लालकुआं इलाके में तनाव पर ये है कड़वा सच, हिंदू मुसलमान सबको पढ़ना चाहिए

दिल्ली के लालकुआं इलाके में दो पक्षों के बीच स्कूटर खड़ा करने को लेकर झगड़ा हुआ. एक सज्जन रात को मंदिर के सामने सड़क पर स्कूटर रख रहे थे. वहां बैठे दो तीन लोगों ने कहा कि यहां स्कूटर मत रखो यहां गाय आएगी तो बैठेगी. स्कूटर वाले साहब ने कहा कि हटा लेगें. ऐंठ के बोलना पुरानी दिल्ली की बीमारी है. और इसका शिकार स्कूटर वाले सज्जन हो गए. उनकी सड़क पर गाय बैठने के पक्षधर लोगों ने ठुकाई कर दी. ठुकाई होने के बाद उनके हाथ पांव टूटने से लेकर दुनिया से चले जाने तक की अफवाहें वाट्सएप पर शेयर हो गईं. दूसरी पार्टी ने भी कुछ ऐसी ही चीज़ें फैला दीं. मामला पुलिस में गया और देर रात तक थाने के बाहर हज़ारों लोगों की भीड़ जमा हो गई. आखिर में समझौता हुआ और लोग अपने अपने घर आ गए.
इधर लोग घऱ लौट गए थे और उधर अफवाहृ वाला मैसेज घूम रहा था. नेताओं द्वारा धर्म के नाम पर बेहद संवेदनशील बना दिए गए समाज में लोगों को भड़कते समय नहीं लगा और कुछ नौजवान जाकर मंदिर पर पत्थऱ फेंक आए. वहां शीशे टूट गए लेकिन किसी को कोई चोट नहीं आई. लेकिन इसके बाद वाट्सएप पर फिर खबर फैली की मंदिर को अपवित्र कर दिया गयाहै और कई मंदिर वालों को चोटें आई हैं. मामला बिगड़ गया.
जब मामला बिगड़ा तो पूरी दिल्ली से भगवा ब्रिगेड के लोग वहां जमा होने लगे. और अभी भी गाहे बगाहे ये सिलसिला चल रहा है. जो लोग पहुंच रहे हैं उन्होंने स्थानीय लोगों के साथ कुछ बदसलूकी भी की . इससे दंगा फिर भ़ड़कने की नौबत आ गई.
इधर दिल्ली में चुनाव नजदीक होने के कारण नेता मंडली ने भी आग में घी डालना शुरू कर दिया. लालकुआं के हिंदू मुसलमान मिलजुलकर रहते हैं. एक साथ खाते पीते हैं. जिन लोगों के साथ झगड़ा हुआ वो भी यहां के मुसलमानों की शादियों में खाना बनाने का काम किया करते थे. लेकिन उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि ये मामला मजहबी रंग ले लेगा.
ये पूरी घटना हुई बताना इसलिए जरूरी है कि पता न होने के कारण फिज़ा बिगाड़ने वाले इसका गलत फायदा उठाते हैं. इस रायते के फैलने के बाद स्थानीय हिंदू और मुसलमान दिन रात एक करके मामले को सुलझाने और माहौल ठीक करने में लग गए.बाज़ार तनाव के कारण बंद था और मज़दर काम धंधा खो रहे थे. जाहिर बात है रोज कमाने रोज खाने वालों पर ऐसा माहौल नागवार गुजरता है.
किसी तरह कांग्रेस के एक नेता और पूर्व मंत्री हारून युसुफ इसे ठीक करने में कामयाब रहे और उन्होंने अपनी जेब से मंदिर के शीशे बगैरह वापस लगवा दिए. अब स्थानीय स्तर पर शांति है और बाज़ार खुल चुके हैं जीवन पटरी पर लौट आया है और स्थानीय लोगों ने फिलहाल चैन की सांस ली है. लेकिन बाहर से आकर नारेबाज़ यहां रायता फैलाने के प्रयासों में लगातार लगे हैं.
जो रायतेबाज़ घटनास्थल पर जा रहे हैं उनके अलावा सोशलमीडिया पर भी एक रायता ब्रिगेड लगातार सक्रिय है. बड़े बड़े पढ़े लिखे माने जाने वाले लोग हिंदू बुद्धिजीवियों को निशाना बना रहे हैं कि वो मंदिर पर पत्थर फेंकने वाले लोगों के खिलाफ क्यों नहीं लिख रहे. कहा जा रहा है कि यही हमला अगर मस्जिद पर होता या कोई चर्च को आग लगाता तो ये लोग बढ़चढ़कर आलोचना कर रहे होते. लेकिन जिस तरह से मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने और पढ़े लिखे हर मुसलमान ने इस कृत्य की निंदा की है उसे वो नज़रअंदाज़ कर देना चाहते हैं.
