हवाओं में मिर्च घुल गई है. नेता तिलमिला रहे हैं.

सबको लगता है कि केजरीवाल मुफ्त की सेवाएं लुटाकर वोट कमा रहा है. नेताओं का कहना है कि ये पैसा विकास का पैसा है जो मुफ्तखोरी में लुटाया जा रहा है. इस विरोध में वो पार्टियां भी हैं जो देश भर में उज्ज्वला योजना और बेटी की शादियों में धन देने की नीतियों पर तालियां पीटती रही हैं. ये तो हुई दोमुहे पन की बात. लेकिन इससे भी गंभीर है गरीबों के लिए पैसा खर्च होने पर छाती पीटने की प्रवृति. नेताओं की ये बीमारी कांग्रेस की नयी आर्थिक नीति के जमाने से शुरू हुई थी अब इतनी बढ़ गई है कि देश के असली मालिकों को मिलने वाली हर सुविधा फिजूलखर्ची लगती है और अमीर कॉर्पोरेट और उद्योगपतियों को मिलने वाली सुविधाएं देशहित का सौदा.

दिल्ली में जिस विकास की बात की जा रही है वो विकास है सड़क और पुल बनाने का विकास. गरीब महिला मुफ्त में दफ्तर जा रही है तो उससे विकास रुक रहा है. ये कौन सा विकास है. ये विकास है कि दिल्ली में बड़े बड़े फ्लाईओवर नहीं बन रहे. दिल्ली में नयी सड़कें नहीं बन रहीं. चमचमाती सड़कें किसे चाहिए उन्हें जिनके पास चमचमाती कारें हैं. वो कारें जो दिल्ली के लिए एक आपदा बन चुकी हैं. जिनको खड़ा करना एक बड़ा मसला है और जिनके चलने से विदेशी मुद्रा का भारी बोझ़ देश पर पड़ता है. जिन कारों के होने भर से हर साल दिल्ली की सांसें रुकने लगती हैं और प्रदूषण से हए स्ट्रोक के कारण बड़ी संख्या में लोग तत्काल मारे जाते हैं. लंबे समय तक बीमार होकर मारे गए लोगों की संख्या इससे कहीं ज्यादा है. 

मैं खुद भी कार ही चलाता हूं और इसेक खिलाफ नहीं हूं लेकिन देश के सारे संसाधन सिर्फ देश की नकचढ़ी और अमीर आबादी को दे देना कहां की समझदारी है. कुछ लोग कह सकते हैं कि ये लोग टैक्स पेयर हैं. ये भ्रम भी पूंजीवादी विचार के लोग फैलाते रहते हैं. वो ये बताने की कोशिश करते हैं कि सारा टैक्स इनकम टैक्स देने वाले ही देते हैं. जबकि गरीब कुछ नहीं देता . जबकि हकीकत ये है कि आयकर देने वाले लोगों की आय का बड़ा हिस्सा उनकी सेविंग्स में बच जाता है. और ये बचत पूरे टैक्स देने के बाद होती है. लेकिन उस गरीब का क्या जो अपनी आमदनी की पाई पाई खर्च कर देता है. यानी वो अपनी शत प्रतिशत कमाई पर टैक्स देता है. ये टैक्स भले ही जीएसटी की शक्ल में हो या किसी और शक्ल में. यानी वो अपनी 100 फीसदी आय पर टैक्स देते हैं तो हम अपनी 70 फीसदी आमदनी से ज्यादा पर टैक्स नहीं देते. ज्यादा अमीर लोग तो अपना धन भी विदेशों में जाकर खर्च करते हैं.

लेकिन विकास के नाम पर स्टील के बस स्टॉप लगा देना, सड़क के डिवाइडर चमचमाते स्टेनलेस स्टील के लगा देना, चमचमाते मार्ग प्रदर्शक खरीदना. स्ट्रीट लाइट तरह तरह के डिजाइन की लगाना विकास है और जो आम लोगों के जीवन स्तर को बेहतर करने वाली नीतियां हैं वो विकास नहीं है. मानव विकास विकास नहीं है. पहले से ही चमचमाती सड़कों को बार-बार बनाना विकास है. कई इलाकों में तो बार बार होने वाले इस फर्जी विकास से मकान नीचे और सड़कें ऊपर हो जाती है. 

लेकिन नेता चाहते हैं कि प्राथमिकता वही हों. बाबा रामदेव को अरबों की जमीन कौड़ियों में दे दो. एसईज़ेड के नाम पर देश की संपदा खैरात में बांट दो. देश के सबसे बड़े अमीर. इस लेख के अंत में आपको बताऊंगा कि बाबा रामदेव को कहां कितनी ज़मीन मिली है.

