इस सरल कहानी से समझिए पूरा CAA और NRC

जुम्मन शेख और अलगू चौधरी

अलगू चौधरी का परिवार मोहल्ले के सबसे खाते पीते परिवारों में एक था. खाते पीते और खुद भी भूखा न रहूं साधु भी भूखा न जाए कि तर्ज पर उका कुटुंब चैन से रहता था. अच्छे आदमी थे बड़ा मान सम्मान था. ठीक साथ के मकान में जुम्मन शेख रहते थे. वैसे तो आदमी ठीक थे लेकिन बच्चों में भेदभाव करते थे. छोटी बेटी को जब बाकी बच्चे सताते , उसके खिलौने छीन लेते तो जुम्मन मियां चुपचाप देखते रहते. धीरे धीरे वक्त कटता गया. बच्चे जवान हो गए लेकिन जुल्म न रुका.
लेकिन जवान बच्ची को अत्याचार बर्दाश्त नहीं था. अलगू चौधरी चूंकि भले आदमी थे किसी को निराश नहीं लौटाते थे. एक दिन उसने फैसला किया कि अब जुम्मन मियां की ज्यादतियों को बर्दाश्त करना बंद करना पड़ेगा. लड़की ने सामान उठाया और अलगू चौधरी के घर पहुंच गई. जुम्मन मियां टापते रह गए. जुम्मन मियां भी जिद पर अड़े थे वो झुकने को तैयार नहीं थे. अलगू चौधरी ने घरके आऊट हाऊस नें रहने को लड़की को जगह दे दी. धीरे धीरे समय बीतता गया. अलगू चौधरी के दिल में उस लडकी के लिए सॉफ्ट कॉर्नर था. उसकी वजह थी अलगू चौधरी की तरह उसकी लंबी नाक और तीखे नयन नक्श. अलगू जी के परिवार में सबके ऐसे नयन नक्श होते थे. वो भले ही जुम्मन शेख की बेटी थी लेकिन सारे कायदे उसके अलगू के जैसे.
इस बीच अलगू चौधरी के पिता वानप्रस्थ को चले गए ,लोगों का कहना था कि अलगू ने उन्हें जाने को मजबूर किया लेकिन ये कंट्रोवर्सी हमारी कहानी का हिस्सा नहीं है. पिताजी के जाने के बाद अलगू चौधरी घर के मुखिया बने.
लड़की घर के आउट हाऊस में ही रह रही थी. उसका खाना उसके पास पहुंचा दिया जाता था. घर परिवार के लोगों को भरोसा था कि एक दिन जुम्मन शेख की अक्ल ठिकाने आ ही जाएगी और वो अपनी बेटी को बुला लेगे. लेकिन इससे पहले वो दिन आता ये शाम आ गई.
अलगू चौधरी ने सबको खाने की मेज़ पर बुलाया और अपना फैसला सुना दिया. चौधरी साहब ने कहा कि अब से लड़की घर में ही रहेगी. चौधराइन के साथ वाला खाली पड़ा कमरा उस लड़की का बैडरूम होगा और उसे अब घर का सदस्य माना जाएगा. आज से उस लड़की का जुम्मन शेख से कोई संबंध नहीं होगा.
घर वालों को समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहें . अलगू शेख की हरकतों पर चूंचपड़ की और झेलते रहे . इस तरह एक हफ्ता बीत गया. लोगों को लगा कि अब शायद सब सामान्य हो जाएगा. लेकिन एक दिन अचानक अलगू चौधरी ने लड़की से प्रेम की सारी सीमाएं तोड़ते हुए परिवार को चौंका दिया. किसी ने सोचा भी न होगा कि जुम्मन की लड़की के चक्कर में अलगू इस हद तक चले जाएंगे. उन्होंने अपने बड़े राघव बेटे से पूछा –
– तुम कौन हो?
चौंकना लाजमी था. सबको पता था कि वो उनका बेटा है. लेकिन राघव ने हिम्मत जुटाकर पिता को उत्तर दिया – – – आपका बेटा हूं.
अलगू ने दो मिनट मौन रखा उसके बाद बोले
– क्या सबूत है.
अलगू की पत्नी अक्सर उलझा नहीं करती थीं. लेकिन आज रहा नहीं गया. मां थीं आखिर. मां बीच में कूद पड़ीं
– कैसी बाते कर रहे हो जी. ये मेरा बेटा है. मैंने पैदा किया है. एक मां से ज्यादा कौन सबूत दे सकता है?
अलगू चौधरी ने जवाब दिया.
– ये गवाही है. मुझे सबूत चाहिए. कोई सबूत . कोई ज़मीन का कागज़ात ?
पत्नी को समझ आता इससे पहले अलगू ने अगला फैसला सुनाया-
– कान खोल कर सुन लो. आज के बाद आप सबको एक महीना मिलता है. इस बीच में अपने इस परिवार के सदस्य होने के सबूत लाओ वरना आऊट हाऊस और उसके बाद बाहर का रास्ता. समझे.
परिवार के सदस्य सदमे में थे. छोटी बेटी जुम्मन की बेटी के सबसे नजदीक थी अपनी सहेली का नाम लेकर बोली लहर को भी सबूत देने होंगे?
अलगू चौधरी बोले सिर्फ वो ही है जिसे सबूत की ज़रूरत नहीं है. उसे हमने अपने घऱ का सदस्य बनाया है.
इसके बाद से घर के सदस्य कागज़ जुटाने के लिए अलग अलग दफ्तरों की लाइन में हैं और कोई भी कागज़ मिलने की फिलहाल कोई उम्मीद नहीं है. लेकिन कोई रास्ता भी नहीं है.
कहानी अभी खत्म नहीं हुई है. अगली किश्त जल्द ही मिलेगी. ये एक सामान्य कहानी है. जिसे सीएए या एनसीआर हर चीज़ में खोज लेने की आदत है वो कहानी को एक बार और पढ लें शायद इच्छा पूरी हो जाए.

फेसबुक पर आजतक के डिप्टी एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर गिरिजेश वशिष्ठ की कहानी

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