क्या देश पर मोदी जी का नहीं इन लोगों का राज है ?

चिदंवरम का मामला देखिए बेटा लाइजनिंग की दुकान चलाता है. लाइजनिंग का काम मतलब मोटी रकम लेकर सरकारी काम करवाना.  बाप मंत्री है. बाकी समझाने की ज़रूरत नहीं है.  अमरसिंह के टेप याद कीजिए. अनिल अंबानी खुद अपनी कंपनी में ठेका दिलवाने के लिए अमर सिंह से दलाली लेने को कह रहा है. पीटर मुखर्जी अपना चैनल खोल रहा है. पैसा विदेश से ला रहा है. कानूनन रोक है तो क्या वो पीछे के रास्ते से काम कर रहा है. लेकिन वो पैसे लगाकर हर हाल में एक टीवी चैनल क्यों खोलना चाहता था.

दस में से 7 नए खुलने वाले चैनल अपने कर्मचारियों को वेतन तक नहीं दे पाते हैं फिर इन्हें क्या खुजली थी. कुछ साल पहले हमने देखा कि कैसे एक टीवी चैनल का संपादक ब्लैकमेलिंग करके करोड़ों मांग रहा था और तिहाड़ में गया. हमने टाटा राडिया टेप भी सुना. हम रोज़ देखते हैं कि फलां उद्योगपति को हवाई अड्डे दे दिए गए.

इन उद्योगपतियों के करोडों के कर्जे माफ कर दिए गए. एक बैंक की चेयरमेन डूबती हुई कंपनी को लोन देती है और उस कंपनी से कहती है कि पति की लगभग फर्जी कंपनी के खरीद ले. कैसे मुफ्त में कुछ खास लोगों को कोयला खदानें बांट दी गईं. देश के कुछ उद्योगपति देश की जिस चीज़ पर हाथ रख देते हैं उनकी हो जाती है. भले ही वो कितनी भी अहम चीज़, ज़मीन या नीति क्यों न हो. हमने देखा कि कैसे एक दलाल टाइप का नेता फोन पर अकड़कर बात करता है और फिल्मी हस्तियों से लेकर उद्योगपति तक उसको सलाम बजाते हैं.

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में कहा था कि लुटियन दिल्ली की दुनिया अलग है. उसे समझने में सालों लग गए और अभी भी वो समझ ही रहे हैं. उन्होंने प्रणव मुखर्जी की इसके लिए तारीफ भी की थी और बाद में कांग्रेस के मुखर्जी को भारत रत्न भी मिला.

इन सभी घटनाक्रमों को देखने के बाद एक चीज़ साफ हो जाती है बल्कि कहें कि थोड़ा बहुत ही सही हम आसानी से समझ सकते हैं कि देश पर बेईमान दलाल भ्रष्ट और दुष्ट लोग राज करते हैं. ये सब बड़े लोग हैं और एक दूसरे से मिल जुलकर रहते हैं. ये भारत माता के दामन का एक क रेशा एक दूसरे को बेच रहे हैं. इन्हें न तो देश की धरती से प्यार है न देश की सीमाओं से. ये नेता, अफसर, व्यापारी, कथित पत्रकार (असली लोग काम कर रहे हैं) सिर्फ भारत मां की नोच खसोट में लगे हैं. कड़वा सच ये है कि इनका देश पर राज है. ये देश के राजा है. किसी की भी सरकार आ जाए. इनका राज चलता रहता है.

हम जैसे लोग इसी भ्रम में रहते हैं कि मेहनत और ईमानदारी से फर्श से अर्श तक जाया जा सकता है लकिन जब देश इस तरह चलेगा तो क्या कोई कह सकता है कि हम लोकतंत्र हैं. इस लोकतंत्र में लोक का स्थान शोषित होने, सत्ताधीशों की सनक झेलने और टैक्स दे देकर इस तरह के लोगों का खजाना भरने तक सीमित है. आम लोगों की हर ज़रूरत से सरकार हाथ खींच रही है और लगातार ये इंतजाम कर रही है कि जो चीज़ें सरकार को टैक्स के बदले देनी चाहिए उनके बदले आप इस अभिजात्य वर्ग को भुगतान करें.

आप सरकार बदलकर भी कुछ नहीं कर सकते. ये लोग ताकत में हैं और ताकत में थे. रहेंगे या नहीं ये हमारे हाथ में है. इनके ऊपर छोड़ेगे तो यही होगा. 20 हज़ार करोड़ रुपये का चंदा राजनीतिक पार्टियों को ये लोग ऐसे ही नहीं देते. इससे कई गुना पैसा रिश्वत में नेताओं को ऐसे ही नहिं दिया जाता. सरल शब्दों में इस रकम के बदले देश के लोगों को लूटने के ठेके उठते हैं. देश को लूटने के ठेके की रकम है ये. आप कहेंगे कि तरीका क्या है हम वोट ही तो दे सकते हैं. नहीं वोट देकर बदलने की ज्यादा भूमिका अब नहीं बची है. जो चोर नहीं होगा उसे ये वर्ग चोर बना देगा.

आपको सरकार के सिर पर सवार रहना होगा. संगठित हों अपने हक की बात करें. हमने देखा कि आम्रपाली के खरीदार संगठित हुए तो उन्हें न्याय मिला. देश को अगर इन लोगों से मुक्त करना है तो जनता की लगाम ही एक तरीका है. प्रेशर ग्रुप बनाएं. सोशल मीडिया भी प्रेशर ग्रुप है. यहां उल्लू बनाने के लिए तैयार की गई सामग्री को शेयर करने की जगह सोच समझकर दिमाग से लिखें. अपने हित और अहित को सोचें और नेताओं पर दबाव बनाएं. इन लोगों के पास संसाधन हैं लेकिन कलेजा इतना नहीं है कि जनता से टकरा सकें. चुनाव जिसको जीतना है जीते लेकिन काम वो करना पड़ेगा जो जनता के लिए हो. बहुत हुआ दलालों का सम्मान – (फेसबुक पर आजतक के वरिष्ठ पत्रकार गिरिजेश वशिष्ठ का लेख)