कोरोना अकेले आदमी को ही क्यों घेरता है?

स्वीडन में उन्होने कभी कोई लॉकडाउन नहीं किया. वहां सभी सुरक्षित हैं. कोई बीमारी नहीं फैली स्कूल में. यहां हम फ्लोरिडा में लगातार बंद हैं. हम पूरा साल हो गया बच्चों का स्कूल से दूर रखे हैं. हमें अमेरिका के सभी स्कूलों को तत्काल खोल देना चाहिए. तुरंत. बिना किसी बंदिश के. स्कूल बंद रखने का कोई तर्क नहीं है. कोई कारण नहीं है कि बच्चों को स्कूल से दूर रखा जाए. ये टीचर्स के लिए भी खतरनाक नहीं है. एक अपवाद हो सकता है कि अगर कोई टीचर बीमार है तो उसे स्कूल आने से रोका जा सकता है. उन्हें ऑनलाइन पढ़ाने की सहूलियत दी जा सकती है. इसके अलावा उन्हें आने से रोकने का कोई कारण नहीं है. स्वीडन में 18 लाख बच्चे स्कूल में गए उनमें से एक भी बच्चे की मौत नहीं हुई. शून्य मृत्यु हई. दूसरे पेशों के मुकाबले शिक्षकों में रिस्क बहुत कम है.

अगर किसी बच्चे की नाक से पानी आता है. या उसे खांसी होती है या बुखार होता है तो उसे घर पर रहने को कहा जा सकता है. स्वीडन में कोई सोशल डिस्टेंसिंग नहीं थी. कोई मास्क नहीं था इसके बावजूद सब सुरक्षित रहे. मेरा मानना है कि अगर बीमारी फैलती भी है तो हमारा फोकस प्रोटेक्शन पर होना चाहिए. हमें बच्चों की सुरक्षा पर सोचना चाहिए न कि स्कूल बंद करने के बारे हैं. इनसान होने के नाते ये हमारी नैतिक जिम्मेदारी है कि बच्चों को स्कूल से दूर न रखा जाए. कमजोर वर्ग के बच्चों के लिए ये लाइफलाइन है. उनका जीवन वहां से चलता है. हमें उन बच्चों के बारे में सोचना चाहिए. हम उन बच्चों का खयाल रख सकते थे. यहां तक कि हम अगर बच्चों को मास्क पहनने और सोशल डिस्टेंसिंग के लिए मजबूर करते हैं तो ये भी हमारी सामाजिक जिम्मेदारी का उल्लंघन है. मेरी राय में कोई भी स्कूल ऐसा नहीं होना चाहिए जिसमें बच्चों को खुद जाकर पढ़ने न दिया जाए.पूरी दुनिया में यहां तक कि यहां फ्लोरिडा में भी बच्चे कोविड 19 को लेकर सबसे कम जोखिम में हैं. उनकी रिस्क सबसे कम है. कोविड से जितना नुकसान नहीं है उसके मामले स्कूल बंद करके रखने में बहुत बड़ा नुकसान है. अमेरिका ही नहीं दुनिया के किसी भी देश के लिए अपने बच्चों को पढ़ाने से ज्यादा कुछ अहम नहीं हो सकता. बच्चे बड़ो में भी बीमारी नहीं फैलाते.मामला सिर्फ दूर से बच्चों को पढ़ाने के मामले में असफलता का नहीं है बल्कि बच्चों को एक दूसरे से दूर रखना ठक नहीं है. हजारों लाखों बच्चों के साथ अपराध के मामले सिर्फ छुट्टी में सामने आते हैं. स्कूल मे बच्चों का खयाल तो रखा ही जाता है. उनकी खाने पीने की जरूरतों और दूसरी बातों में भी बच्चों को सुरक्षा मिलती है. ल़ॉकडाउन के दौरान निम्न आय और मध्यआय वर्ग के लोगों पर सबसे बुरा असर पड़ता है. लॉकडाउन से होने वाली परेशानियों को निम्नतर आय वालों ने सबसे ज्यादा झेला है. पेरेन्टस हमेशा मानते हैं कि उनके बच्चे स्कूल में ज्यादा खुश रहते हैं क्योंकि वो वहां एक्टिविटी में हिस्सा लेते हैं.

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