भक्तो ये लेख पढ़कर शिवाजी, राणा प्रताप, रानी झांसी और पृथ्वीराज चौहान को गाली मत देने लगना

क्या आप जानते हैं कि शिवाजी राना प्रताप, झांसी की रानी और पृथ्वीराज चौहान की तरह शाहीनबाग का धरना भी एक मामले में समान है. एक चीज़ है जो इन महापुरुषों के जीवन को शाहीन बाग की तर्ज पर दिखाती है. ये चीज़ है धर्म निरपेक्षता. इतिहास के आंखें खोलने वाले पन्नों पर आधारित है पत्रकार गिरिजेश वशिष्ठ का ये लेख.

ये पोस्ट उन लोगों के लिए हैं सेक्युलर शब्द सामने आते ही जिनकी भुजाएं फड़कने लगती हैं. लिबरल शब्द  बुरा लगता है. ऐसा वाले खुद को राणा प्रताप, महारानी लक्षमीबाई, शिवाजी और पृथ्वीराज चौहान के वंशज बताते हैं. हिंदू होने पर गर्व करते हैं. मैं यहां दावे के साथ कह सकता हूं कि इनहोंने एक घंटा भी इन इतिहास पुरुषों के बारे में पढ़ा होता तो आज शायद उनसे ज्यादा सेक्युलर होते जो शाहीनबाग में खड़े हैं.

शुरुआत शिवाजी से करते हैं. शिवाजी का मुकाबला औरगंजेब से था इसलिए शिवाजी आपके हीरो की लिस्ट में हैं लेकिन शिवाजी और औरंगजेब के बीच क्या धर्म की लड़ाई थी? नहीं थी अगर ऐसा होता तो शिवाजी अपने तोपखाने का प्रमुख इब्राहिमखान को नहीं बनाते. वो उनके सबसे नजदीकी और भरोसे के लोगों में से एक था. नाम से ही पता लग गया होगा कि वो उस धर्म का था जिसके खिलाफ तुम शिवाजी को इस्तेमाल करते हो.

शिवाजी की फौज में 30 से 35 फीसदी मुसलमान थे 700 पठान उनकी आर्मी की शान थे. अफगान तुर्क और फारसी सैनिक शिवाजी की सेना की ताकत थे.   शिवाजी के दोस्त भी मुसलमान थे. छत्रपति शिवाजी की दोस्ती हैदराबाद के निजाम से हुआ करती थी. शिवाजी पर पूरा लेख हो जाए इससे पहले थोड़ा आगे बढ़ते हैं.

शिवाजी से गद्दारी करने वालों के नाम यहां लिखूंगा तो अपने धार्मिक और सांप्रदायिक रुझान पर शर्म आने लगेगी. महाराणा प्रताप के साथ गद्दारी करने वाले कौन थे. कोई बताएगा वो राजा कौन थे जिन्होंने महाराणा प्रताप को जंगल में भटकने को मजबूर कर दिया लेकिन साथ नहीं दिया. वो लोग किस धर्म के थे और किस जाति के थे जिन्होंने उनका साथ नहीं दिया. आदिवासी और भील जिन्हें दोयम दर्जे का और शूद्र समजते हो वो न होते तो महाराणा के प्राण नहीं बचते. जानते हैं ना कि हल्दी घाटी में कौन मुगलों की सेना का नेतृत्व कर रहा था . हिंदू मानसिंह. राणा प्रताप का सेनापति कौन था पता है. हाकिम खां सूर, एक मुसलमान.

राणा प्रताप के बेटे अमर सिंह ने अजमेर के गवर्नर ख़ान-ए-ख़ाना के परिवार की महिलाओं और बच्चों को बंदी बना लिया था. (ये ख़ान-ए-ख़ाना और कोई नहीं हिंदी के मशहूर कवि रहीम थे.)

“जब प्रताप को ये बात पता चली तो वो अपने बेटे पर बहुत नाराज़ हुए और उनसे तुरंत उनके परिवारजनों को छोड़ने के लिए कहा. अमर सिंह ने ससम्मान उन्हें उनके घर पहुंचा दिया. बाद में रहीम ने उनके बहुत क़सीदे पढ़े और उनकी शान में कई दोहे लिखे.” *(रीमा हूजा की पुस्तक महाराणा प्रताप द इन्विंसिबल वारियर से) इन सभी बातों में कहीं हिंदू मुसलमान दिखता है?

राणा प्रताप के दादा कौन थे पता है. राणा सांगा, वो राणा सांगा जिन्होंने बाबर को भारत बुलाया था. हल्दी घाटी के युद्ध की वजह. जब बाबर भारत आया तो उसका मुकाबला किसी और ने नहीं किया बल्कि इब्राहिम लोधी ने किया. इब्राहिम लोधी का धर्म इस्लाम था. यानी इतिहास के उस दौर तक में कोई सांप्रदायिक नहीं था. धर्म नहीं देखता था. सब मिलकर रहते थे.

