गोली लगने के बाद भी बच सकती थी विवेक तिवारी की जान अगर…

अगर विवेक तिवारी को वक्त पर पुलिस अस्पताल पहुंचा देती तो शायद उसकी जान बच जाती. अगर वक्त पर कोई मदद कर देता तो डॉक्टरों के पास पूरे 45  मिनट ज्यादा हो सकते थे. शायद वो इस बीच कुछ कर पाते. इतना ही नहीं पुलिस के लोग अगर  प्राथमिक मदद देते तो भी शायद थोड़ा खून बहने से रुक जाता.

विवेक की दोस्त और हादसे की चश्मदीद गवाह सना ने बताया कि विवेक अस्पताल पहुंचने तक जिंदा था. सना ने बताया कि उसके उस दिन मोबाइल नहीं था. विवेक तिवारी के मोबाइल में लॉक लगा था. इसके बाद सना के पास रास्ते में लोगों को रोककर मदद मांगने के अलावा कोई रास्ता नहीं था. वो 15 मिनट तक लोगों को रोकती रही लोकिन कोई नहीं रुका. सना ने कहा-करीब 15 मिनट बाद पुलिस की एक जीप आई.

सना के मुताबिक पुलिस कर्मियों ने एम्बुलेंस के लिए फोन किया और इंतजार करने लगे. एम्बुलेंस नहीं पुहंची. उसने पुलिस से मिन्नत की. पुलिस वालों ने बेहोश विवेक को जीप में लिटाया और उन्हें लोहिया अस्पताल ले गए.

विवेक को अस्पताल ले जाने में 30-45 मिनट का समय लग गया था. अस्पताल पहुंचने तक विवेक जीवित था. 10 मिनट बाद डॉक्टर ने उसे मृत घोषित कर दिया.

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