करकरे की मौत श्राप नहीं ‘साजिश’ का नतीजा थी ? पत्नी और जज ने किया था खुलासा ?

भोपाल से मोदी की बीजेपी की उम्मीदवार साध्वी प्रज्ञा ने भले ही हेमंत करकरे की मौत के पीछे खुद के श्राप का बयान देकर सनसनी मचा दी हो और करकरे की मौत की कामना करने के कारण साध्वी प्रज्ञा की निंदा हो रही ह लेकिन जो जानकारियां पब्लिक डोमेन में उपलब्ध हैं वो इशारा करती है कि करकरे की मौत के पीछे श्राप हो न हो साजिश ज़रूर थी.

करकरे को शायद इसलिए प्राण देने पड़े क्योंकि वो कथित हिंदू आतंकवाद की जांच कर रहे थे. ये आशंका किसी और ने नहीं खुद करकरे की पत्नी ने जताई थी और साध्वी के बयान से काफी पहले ये बातें सामने आ चुकी हैं. हम सिलसिलेवार तरीके से बताएंगे कि कैसे करकरे की मौत की साजिश का मुद्दा पहले हेमंत करकरे की पत्नी कविता करकरे ने उठाया फिर यही आशंका अदालत ने भी जताई. इतना ही नहीं कविता करकरे की मृत्यु भी आम मौत नहीं थी.

शहीद हेमंत करकरे की पत्नी कविता करकरे मीडिया में आकर और अलग अलग मंचों पर बयान दिया था कि उन्हें पुलिस द्वारा बतायी गयी कहानी (हेमंत करकरे बाहरी आतंकवादियों के हमले में मारे गए) पर क़तई यक़ीन नहीं है. उन्होंने बाकायदा इसके पीछे कारण भी गिनाए थे.

कविता ने कहा था कि कई सवाल ऐसे हैं जिनका आजतक उत्तर नहीं मिला है. कविता ने पूछा कि करकरे की बुलेटप्रूफ़ जैकेट इतने अहम समय पर उनके पास क्यों नहीं थी . इतना ही नहीं जैकेट इश्यू करने का हिसाब रखने वाला रजिस्टर भी गायब है.

कविता करकरे ने कहा था कि कोई बताने को तैयार नहीं है कि…

 करकरे, कामते और सालस्कर को होटल ताज की जगह कामा अस्पताल जाने का आदेश किसने दिया था जबकि ताज होटल में उनकी ज़रूरत ज्यादा थी?

 तीनों वरिष्ठ अधिकारी एक गाड़ी में कैसे थे ?

पुलिस ने पोस्ट मॉर्टम रिपोर्ट छिपाई और रिपोर्ट हासिल करने के लिए कविता करकरे और विनीता कामते को महीनों बागदौड़ क्यों करनी पड़ी?

करकरे को पाँच गोलियाँ लगी. दो शरीर में मिली, बाक़ी गोलियां कहां गईं. इसके बारे में पुलिस कुछ क्यों नहीं बता पायी ?

पोस्टमार्टम रिपोर्ट कहती है कि उन्हें एकदम पास से गोली मारी गयी. एक गर्दन में लगी, बाक़ी चार कंधे से होकर काँख से निकल गयीं. ये चारों एक लाइन में थीं. आतंकवादियों के हमले में गोली लगने का ये पैटर्न आ ही नहीं सकता?

जज के सवाल

कसाब को फांसी की सजा सुनाने वाले जज टहलियानी ने भी अपने फैसले में मुम्बई पुलिस को इस नाकामी के लिए कठघरे में खड़ा किया था

अदालत के पूछने पर बैलिस्टिक experts इस सवाल का जवाब नहीं दे पाए कि करकरे और सालस्कर किसकी गोलियों से मारे गए थे.

अदालत में करकरे, कामते और सालस्कर की हत्या के एकमात्र चश्मदीद गवाह जाधव को भी ‘झूठा’ माना गया.

हेमंत करकरे  इसलिए भी भगवा शक्तियों के निशाने पर थे क्योंकि करकरे ने न सिर्फ़ भगवा आतंकवाद की कड़ियों को सुलझाया था बल्कि वे भारतीय सेना में इनकी घुसपैठ के सबूत भी जुटा चुके थे.

उन्हें 26/11 के हमले के दो दिन पहले फ़ोन पर धमकी मिली थी कि वे अपनी जाँच यहीं रोक दें वरना अंजाम भुगतने को तैयार रहें. ये बात बाकायदा मीडिया में रिपोर्ट हो चुकी हैं.

जज टहलियानी के फ़ैसले में व्यक्त किया गया संदेह जवाब माँगता है – करकरे और सालस्कर किसकी गोलियों से मारे गए ? वे गोलियाँ किसकी पिस्तौल से निकली थीं ?

कविता करकरे अपने पति की संदेहास्पद मौत की जाँच की माँग हर मंच से करती रहीं. उन्होंने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दी गयी एक करोड़ की सहायता राशि भी ठुकरा दी. कई साल तक कविता करकरे ने ये बयान दिया कि वो देश में सुरक्षित महसूस नहीं करतीं. सितम्बर, 2014 में ब्रेन हैमरेज से उनका निधन हो गया. वो जाते जाते अपने सभी अंग दान कर गई थीं.

इन सभी हालात के बीच लगातार ये सवाल उठता रहा है कि कहीं करकरे की हत्या की साजिश तो नहीं रची गई. कहीं करकरे को किसी तरह की साजिश के तहत तो नहीं मरवाया गया. कहीं करकरे कथित भगवा आतंकवादियों की आंख की किरकिरी होने के कारण तो नहीं मारे गए.

इस रिपोर्ट में जो भी सवाल उठाए गए हैं वो बेहद अहम हैं. और जांच के बगैर इन्हें खारिज करना संदेह को और गहराएगा. सरकार इसकी जांच कराए ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके.

ये वीडियो उन सैकड़ों रिपोर्ट्स में से एक है जिसमें करकरे की मौत पर सवाल उठाए गए. वो लगातार सांप्रदायिकता पर भी सवाल उठाती रहीं.