तीसरा उदाहरण देता हूं. महारानी लक्षमीबाई का. महारानी लक्षमीबाई की सबसे बड़ी ताकत थी कड़क बिजली, कड़क बिजली रानी की सबसे अच्छी तोप थी और उस तोप को संभालन की जिम्मेदारी रानी ने किसे दी थी पता है. अपने सबसे भरोसेमंद तोपची गुलाम गौस खां को उसने ये तोप सौंपी थी. रानी के भरोसेमंद और वफादार खुदा बख्श भी थे मुसलमान थे रानी की फौज में भी धर्म का कोई अंतर नहीं था. आखिर तक जी जान से लडने और शहीद होने वाले सैनिकों में बड़ी संख्या में मुसलमान थे. रानी की सहेली झलकारी थी वो दलित थी.

आपको पता है आसपास के राजाओं में से ज्यादातर ने रानी की मदद नहीं की थी. जब रानी लक्षमीबाई अग्रेज सेनाओं से घिर गईं तो उन्होंने नवाब बांदा को पत्र लिखा और राखी भेजी. जानते हैं बांदा के नवाब अली बहादुर सानी (द्वितीय को चिट्ठी लिखी) उन्होंने लिखा – हमारी राय है कै विदेसियों का सासन भारत पर न ओ चाहिए। अंगरेजन से लड़वौ बहुत जरूरी है। इस पत्रके जवाब में नवाब बांदा ने 10 हजार सैनिक झांसी के लिए तुरंत रवान कर दिए. आपको बता दें कि उस दौरान बुंदेलखंड के कई राजाओं ने रानी का साथ देने से इनकार कर दिया था और ग्वालियर के सिंधिया के बारे में सबको पता ही है.

झासी की रानी के साथ लड़ने गए लोहागढ़ के लगभग पांच सौ सैनिकों की वीरगाधा आज भी बुंदेलखंड के कोने कोने में सुनाई जाती है. इनमें से ज्यादातर पठान थे। कहा जाता है कि लोहागढ़ के कई सैनिकों में इस कदर जोश था कि वे सर कट जाने के बाद भी अंग्रेजों को खदेड़कर लोहागढ़ से बाहर ले गए थे। इनका जोश देखकर अंग्रेज सेना डर गई थी

पृथ्वीराज चौहान के पिता सोमेश्वर चौहान अजमेर के राजा थे. उनका विवाह दिल्ली के अनंगपाल तोमर तृतीय की दूसरी की पुत्री के साथ हुआ था. अनंगपाल की पहली पत्नी का विवाह कन्नौज के राजा   विजयपाल के साथ हुआ था. अनंगपाल के कोई बेटा नहीं था तो उन्होंने फैसला किया कि पृथ्वीराज चौहान को दिल्ली का राजा बना दिया जाए. पृथ्वीराज चौहान की मौसी का बेटा यानी मौसेरा भाई जयचंद इस बात से नाराज था उसने मोहम्मद गौरी को भारत पर हमला करने की सलाह ही नहीं दी हर तरह की मदद का आश्वासन दिया.

मोहम्मद गौरी भारत आने से डरता था कयोंकि उसके पास राजपूतों की बहादुरी के कई किस्से थे सालार मसूद की सेनाओं को 1934 में सुहेलदेव ने साफ कर दिया था. इस बात को सुनकर वो आक्रांत रहता था. आखिर जयचंद के कारण मोहम्मद गौरी भारत आया. हिंदू मुसलमान कही नहीं था तब भी. हां मोहम्मद गौरी जब भारत आया तो उसका साथ देने वाला दूसरा शख्स जम्मू का तत्कालीन हिंदू शासक था

अब सोचिए . भारत  की महान परंपराओं का पालन कौन कर रहा है. जिन्होंने भी भारत के गौरव की बात की इतिहास की बात की उसे तुमने गद्दार घोषित कर दिया.

जेएनयू से आवाज उठी तो उसे अर्बन नक्सल और टुकड़ा टुकड़ा गैंग घोषित कर दिया. फेक वीडियो आए और वहां के छात्र जेल में डाल दिए गए.

जामिया में छात्र देश के इतिहास के सबसे खतरनाक कानून का विरोध करने लगे तो उन्हें लाइब्रेरी में घुसकर मारा गया. गोलियां चलवा दी गईं कह दिय गया कि वो देश द्रोही हैं. पुलिस ने तो झूठ बोल दिया कि गोलियां नहीं चली हैं. वो तो भला हो मीडिया का कि उसने  पुलिस रिकॉर्ड से कागज़ लाकर बाहर रख दिए. लेकिन दमन हुआ.

आजकल शाहीन बाग है. एक आंदोलन खड़ा हुआ एक मुद्दा उठाया गया . मुद्दा जनता के सामने न पहुचे इसलिए आंदोलन पर भी तोहमतें लगा दी और उसे बदनाम करने के लिए पूरी ताकत से ट्रोल आर्मी जुट गई.

बड़ी बात ये है कि ये सभी लोग सेक्युलर हैं और सांप्रदायिक एजेंडे के खिलाफ हैं इसलिए इन्हें नुकसान पहुंचाया गया. अब भी मौका है . शाहीन बाग है. आगे बढ़ें देश को बचाने में योगदान दैं. आपस में लड़कर हमारी पीड़ियां बरबाद हो जाएंगी. मिलकर देश को मजबूत बनाएं.  ©गिरिजेश वशिष्ठ , आजतक के डिप्टी एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर का लेख, फेसबुक से साभार

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