इन पुलिस अफसरों के कारण बिगड़े मौजपुर के हालात …

दिल्ली में दंगे हो रहे हैं. इस खबर को लिखे जाने तक सात जानें जा चुकी हैं. आगजनी और हिंसा की सैकड़ों वीडियो और तस्वीरें आ चुकी हैं लेकिन फिर भी पुलिस ने कर्फ्यू नहीं लगाया है. जानना चाहते हैं क्यों ? कर्फ्यू तो बाद की बात है लेकिन दिल्ली पुलिस ने ये कदम उठाए होते तो वहां हिंसा होती ही नहीं. आजतक के पत्रकार गिरिजेश वशिष्ठ का फेसबुक पर ये लेख आपको ये जानन में मदद करेगा कि क्यों गृहमंत्री अमितशाह पर शक की उंगिलयां उट रही हैं क्यों उनकी भूमिका की जांच करने की जरूरत है.

य़ह दिल्ली पुलिस है, हर गली में इंटेलीजेंस होती है. इस इलाके में पहले भी पत्थरबाजी की घटनाएं हुई है, गृह राज्य मंत्री खुद आशंका जाता रहे हैं कि हिंसा की साज़िश थी. इंटेलिजेंस सिस्टम हाइपर एक्टिव था. दिल्ली पुलिस की लोकल इंटेलीजेंस यूनिट, उसके मुखबिर, बड़े अफसरों को मिलने वाली अंधाधुंध सोर्स मनी ( वो पैसा जो मुखबिरों को बांटने को दिया जाता है और जिसका हिसाब नहीं देना पड़ता) से फैलाया गया नेटवर्क, आईबी का समानांतर नेटवर्क.

इतना ही नहीं दिल्ली में उत्तर प्रदेश की तरह बीट सिस्टम तहस नहस नहीं हुआ है. हर पुलिसवाले की जिम्मेदारी होती है अपनी बीट की जानकारी रखें. वह जानता है कि किस घर में कौन लोग रहते हैं. कौन नया आया है, कहा से आया है, कौन कहा कैसा धंधा करता है. अफसर भी समाज के नेताओं को पाले रहते हैं, आपस में उनको भिड़ाकर स्थितियां काबू में रखते हैं.

ट्रंप की विजिट है यह भी पहले से पता था. जाहिर बात है रॉ भी लगातार जानकारियां इकट्ठी कर रही होगी. यह सभी एजेंसियां लगातार दिल्ली पुलिस को इनपुट भेजती हैं. इस पूरे नेटवर्क के बावजूद इतनी बड़ी हिंसा फ़ैल गई . कौन मानेगा कि सूचना ठीक से नहीं मिली होगी . यह साफ है कि दिल्ली पुलिस ने इन सूचनाओं का सही इस्तेमाल किया. अब सही इस्तेमाल ना होने की दो वजहें हो सकती हैं पहली यह कि दिल्ली पुलिस बेहद नकारा है , उसकी प्रशासनिक क्षमताएं शून्य के करीब है. दूसरी वजह हो सकती है राजनीतिक दवाब.

दिल्ली पुलिस की काबिलियत का डंका पूरी दुनिया में बजता है उसकी तुलना स्कॉटलैंड यार्ड से की जाती है. दूसरा कारण ज्यादा अहम लगता है आगे बताते हैं.

उत्तर पूर्वी दिल्ली की हिंसक घटनाएं बताती हैं कि जिला पुलिस ने स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर ( SOP ) ठीक से लागू ही नहीं किए गए. हालात बिगड़ सकते हैं इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं था. दो महीने पहले ही यह caa पर हिंसा हो चुकी है. ऐसी जटिल परिस्थितियों में कपिल मिश्रा की आग में घी झोंकने के लिए छोड़ दिया गया. उसकी गिरफ्तारी एहतियात के तौर पर की जा सकती थी. नजरबंदी भी कर सकते थे. शांति की खातिर यह बहुत जरूरी था. इस इलाकों और शाहीन बाग़ में अंतर है. इलाकों के मुआज्जिज लोगो को बुलाकर पुलिस मीटिंग कर सकती थी, स्थानीय नेताओं की मदद ले सकती थी, उपद्रव फैलाने की आशंका में कुछ लोगों को रातों रात उठा सकती थी लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ.

गृह राज्य मंत्री की तरह मेरी भी एक आशंका है. दो दिन पहले ही शहीन बाग़ में पुलिस की साज़िश एक्सपोज हो चुकी थी. सुप्रीम कोर्ट के मध्यस्थ अपनी रिपोर्ट में कह चुके थे कि पुलिस ने शाहीन बाग़ में जाम जानबूझ कर करवाया, धरने वाले रोड के समानांतर रास्ते बिला वजह बंद कर दिए गए थे. उनसे ट्रैफिक संचालित हो सकता था. सुप्रीम कोर्ट के मध्यस्थ हस्तक्षेप के बाद उन्हें खोला गया.

ऐसे में कहीं और बवाल होता है तो उसके जरिए पुलिस की शरारत छिपाई जा सकती थी. दूसरी वजह राजनीतिक लगती है. शाहीन बाग धरने को बदनाम करने और उसपर झूठी तोहमतें लगाने के काम सीधे सरकार में बैठे महत्वपूर्ण लोगों ने किए थे. नाक उनकी ही खतरे में थी. अहिंसक आंदोलन हो तो दमन नहीं हो सकता इसलिए मामले को बिगड़ने दिया गया. अब गुजरात मॉडल लागू करना आसान हो जाएगा.

निचोड़ ये की प्रशासन इस हिंसा की ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकता, दिल्ली पुलिस के कमिश्नर को एक महीने पहले रिटायर होना था एक्सटेंशन पर चल रहे हैं वो ज़िम्मेदारी से नहीं बच सकते. एलजी अनिल बैजल पुलिस के बॉस हैं और दिल्ली पुलिस के राजनीतिक मुखिया अमित शाह है. इन तीनों की ज़िम्मेदारी थी कि हालात को काबू में रखते. विफलता सीधे उनके जिम्मे आती है. @girijeshv