यूपी में बीजेपी को 2014 के मुकाबले आधी भी सीटें लाना मुश्किल

2019 के लिए लोक सभा चुनाव की तारीखों का एलान हो गया है. 23 मई को नतीजे भी आ जाएंगे. इस बीच तरह तरह के नारे उछाले जा रहे हैं. एक नारा है अबकी बार चार सौ पार और दूसरा है 23 मई बीजेपी गई. लेकिन इन नारों के बीच बड़ा सवाल ये है कि 23 मई के बाद मोदी सरकार की स्थिति क्या होने वाली है. नरेन्द्र मोदी जीतेंगे या हारेंगे. बीजेपी की स्वतंत्र सरकार बनेगी या गठबंधन सरकार. इन मसलों पर हम राज्यवार पड़ताल करेंगे. सबसे पहले बात करते हैं यूपी की

उत्तर प्रदेश

2014 में जब मोदी प्रधानमंत्री बने थे तो पार्टी को उत्तरप्रदेश में लोकसभा की 71 सीटें मिली थीं. उसे 24.80 फीसदी सीटों के साथ 61 सीटों का फायदा हुआ था. इन सीटों में सबसे ज्यादा घाटे में बीएसपी रही थी . उसने 7  .82 फीसदी वोटशेयर खोया सिर्फ इतने वोट गंवाने के कारण उसे बीस सीट खोनी पड़ीं. दूसरे नंबर पर कांग्रेस को नुकसान हुआ. उसने 19 सीट खोई और पौने बारह प्रतिशत वोटशेयर का नुकसान हुआ. समाजवादी पार्टी ने 7.82 फीसदी फीसदी वोट खोकर 18 सीटें गंवाई. .

इस राज्य के हालात देखें और 2014 से तुलना करें तो बीएसपी और समाजवादी पार्टी को तालमेल के ज़रिए अगर दस फीसदी वोट वापस लेती हैं. तो भी इस चुनाव में इस गठबंधन को बीजेपी से करीब 30 फीसदी सीटें छीनने में कामयाबी मिल सकती है. कांग्रेस इस बड़े गठबंधन और बीजेपी के झगड़े में अगर अपना खोये हुए वोट शेयर का आधा भी दोबारा हासिल कर लेती है तो वो वापस दो से 12 सीटों पर आ सकती है.  

ये स्थिति तब है जब कांग्रेस के साथ इन दोनों पार्टियों की रणनीतिक साझे दारी न हो. यूपी में विपक्ष का तालमेल भले ही न हुआ हो लेकिन इसके बावजूद तालमेल की स्थिति पिछले चुनाव के मुकाबले बेहद मजबूत है. इस हालात में साफ है कि अकेले यूपी में बीजेपी की 61 में से 39 सीटें खतरे में दिखाई दे रही है. अगर जबरदस्त प्रचार के ज़रिए बीजेपी कुछ सीटें वापस भी हासिल कर लेती है तो भी यूपी में उसके पास 25 से तीस सीटों से ज्यादा गुंजाइश नहीं बचती.

कार्यकर्ताओं का उत्साह

इस पूरे प्रचार के बीच बूथ मैनेजमेंट और कार्यकर्ता के उत्साह का अंतर भी आसानी से समझा जा सकता है. पिछले चुनाव में जो बीजेपी मोदी की दिखाई गुलाबी तस्वीर से भरे गए उत्साह के साथ चुनाव में उतरी थी आज उसका कार्यकर्ता कह रहा है कि कोई विकल्प नहीं है इसलिए मोदी को वोट देंगे. जाहिर बात है बूथ पर उस स्तर का उत्साह नहीं रहने वाला.

आपसी सिर फुट्व्वल

पार्टी के नेताओं में अच्छी खासी खींचतान है. संत कबीर नगर में हाल ही में विधायक और सांसद की मारपीट की तस्वीरें पूरे प्रदेश में बीजेपी की खास दो जातियों के बीच मनमुटाव की जगह बनी हैं. बदायूं के विधायक के मामले में भी उस इलाके के नेता बंटे हुए हैं. कई केन्द्रीय मंत्रियों के टिकट काट दिए गए हैं जाहिर बात है इसका असर भी पड़ेगा. जबकि 2014 में सब मिलकर लड़े थे.

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