पार्किंग की पर्ची काटने वाली नौकरी के लिए 50% इंजी. , 2016 से अब तक गईं 50 लाख नौकरियां

देश में बेरोज़गारी सिर्फ मुहावरा नहीं है. हालात ये हैं कि नौकरियों के लिए लोग कुछ भी कर गुज़रने को तैयार हैं. इससे पहले नौकरियों की दुर्दशा पर रिपोर्ट की बात करें पहले बताते हैं ये खबर पार्किंग अटेंडेंट की दसवीं पास की नौकरी के लिए चेन्नई में 700 से ज्यादा इंजीनियर और एमबीए कैंडिडे्टस ने एप्लाई किया है.

द हिंदू की खबर के मुताबिक चेन्नई की पार्किंग अटेंडेंट की नौकरियों के लिए 1,400 से अधिक उम्मीदवारों ने आवेदन किया है. 70 फीसदी से ज्यादा आवेदकों ने ग्रेजुएशन पूरा कर लिया है. वहीं इसमें 50 फीसदी से ज्यादा इंजीनियर हैं.

एक आवेदक ने बताया – “मैंने सिविल इंजीनियरिंग पूरी कर ली है. रियर एस्टेट की खराब हालत के चलते मेरे पास नौकरी नहीं है.” “प्रत्येक इंजीनियर को मोटर चालकों को शिक्षित करना होगा. यह पूरी तरह से एक डिजिटल मोड है. एक अधिकारी ने कहा कि सिस्टम के सफल बनाने के लिए ऐप के डाउनलोड की संख्या बढ़ानी होगी.

ये तो था एक उदाहरण . अब आपको बताते है कि देश में बेरोज़गारी का आलम क्या है. देश में बढ़ रही बेरोजगारी से जुड़ी एक रिपोर्ट सार्वजनिक हुई है. जिसके मुताबिक, पिछले दो सालों में करीब 50 लाख लोगों ने अपनी नौकरियां खो दी हैं. यह दावा द स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया (SWI) 2019 की रिपोर्ट में किया गया है. इसे मंगलवार को बेंगलुरु की अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी ने जारी किया. रिपोर्ट के मुताबिक, 2016 से 2018 के बीच करीब 50 लाख बेरोजगार हुए. कहा गया है कि बेरोजगारी बढ़ने की शुरुआत नवंबर 2016 में हुई नोटबंदी के साथ हुई. हालांकि, रिपोर्ट में आगे यह भी लिखा है कि नौकरी कम होने और नोटबंदी के बीच कोई सीधा संबंध स्थापित नहीं हो पाया है.

रिपोर्ट के मुताबिक, बेरोजगारी के शिकार उच्च शिक्षा ग्रहण कर चुके लोग और कम पढ़े लिखे लोग दोनों हैं. भारत की लेबर मार्केट पर जारी इस रिपोर्ट का आधार कन्ज्यूमर पिरामिड सर्वे रहा. यह सर्वे सेंटर फॉर मॉनिटरिंग द इंडियन इकॉनमी (CMIE-CPDX) करवाता है. CMIE मुंबई की एक बिजनस इनफॉर्मेशन कंपनी होने के साथ-साथ स्वतंत्र रूप से काम करनेवाला थिंक टैंक भी है. उनके द्वारा ऐसा सर्वे हर चार महीने में किया जाता है, जिसमें 1.6 लाख परिवारों और 5.22 लाख लोगों को शामिल किया जाता है.

2011 से बढ़ रही थी बेरोजगारी

रिपोर्ट के मुताबिक, बेरोजगारी 2011 के बाद से ही तेजी से बढ़ रही है. लेकिन 2016 के बाद से उच्च शिक्षा धारकों के साथ कम पढ़े लिखे लोगों की नौकरियां छिनी और उन्हें मिलनेवाले काम के अवसर कम हुए. रिपोर्ट में शहरी महिलाओं में बढ़ती बेरोजगारी के भी आंकड़े हैं. इसके मुताबिक, ग्रेजुएट महिलाओं में से 10 प्रतिशत काम कर रही हैं, वहीं 34 प्रतिशत बेरोजगार हैं. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 20 से 24 साल के शहरी युवाओं में बेरोजगारी काफी है. माना गया है कि कामगार लोगों में इस उम्र के लोगों का प्रतिशत 13.5 होता है, लेकिन उनमें से 60 प्रतिशत फिलहाल बगैर काम के हैं.