महान गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह का निधन, मौत के बाद भी नहीं मिली एंबुलेंस

बिहार के विभूति भारत की शान आइंस्टाइन के सिद्धांत को चुनौती देने वाले महान गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह का निधन हो गया है. वशिष्ठ नाराय़ण सिंह अपने परिजनों के संग पटना के कुल्हरिया कंपलेक्स के पास रहते थे. बताया जा रहा है कि आज अहले सुबह उनके मुंह से खून निकलने लगा. जिसके बाद तत्काल परिजन पीएमसीएच लेकर गए जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया.  परिजनों का आरोप है कि उनके मृत्यु के 2 घंटे के बाद एम्बुलेंस उपलध कराया गया.

पिछले एक पखवारे पूर्व वे बीमार थे तब पीएमसीएच में नेताओं का तांता लगा था. बिहार के मुख्यमंत्री से लेकर केंद्रीय मंत्री तक उन्हें देखने गए थे. बिहार के भोजपुर जिला मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर स्थित बसंतपुर गांव जहां गणित के ज्ञाता वशिष्ठ नरायण सिंह का पैतृक गांव है. आज महान गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह हम लोगो के बीच नहीं है.आज उनका देहांत पटना पीएमसीएच में हुआ पर उनकी यादें युवा पीढ़ी के लिए हमेशा स्मरण स्वरूप रहेगा. वशिष्ठ नरायण सिंह का जन्म 2 अप्रैल १९४२)(मृत्यु : १४ नवम्बर २०१९) वो एक भारतीय गणितज्ञ के रूप में जाने जाते थे. आजकल वे सिजोफ्रेनिया मानसिक बिमारी से पीडित थे और वो कभी अपने गांव बसंतपुर तो कभी पटना स्थित आवास में ही रहते थे. उन्होंने बर्कली के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय से 1969 में गणित में पी.एच.डी की डिग्री प्राप्त की.

डाक्टर वशिष्ठ नारायण सिंह ने सन् 1962 बिहार में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की. पटना विज्ञान महाविद्यालय (सायंस कॉलेज) में पढते हुए उनकी मुलाकात अमेरिका से पटना आए प्रोफेसर कैली से हुई. उनकी प्रतिभा से प्रभावित हो कर प्रोफेसर कैली ने उन्हे बरकली आ कर शोध करने का निमंत्रण दिया. 1963 में वे कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय में शोध के लिए गए. 1969 में उन्होने कैलीफोर्निया विश्वविघालय में पी.एच.डी. प्राप्त की. चक्रीय सदिश समष्टि सिद्धांत पर किये गए उनके शोध कार्य ने उन्हे भारत और विश्व में प्रसिद्ध कर दिया.

अपनी पढाई खत्म करने के बाद कुछ समय के लिए वे कुछ समय के लिए भारत आए, मगर जल्द ही वे अमेरिका वापस चले गए. इस बार उन्होंने वाशिंगटन में गणित के प्रोफेसर के पद पर काम किया. 1971में सिंह भारत वापस लौट गए. उन्होंने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर और भारतीय सांख्यकीय संस्थान, कलकत्ता में काम किया.

1973 में उनका विवाह वन्दना रानी के साथ हुआ. 1974 में उन्हे मानसिक दौरे आने लगे. उनका राँची में इलाज हुआ. लम्बे समय तक वे गायब रहे फिर एकाएक वे मिल गये. उन्हें बिहार सरकार ने ईलाज के लिएं वेंगलुरू भेजा था. लेकिन बाद में ईलाज का खर्चा देना सरकार ने बंद कर दिया. एक बार फिर से बिहार सरकार ने विश्वविख्यात गणितज्ञ के इलाज के लिए पहल की है. विधान परिषद की आश्वासन समिति ने 12 फ़रवरी 2009 को पटना में हुई अपनी बैठक में डॉ॰ सिंह को इलाज के लिए दिल्ली भेजने का निर्णय लिया.

