अगर EVM ठीक है, गिनती भी सही हुई तो फिर ये गड़बड़ कैसे हुई ?

इस चुनाव के नतीजे आने के बाद से हमने एक बार भी ईवीएम पर सवाल उठाने वाली कोई खबर प्रकाशित नहीं की. इसकी वजह थी, वजह ये कि जितने वीडियो या जानकारियां सामने आ रही थीं वो कही न कही विश्वसनीय कम लगती थीं. जैसे पोलिंग सेन्टर पर ट्रक में ईवीएम पकडने का मामला आया तो हमने सोचा कि ईवीएम बदल भी दी जाए तो पोलिंग एजेंट के दस्तखत काउंटिंग के समय कैसे आएँगे. हमने ये खबर नहीं बताई. लेकिन अब जो आंकड़े सामने आए हैं वो भले ही ईवीएम की गड़बड़ी के न हों लेकिन चुनाव नतीजों पर इनका असर पड़ सकता है. पूर्व चुनाव आयुक्तों का भी कहना है कि चुनाव आयोग को इस पर सफाई देनी ही चाहिए.

न्यूज़ क्लिक नाम की एक वेबसाइट ने अपनी पड़ताल में दावा किया है कि बिहार और उत्तर प्रदेश में पाँच लोकसभा क्षेत्रों में ग़िनती किए गए वोट कुल डाले गए वोटों से ज़्यादा निकले. यानी वोट पड़े 100 और गिने गए 110. कई जगह इसका उलटा हुआ वोट ज्यादा पड़े और गिनती कम की हुई. उत्तर प्रदेश और बिहार में कुल मिलाकर पाँच लोकसभा सीटें ऐसी हैं, जहाँ इस तरह की गड़बड़ी हुई है. इनमें से तीन लोकसभा सीटें – पटना साहिब, जहानाबाद और बेगूसराय, बिहार में हैं और बदायूँ और फ़र्रूख़ाबाद उत्तर प्रदेश में.

वेबसाइट के मुताबिक पटना साहिब लोकसभा क्षेत्र में कुल वोटर 21.368 लाख थे और यहाँ 43.10% मतदान हुआ था. जब 23 मई को चुनाव नतीजे आए. तो नतीजे कुल 9,82,939 वोटों की गिनती के आधार पर आए थे जबकि वोट पड़े थे सिर्फ 9,20,961. इसका मतलब यह है कि 61,978 ज़्यादा वोटों की ग़िनती हो गई. सवाल ये है कि ये वोट आए कहां से जब वोटरों ने डाले ही नहीं थे. बता दें कि इस सीट पर बीजेपी की ओर से रविशंकर प्रसाद और कांग्रेस की ओर से शत्रुघ्न सिन्हा मैदान में थे. प्रसाद ने सिन्हा को करारी शिकस्त दी थी.

कन्हैया कुमार और गिरिराज सिंह की टक्कर वाली सीट बेगूसराय में भी कुछ ऐसा ही चौंकाने वाला आंकड़ा देखने को मिला. यहाँ कुल मतदाताओं की संख्या 19.428 लाख है और इनमें से 62.32% मतदाताओं यानी 12,10,734 वोटर्स ने वोट डाला. लेकिन दिलचस्प बात यह है कि ग़िनती किए गए वोट डाले गए वोटों से ज़्यादा निकले. ग़िनती किए गए वोट 12,26,503 निकले जो डाले गए वोटों से 15,769  ज़्यादा थे.

तीसरी सीट जहानाबाद लोकसभा सीट पर कुल वोटर 15,75,018 थे. इनमें से 53.67% मतदाताओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया. यहाँ कुल 8,22,233 वोटों की ग़िनती हुई लेकिन यहाँ वोट पड़े हैं 8,45,312. इसका मतलब यह है कि 23,079 कम वोटों की ग़िनती हुई है. इससे तो सीधे तौर पर यही लगता है कि इन वोटों की ग़िनती ही नहीं की गई. जहानाबाद सीट पर जीत का अंतर सिर्फ़ 1,751 वोटों का रहा. यहाँ से हारे हुए राष्ट्रीय जनता दल के उम्मीदवार ने चुनाव परिणाम के बाद कहा कि अगर इन वोटों की ग़िनती हो जाती तो चुनाव परिणाम बदल सकता था.