देश में खेल के क्षेत्र में काम करने वाले एक से एक धुरंधर लोगों और अर्जुन अवार्ड और द्रोणाचार्य अवार्ड से सम्मानित खेल विभूतियों को छोड़कर जब नीता अंबानी अंतरराष्ट्रीय ओलिंपिक समिति का सदस्य बनाया जाता है तो इन नेताओं के मुंह से आवाज़ ही नहीं निकलती. उन्हें Y कैटेगरी की सुरक्षा दी जाती है लेकिन कोई आवाज़ कहीं से नहीं उठती.

1230 एकड़ ज़मीन अकेले बाबा रामदेव को दी जा चुकी है. अडानी को देश के हवाईअड्डे कौड़ियों के मोल सौप दिए गए हैं. लालकिला डालमिया के पास है लेकिन एक झुग्गी अगर किसी गरीब के पास है तो इन नेताओं की छाती पर सांप लोटता है.

अगर दिल्ली में बिजली मुफ्त मिल रही है, पानी मुफ्त मिल रहा है या फिर बस यात्रा महिलाओं को मुफ्त मिल रही है तो उससे भी कहीं न कहीं देश की अर्थव्यव्स्था को ही तो फायदा है. कम दाम में महिला कर्मचारी फैक्ट्रियों में काम करने को मिल सकेंगी. बचे हुए पैसे लोग बाजार में खर्च करेंगे तो इकोनॉमी बढ़ेगी और तो और टैक्स की आमदनी भी सरकार को ही होगी.

लेकिन इस रोज की दस बीस रुपये की मुफ्त की बस यात्रा पर रुदन क्रंदन करने वालों से पूछिए कि देश के अमीरों के 1.88 लाख करोड़ रुपये का कर्ज माफ कर दिया गया या उस पैसे को डूबत खाते में डाल दिया गया तो वो कहां थे. चुप क्यों थे.

अब आपको बताते हैं कि 1230 एकड़ ज़मीन बाबा रामदेव को कहां मिली

पतंजलि आयुर्वेद को असम के तेजपुर में हर्बल और मेगा फ़ूड पार्क के लिए 150 एकड़ ज़मीन दी जा चुकी है. लेकिन इकोनॉमिक टाइम्स के मुताबिक बाबा रामदेव ने असम के उद्योग मंत्री चंद्र मोहन पटवारी से मुलाक़ात कर 33 एकड़ ज़मीन और मांगी है.

1,200 करोड़ रुपए के इस पार्क में 10 लाख टन सालाना क्षमता की मैन्युफ़ैक्चरिंग इकाई होगी. ये इस साल मार्च में पूरी तरह ऑपरेशनल हो जाएगी.

उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश सरकार ने पिछले साल नवंबर में पतंजलि आयुर्वेद को ग्रेटर नोएडा में 2,000 करोड़ रुपए का फ़ूड पार्क बनाने की इजाज़त दे दी है.

और साथ ही यूनिट के लिए यमुना एक्सप्रेसवे पर 450 एकड़ ज़मीन देने पर भी सरकार राज़ी हुई. ऐसा कहा जा रहा है ये इकाई पूरी क्षमता तक पहुंचने के बाद सालाना 25 हज़ार करोड़ रुपए के उत्पाद तैयार करेगी.

मध्य प्रदेश

शिवराज सिंह चौहान के मध्य प्रदेश ने भी बाबा रामदेव की पतंजलि आयुर्वेद को अपने यहां खींच लिया है.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक पतंजलि राज्य के धार ज़िले में 500 करोड़ की फ़ूड प्रोसेसिंग यूनिट लगाने की दिशा में बढ़ रही है. इसके लिए बाबा रामदेव की कंपनी को 400 एकड़ ज़मीन दी जाएगी.

महाराष्ट्र

इसके अलावा नागपुर में पतंजलि मेगा फ़ूड और हर्बल पार्क की आधारशिला रखी जा चुकी है. ये फ़ूड पार्क 230 एकड़ में फैला होगा. ज़ाहिर है, यहां से पतंजलि आयुर्वेद को मध्य और पश्चिमी भारत के प्रमुख बाज़ारों तक पहुंचने में मदद मिलेगी.

पीटीआई के मुताबिक मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस ने कहा था कि पतंजलि बिड देने वाली इकलौती कंपनी थी. इस सौदे में ज़मीन 25 लाख रुपए प्रति एकड़ दी गई.