“मुफ्तखोरी” नहीं ये थी वेनेज़ुएला में आर्थिक संकट की वजह

आजकल वाट्सएप पर एक मैसेज वायरल हो रहा है. इस मैसेज में कहा जा रहा है कि वेनेजुएला के आर्थिक संकट की वजह कल्याणकारी राज्य था और कांग्रेस पार्टी जो 6000 रुपये महीने गरीबों को देने की बात कर रही है उससे देश वेनेजुएला की तरह संकट में फंस जाएगा. लेकिन क्या ये वाकई सही है या एक झूठा मैसेज वायरल करके राजनीतिक खेल हो रहा है. इसे फॉर्वर्ड करने वाले भी ज्यादातर लोगों को इस संकट की हकीकत नहीं पता.  हम इस मैसेज की बात करके आपका वक्त बरबाद नहीं करेंगे लेकिन आपको बताना चाहेंगे कि ये संकट दरअसल था क्या. वहां की सरकार ने भारत की तरह नोटबंदी जैसा सनकी कदम उठाया था लेकिन हम यहां उसकी बात नहीं करेंगे. हम एक नज़र में समस्या की वजह समझाएंगे

वेनेजुएला आजकल आर्थिक व खाद्य संकट में फंसा है, जिससे निकलने की राह नहीं सूझ रही है. दुकानों में सामान लूटा जा रहे हैं.  बिजली और खाद्य पदार्थों की आपूर्ति सीमित हो गयी है. इसके पीछे अमेरिका को माना जा रहा है लेकिन पहले बता दें कि कैसे अमेरिका की पिट्ठू सरकार ने अपने ही देश में आर्थिक संकट बुना.

इस संकट का एक सिरा वेनेजुएला संसद में हुए में मिल सकता है जिसके चलते मादुरो अपने उद्देश्यों में सफल नहीं हो पा रहे हैं. पिछले 16 सालों तक देश में शासन करनेवाली ह्यूगो सावेज़ की युनाइटेड सोशलिस्ट पार्टी ऑफ वेनेजुएला (पीएसयूवी) दिसंबर, 2015 में हुए चुनाव में 167 सीटों वाली संसद में विपक्षी पार्टी डेमोक्रेटिक यूनिटी राउंडटेबल (एमयूडी) द्वारा प्राप्त की गयी 112 सीटों के मुकाबले महज 55 सीटों पर ही सिमट गयी. इस सरकार ने भारत की तरह नोटबंदी जैसा सनकी कदम उठाया था लेकिन हम यहां उसकी बात नहीं करेंगे.

सावेज़ के चुनाव हारने के बाद मादुरो की सरकार बनी लेकिन इसका नतीजा खतरनाक हुआ. वेनजुएला की संसद में राष्ट्रपति की पार्टी अल्पमत में है और वह संसद द्वारा पारित बिल को मानने के लिए अल्पमत में होने के कारण बाध्य भी हैं. नतीजा ये हुआ है कि देश राजनीतिक संघर्ष के दलदल में धंसता गया.

राष्ट्रपति मादुरो ने इससे बचने के लिए 15 जनवरी, 2016 को देश में आर्थिक आपात की घोषणा कर दी. महत्वपूर्ण बात यह रही कि देश के सुप्रीम कोर्ट ने भी राष्ट्रपति के इस फैसले को हरी झंडी तक दिखा दी. लेकिन बहुमत वाला विपक्ष इसके खिलाफ उठ खड़ा हुआ.

आर्थिक आपातकाल 60 दिन के लिए घोषित किया गया. इस दौरान वित्त मंत्री लूईस सलास ने कहा कि यह कदम लोगों को भविष्य में आर्थिक संकट से बचाने के लिए उठाया गया है. यह आदेश सरकार को वस्तुओं एवं सेवाओं तक लोगों की पहुंच सुनिश्चित करने के लिए असाधारण शक्तियां प्रदान करता है.

आपातकाल लागू होते ही राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को इस साल के बजट से सीधे तौर पर विशेष संसाधन जुटाने का अधिकार प्राप्त हो गया था, ताकि जनता से निवेश सुनिश्चित किया जा सके और लोकहित के कार्यों के लिए संसाधन आवंटित किये जा सकें. वेनेजुएला सरकार के वित्त मंत्री के अनुसार, आर्थिक आपातकाल के दौरान सरकार वैसे कदम उठायेगी, जिससे लोगों को आर्थिक युद्ध और तेल की गिरती कीमतों के दुष्परिणाम से बचाया जा सके. लेकिन, ऐसा हो नहीं पाया.