अब बात करते हैं उत्तर प्रदेश की बदायूँ सीट की. बदायूँ में कुल 1,89,0129 मतदाता थे और यहाँ 56.70% मतदान हुआ. कुल 1071744 मत पड़े लेकिन वोटों की ग़िनती हुई तो ये 1081108 निकले. यानी 9364 कम वोटों की ग़िनती हुई. इसी तरह उत्तर प्रदेश की फ़र्रूख़ाबाद में कुल 1703926 मतदाता थे और यहाँ कुल मतदान 58.72% हुआ था. कुल 1000563 वोट पड़े लेकिन जब वोटों की ग़िनती हुई तो ये 1002953 निकले. यानी 2390 कम वोटों की ग़िनती हुई.

पाँचों लोकसभा सीटों के इन आंकड़ों को देखने के बाद निश्चित रूप से ईवीएम को लेकर मन में सैकड़ों सवाल खड़े होते हैं. आख़िर ऐसा कैसे हो सकता है कि कुल पड़े वोटों से ज़्यादा वोटों की ग़िनती हो जाए या जितने वोट पड़े हैं उससे कम वोटों की ग़िनती हो.

पूर्व चुनाव आयुक्तों ने उठाए बड़े सवाल

जब न्यूज़ क्लिक की ओर से इस बारे में कुछ पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों से संपर्क किया गया तो उन्होंने इस पर हैरानी जताई और कहा कि चुनाव आयोग को इस बारे में स्पष्टीकरण देना चाहिए या वोटों की संख्या के इस विवाद को सुलझाना चाहिए.

2010-12 के बीच पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त रह चुके एस.वाई. कुरैशी ने कहा, ‘जहाँ भी इस तरह की गड़बड़ियों की बात सामने आई है, चुनाव आयोग को इस बारे में स्पष्टीकरण देना चाहिए. कभी-कभी इसके कुछ कारण होते हैं और जब ऐसे कारण नहीं हों तो आयोग को इसका जवाब देना चाहिए.’ कुरैशी ने यह भी कहा कि अगर यह आंकड़े सही हैं तो अदालत का दरवाजा भी खटखटाया जाना चाहिए. 2006-09 के बीच मुख्य चुनाव आयुक्त रहे एन. गोपालस्वामी ने कहा, ‘अगर फ़ॉर्म 17A के चुनाव आंकड़ों को मतगणना में शामिल नहीं किया गया है तो चुनाव आयोग से इस बारे में पूछा जाना चाहिए. आदर्श स्थिति तो यह है कि इन वोटों को मिलाया जाना चाहिए था.’

 2015 में चुनाव आयोग के प्रमुख रहे एच. एस. ब्रम्हा ने न्यूज़ क्लिक को बताया कि कुछ हज़ार मतों के मुद्दे को बेहतर ढंग से देखा जाना चाहिए था क्योंकि कई बार पोस्टल मतों के साथ कुछ दूसरी बातें भी होती हैं. लेकिन अगर इससे ज़्यादा कुछ होता है तो उसकी जाँच किए जाने और जवाब देने की ज़रूरत है. इस बारे में न्यूज़ क्लिक ने चुनाव आयोग के प्रवक्ता शेफ़ाली शरण को कई बार फ़ोन कॉल और मैसेज किए लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया.

बता दें कि ईवीएम को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं. लोकसभा चुनाव के दौरान लगभग सभी चरणों में कई जगहों पर ईवीएम में गड़बड़ी की शिकायतें आई थीं.

आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, सपा मुखिया अखिलेश यादव, बीएसपी प्रमुख मायावती, कांग्रेस के कई नेताओं भी चुनाव आयोग से ईवीएम को हटाकर बैलेट पेपर से चुनाव कराने की माँग की थी. नायडू ने यह भी कहा था कि रूस में बैठे लोग भारत में हो रहे चुनाव की ईवीएम हैक कर रहे हैं. लेकिन आयोग ने इन सभी दलों की माँग को यह कहकर नकार दिया था कि ईवीएम हैक प्रूफ़ है और इसमें छेड़छाड़ नहीं की जा सकती.

लेकिन इन पाँच लोकसभा सीटों के आंकड़ों को देखकर तो ईवीएम पर भरोसे को लेकर और चुनाव आयोग की ओर से निष्पक्ष चुनाव कराने के दावे पर स्वाभाविक रूप से सवाल खड़े होते हैं. चुनाव आयोग को इस बारे में स्पष्टीकरण देना चाहिए.