समिति के फैसले के आलोक में भोजपुर जिला प्रशासन ने उन्हें रविवार दिनांक 12 अप्रैल 09 को दिल्ली भेजा.उनके साथ दो डॉक्टर भी भेजे गये हैं. दिल्ली के मेंटल अस्पताल में जांच के बाद डॉक्टरों की परामर्श पर उन्हें आगे के खर्च का बंदोबस्त किया जाएगा. स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि दिल्ली में परामर्श के बाद यदि जरूरत पड़ी तो उन्हें विदेश भी ले जाया जा सकता है. अभी वे अपने गाँव बसंतपुर में उपेक्षित जीवन व्यतीत कर रहे थे. पिछले दिनों आरा में उनकी आंखों में मोतियाबिन्द का सफल ऑपरेशन हुआ था. कई संस्थाओं ने डॉ वशिष्ठ को गोद लेने की पेशकश की है. लेकिन उनकी माता को ये मंजूर नहीं है.

विश्व को जिसने स्पेस थ्यूरी दी आज वह गुमनामी की जिन्दगी जीते हुए तील तील कर मरने को मजबूर हो गए. विश्व के सभी देशों की सरकार जहां स्पेस के नाम पर अरबों रूपये पानी की तरह बहा रही थी. वहीं भोजपुर के इस गणितज्ञ सपूत की मदद तो दुर सरकार के नुमाइंदे हालचाल तक नहीं ले रहे थे. बचपन से ही अपने से उच्च क्लास के छात्रो के गणीत कई तरिके से हल करनेवाले बशिष्ठ जब 1962 में स्नातक की पढ़ाई पटना के साइन्स कालेज में कर रहे थे, तो एक दिन एम एस सी के क्लास करने चले गये. शिक्षक ने उन्हें डाटा और एक मैथ का प्रश्न हल करने को कहा.

बशिष्ठ ने उस प्रश्न को सात तरीके से हल किया. उसी समय कैलीफोर्निया से प्रो0 जान ऐकेली ने उनकी प्रतीभा देख अपने अन्दर में रिसर्च के लिए अमेरिका बुलाया. पढ़ाई पुरी कर 1969 में पीएचडी के लिए अमेरिका गये और रिसर्च पुरा करने के बाद 1970 में नासा के सहायक शिक्षक और वैज्ञानिक बने. 1970 में ही नासा ने अपोलो प्रक्षेपण यान छोड़ने की पुरी तैयारी की तभी कम्प्युटर फेल हो जाने के बाद बशिष्ठ ने ही अपने स्पेस थ्योरी के बदौलत अपौलौ को स्पेस में सपलतापूर्वक प्रक्षेपण करवाया तभी से पुरा विश्व इन्हें महान गणितज्ञ के रूप जानने लगा. नासा में परचम लहराने के बाद वे स्वदेश लौटे और कानपुर आईआईटी में शिक्षक बने लेकिन यहां भी मन नही लगा तो पहले बम्बई के टाटा इन्स्टीच्युट ऑफ फण्डामेन्टल रिसर्च फिर कलकत्ता के इण्डियन स्टैटिक्स इन्स्टीच्यूट में फ्रोफ्सर रहे.

उसी समय बिहार के छपरा में एक चिकीत्सक की बेटी से 1973 उनकी शादी हुई. 1975 में सिजोफ्रेनिया रोग से ग्रसित हुए और कहा जाता है कि बशिष्ठ बाबु का मानसिक संतुलन बिगड़ने लगा. 1976 में ईलाज और सारी जिम्मेवारी लेने को अमेरिका तैयार था,लेकिन इनके परिवारवालों का कहना है कि सरकार ने उन्हे अमेरिका जाने नहीं दिया और एक राजनिति के तहत 1976 से 1987 तक रांची के मेन्टल हास्पीटल में भर्ती कराकर उनकी प्रतीभा को कुचल दिया गया.  

1987 से लेकर इनपर राजनिति होती रही. पैसे के अभाव में उन्हें घर लाया गया तो एक दिन अकस्मात घर से गायब हो गये और करीब दो वर्षों के बाद छपरा के डोरीगंज में सड़क किनारे कुड़ेदान में अचोतावस्था में मिले थे. लालु प्रसाद, रामविलास पासवान, नीतीश कुमार और न जाने कितने ही राजनैतिज्ञ राजनितीक रोटी सेकने के लिए उनसे मिलने उनके गांव तक गये. इलाज और उनके नामपर लाइब्रेरी बनवाने सहित कई घोषणायें की. आज सारी घोषणायें तो दुर उनको पुछनेवाला तक नहीं था. आज भी बशिष्ठ बाबु बीमार रहने के बावजुद पढ़ाई-लिखाई करके कई थ्योरी पर काम करते रहते थे.

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