अर्थशास्त्रयों का मानना है कि लैटिन अमेरिकी देशों में तेल की कीमत गिरने का सबसे ज्यादा नुकसान वेनेजुएला को उठाना पड़ा है. इसका प्रमुख कारण यह है कि वेनेजुएला की 95 प्रतिशत आय तेल और गैस से होती है. 2013 और 2014 में देश ने जहां लगभग प्रति बैरल 100 डॉलर या उससे पहले भाावेज के समय 140 डॉलर प्रति बैरल तेल बेचा था, वहीं मादुरो के समय ये कीमतें 25 डॉलर प्रति बैरल रह गयीं. वेनेजुएला दो साल पहले 75 बिलियन डॉलर का तेल निर्यात किया करता था. 2016 में यह महज 27 बिलियन डॉलर रह गया है. इसके पीछे अमेरिका का खेल था.

इस संकट से निकलने के लिए राष्ट्रपति ने जो उपाय किए वो आत्मघाती साबित हुए. उल्लेखनीय है कि फरवरी में निकोलस को विशेष आर्थिक अधिकार दिया गया था, जिसका उपयोग करते हुए निकोलस ने वेनेजुएला की मुद्रा बोलिवार का अवमूल्यन कर दिया और तेल की कीमतें बढ़ा दीं.

तेल की कीमतों में 6000 प्रतिशत की वृद्धि करने के सरकार के फैसले के खिलाफ लोगों की नाराजगी बढ़ गयी. मादुरो इसके जरिये अर्थव्यवस्था में बचत का उपाय खोज रहे थे, लेकिन इसने अन्य वस्तुओं की कीमतों को भी प्रभावित करना शुरू कर दिया.

तेल की कीमतों के गिरने से आय में हुई कमी को सरकार ने करेंसी नोट छाप कर भरपाई करने की कोशिश की, जो एक परंपरागत गलती है, जिसे अधिकांश सरकारें दोहराती चली आयी हैं. करेंसी नोट छापने से जनता में इफेक्टिव डिमांड तथा उनकी पर्चेजिंग पावर काफी बढ़ गयी. चूंकि मांग के अनुरूप आपूर्ति नहीं हो पायी, इसलिए एक तरफ लंबी–लंबी कतारें लगनी शुरू हो गयीं और दूसरी तरफ करेंसी की कीमतें गिरनी अथवा वस्तुओं की कीमतें उठनी शुरू हो गयीं.

देखते-देखते 300 से 350 प्रतिशत के ईद–गिर्द मुद्रास्फीति की दर पहुंच गयी. कुछ समय पहले तक वहां एक अमेरिकी डॉलर 200 बोलिवर के बराबर था, जबकि अब वह लगभग 1000 बोलिवर है.

वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था में धन की कमी ने आयातों में कमी के लिए विवश किया, जिससे आयात घट गये और लगभग सभी सुपर मार्केट खाली हो गये. वस्तुओं की ब्लैक मार्केटिंग होने लगी. लेकिन, वेनेजुएला की सरकार ब्लैक मार्केटिंग एवं अवैध व्यापार को रोकने में असफल रही. अति मुद्रास्फीति  और अवमूल्यन ने वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था को गहरे संकट में डाल दिया, जिससे निकलने की अभी कोई राह दिखती नजर नहीं आ रही है. 

बहरहाल, विपक्ष अब तब 1.85 मिलियन वोट रजिस्टर करा चुका है और उसका प्रयास है कि वह अपेक्षित वोट रजिस्टर करा कर पूर्ण जनमत द्वारा मादुरो को सत्ता से बेदखल कर दे. दूसरी तरफ, मादुरो सरकार अमेरिका पर आरोप मढ़ रही है कि वह विपक्ष को ताकत दे रही है, ताकि समाजवाद का एक और स्तंभ ढह जाये.

वैसे इसमें संशय नहीं है कि अमेरिका लंबे समय से वेनेजुएला को अपने नियंत्रण में लाने की कोशिश कर रहा है. लेकिन, सावेज़ के रहते वह ऐसा करने में सफल नहीं हो पाया. अब मादुरो में वह सूझबूझ नहीं है, इसलिए अब बहुत कुछ संभव है. एक रिपोर्ट के अनुसार, यहां विपक्ष पूरी तरह से अमेरिका नियंत्रित है, जिससे ब्लैक मार्केटिंग बेहद रणनीतिक ढंग से होती है. इसका मतलब यह हुआ कि मादुरो की अदूरदर्शिता और विपक्ष की अमेरिकापरस्ती वेनेजुएला के वर्तमान संकट की असल वजह है. और अमेरिका परस्त अर्थ व्यवस्था की समर्थक भारत की बीजेपी सरकार कह रहीहै कि अमेरिकी ट्रिकल डाउन थ्योरी के खिलाफ जाने से वेनेज़ुएला का संकट खड़ा हुआ. सच तो ये हैं कि वेलफेयर स्टेट होता या भारत में प्रस्तावित 6000 रुपये महीने जैसी योजनाएं होतीं तो वेनेजुएला में आर्थिक संकट आता ही नहीं.