प्यार की ताकत, एक आतंकवादी बन गया बहादुर देश भक्त, मिली 21 तोपों की सलामी

आतंकवाद को लेकर नफरत की बात करने वालों के लिए ये कहानी एक सबक है. जो लोग पत्थर का जवाब गोली से देने की बात करते हैं उन्हें भी ये खबर पढ़नी चाहिए. दरअसल ये कहानी एक सिपाही की है जो कभी आतंकवादी होता था. देश ने उस पर विश्वास जताया और उसे फौज में रखा. शख्स है जम्मू-कश्मीर के शोपियां में रविवार को मुठभेड़ में शहीद हुआ लांस नायक नजीर अहमद वानी (38). वानी पहले कभी खुद आतंकी था.

देश ने उसे मौका दिया तो उसने उन्होंने समर्पण कर दिया था. आर्मी ने वानी को सच्चा सैनिक बताया है. उन्हें 2007 और इसी साल अगस्त में वीरता के लिए सेना मेडल से सम्मानित किया गया था.

जिस मुठभेड़ में वाणी ने सर्वोच्च बलिदान दिया उसमें 6 आतंकी मारे गए थे. सेना के प्रवक्ता कर्नल राजेश कालिया के मुताबिक, “वानी को बाटागुंड में मुठभेड़ के दौरान गोलियां लगी थीं. उन्हें तुरंत अस्पताल लाया गया लेकिन इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई. दुख की इस घड़ी में आर्मी वानी के परिवार के साथ है.” सोमवार को अंतिम संस्कार के दौरान उनके पार्थिव शरीर को तिरंगे में लपेटा गया और 21 बंदूकों की सलामी दी गई. उनके परिवार में पत्नी, बेटा और बेटी हैं.

21 बंदूकों की दी गई सलामी

कुलगाम के चेकी अश्मुजी गांव के रहने वाले वानी शुरू में आतंकी थे लेकिन बाद में हिंसा से किनारा कर लिया. 2004 में उन्होंने आर्मी ज्वाइन की. टेरिटोरियल आर्मी की 162वीं बटालियन से उन्होंने करियर की शुरुआत की.

हिजबुल और लश्कर से जुड़े थे आतंकी

25 नवंबर को शोपियां के हिपुरा बाटागुंड इलाके में 6 आतंकी मारे गए थे, जिसमें से चार हिजबुल मुजाहिदीन और दो लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े थे. उनकी पहचान उमर मजीद गनी, मुश्ताक अहमद मीर, मोहम्मद अब्बास भट, मोहम्मद वसीम वगई, खालिद फारूक मली के रूप में हुई. उमर गनी बाटमालू एनकाउंटर के दौरान बच निकला था. पिछले दिनों उसकी तस्वीर वायरल हुई थी, जिसमें उमर लाल चौक के आसपास नजर आया था. बीते दो साल में वह कई जवानों और आम नागरिकों की हत्या में शामिल रहा था.

सुरक्षाबलों के काफिले पर हुआ पथराव

सुरक्षाबलों की कार्रवाई के मद्देनजर शोपियां में मोबाइल इंटरनेट सेवा बंद कर दी गई थी. इसके बाद भी प्रदर्शनकारियों ने मुठभेड़ के बाद लौट रहे जवानों के काफिले पर पथराव किया. जवाबी कार्रवाई में कुछ पथरबाज जख्मी हुए.

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