ये वोही लोग हैं जो बचपन में दूसरों का शीशा तोड़ते थे और मार पड़ने पर अपने पिताजी से कहते थे कि गुप्ता जी का लड़का भी तो तोड़ता है आप उसे कुछ क्यों नहीं कहते. इनकी अल्पबुद्धि में इतना नहीं आता कि सब अपनी अपनी कौम को संभालेंगे तो ही माहौल ठीक होगा. राजनीतिक हितों के लिए सांप्रदायिक रूप से बेहद संवेदनशील बना दिए गए देश में आप क्यों चाहते हैं कि हिंदू लोग मुसलमानों की संवेदनशील मामलों पर निंदा करें और मुसलमान लोग हिंदुओं की. सब अपनी कौम को क्यों नहीं संभाल सकते. पापा आपकी शरारत पर आपको थप्पड़ मारने का अधिकार क्यों खो दें क्योंकि उन्होंने गुप्ता जी के बच्चे को थप्पड़ नहीं मारा था. गुप्ताजी अपने बेटे को खुद थप्पड़ मारें तभी वो सुधरेगा और तभी माहौल ठीक रहेगा. गुप्ता जी आपको थप्पड़ मारें और आप गुप्ताजी के बेटे को . ये तो दोनों परिवारों में झगड़ा लगवाने वाले ही चाहेगा ना. फिर आप ऐसा क्यों चाह रहे है. क्यों कहते हैं सांप सूंघ गया क्या?.
आप ध्यान देंगे तो पता चलेगा कि ऐसे सवाल पूछने वाले ज्यादातर एक खास विचारधारा के लोग हैं. ये वो लोग हैं जो घटना के बाद से लगातार वहां माहौल खराब करने जा रहे लोगों के वहां पहुंचने को उचित मानते हैं. वो चाहते हैं कि गुप्ता जी की फैमिली से संबंध खराब बने ही रहें. भाई अगर आप सचमुच देश को बेहतर बनाना चाहते हैं तो शांति कायम करने वालों के साथ खड़े हों. ऐसे लोगों को रोकें जो आपके समुदाय के हैं और आपकी तरफ से आपके नाम पर कहीं तनाव फैलाने का काम कर रहे हैं.
पुलिस और प्रशासन अपना काम कर रहे हैं. कई दंगाइयों को घर से उठाया भी गया है. लेकिन सबको समझना होगा कि हम कैसा देश चाहते हैं ? सब अपना अपना घर सुधारें. अपने अपने समुदाय को बेहतर बनाएं. धर्म की किताबों में लिखी गई बातों के हिसाब से चलने वाले लोग तैयार करें. मानवीयता सीखें और सिखाएं. हिंदू भी और मुसलमान भी. इस हादसे के बाद मुसलमानों ने अपने हुड़दंगियों की निंदा की है. उन्हें हतोत्साहित किया है . उनका साथ नहीं दिया है. हमें उनकी तारीफ करनी चाहिए साथ ही हमें अपने लोगों के साथ भी वही करना चाहिए जो उन मुसलमान बुद्धिजीवियों ने किया है. हमारे हिंदू बुद्धिजीवी बखूबी ये काम करने आए हैं. और कर रहे हैं लेकिन ये लोगों को बर्दाश्त नहीं होता इसलिए वो इन लोगों को निशाना बनाते हैं और कहते हैं कि तुम मुसलमानों पर हमले करो. और चूंकि तुम उन पर हमले नहीं करते हो . सिर्फ हम पर करते हो इसलिए तुम्हारी निंदा को हम नकारते हैं.तुम्हारे ज्ञान को खारिज करते हैं. हमारे सारे पाप क्षम्य हैं क्योंकि तुमने गुप्ता जी के बेटे तो थप्पड़ नहीं मारा. उम्मीद है उन लोगों को उत्तर मिल गया होगा जिन्हें लगता है कि हिंदू बुद्धिजीवी मुस्लिम सांप्रदायिकता को प्रश्रय देते हैं. या मुस्लिम बुद्धिजीवी हिंदुत्व को प्रश्रय देते हैं. फेसबुक पर पत्रकार गिरिजेश वशिष्ठ का लेख