क्या आप सचमुच देशभक्त हैं या फिर.. ये लेख बहुत कुछ कहता है

आप देश भक्त हैं. देश की आपको परवाह है. आप देश के लिए जीना और मरना चाहते हैं. लेकिन क्या देश भक्ति का मतलब देश के लिए लड़ना है. क्या देशभक्ति का मतलब किसी देश के वास्तविक या काल्पनिक दुश्मन के खिलाफ हुंकार भरना है. क्या देशभक्ति का मतलब किसी को भी बिना जान समझे शत्रु मान लेना है और उस अनजान शख्स के विनाश, मृत्यु, कष्ट और संहार की इच्छा रखना है. क्या देशभक्ति का मतलब दूध पीते बच्चों से लेकर 90 साल के बुजुर्ग पर कहर बरपा देना है. उन बच्चे और बुजुर्गों को जिनका कसूर उस भूभाग या भूखंड में रहना है जिसमें रहना उसका उसका उद्यम नहीं जिसमें रहना उसकी नियति है. क्या कल्पना कर सकते हैं कि कोई चार साल या दस साल का बच्चा कहे कि मुझे इस देश में नहीं उस देश में रहना है.

लेकिन आप उस बेकसूर इनसान से नफरत करने लगते हैं आप उससे नफरत करते हैं जो रोज़ पान बेचता है और घर चला जाता है. आप उस बेवड़े से नफरत करते हैं जो रोज़ कभी इस नाली तो कभी उस नाली मे पड़ा अपना जीवन गुजार रहा है और जो आपको जानता भी नहीं है. लेकिन आप नफरत करते हैं. आप उस बच्चे से भी नफरत करते हैं उस दुकानवाले से भी नफरत करते हैं, हर दूध के कड़ाहे वाले से नफरत करते हैं, हर अस्पताल की नर्स से नफरत करते हैं. हर स्कूल की मेड से नफरत करते हैं. हर बस कंडक्टर, हर ड्राइवर, हर होटल वाले, हर हलवाई, और हर फैक्ट्री में काम करने वाले गरीब मज़दूर से नफरत करते हैं जो उस देश में रहता है जिसके चुने गए या न चुने गए रहनुमा ने उस देश को आपके देश का दुश्मन घोषित कर रखा है.

आप नफरत करते हैं क्योंकि उस देश का रहनुमा युद्ध पिपासु है और वो अपने देश के लोगों के दुख दर्द और तकलीफों से मतलब नहीं रखता उसे अपने लोगों की भूख प्यास और गरीबी से मतलब नहीं है. उसे अपनी धरती के बच्चों की तालीम से उन्हें दूर रखना है. उसे अपने लोगों को सेहत देने में मुस्किल होती है. वो रहनुमा जो खुद विदेशों में ऐश करता है, वहीं की दवा खाता है. उसके दोस्त विदेशों में रहते हैं और वो रहनुमा नहीं चाहता कि जनता की इन तकलीफों पर बात हो तो वो किसी और मुल्क के खिलाफ हम जैसे मुल्क के खिलाफ लोगों को भ़डकाने में लग जाता है.

उसकी बातों से भड़ककर हम नफऱत से भर जाते हैं और उसका काम आसान करने में लग जाते हैं. अंदर से सोचते हैं कि हम देशभक्त हैं. लेकिन क्या यही देश भक्ति है.

हम जिस देश में रहते हैं उसकी मिट्टी से प्यार करना देशभक्ति नहीं है? उसके लोगों से प्यार बांटना देशभक्ति नहीं है? उसकी संपत्ति को बचाए रखना देशभक्ति नहीं है? देश की ज़मीन देश नहीं है, देश के लोग देश नहीं हैं. देश की संपत्ति देश नहीं है?

हमारे देखते देखते देश के नवरत्न लुट रहे हैं. बाल्को यानी भारत एल्युमिनियम कंपनी को सरकार ने बेच दिया जिसने खरीदा उसने पूरी कीमत सिर्फ कबाड़ा बेचकर निकाल ली. ये भारत की शान थी. इस कंपनी ने हमारे देश के विकास में मजबूत योगदान दिया था. 1965 में बनी ये कंपनी न होती तो देश का आधारभूत ढांचा तैयार नहीं होता

कोयला घोटाला हुआ. मुफ्त में देश के धन्नासेठों को ज़मीनें दे दी गईं. ऐसी ज़मीनें जो कोयले की खान थीं. जितना चाहो कोयला निकाल लो. लोगों को 25 गज का प्लॉट नहीं देने वाली सरकार. सात गज पर झुग्गी बनाकर रहने वालों को लाठियों से पीटपीट कर सुजा देने वाली सरकार. उनके सामान तो तबाह कर देने वाली सरकार कोयला खदाने मुफ्त में बाट रही थी. हम कैसे देश भक्त हैं हमें गुस्सा नहीं आया.

हमारी देशभक्ति तब क्यों नहीं जागती जब कौड़ियों के दाम पर देश के कारोबारियों, सत्ता के नज़दीक रहने वाले बाबाओं को अपने बिजनिस करने के लिए कौड़ियों में दी जाती है. हम चुप रहते हैं. क्या वो देश की संप्त्ति नहीं है. क्या वो उन लोगों की संपत्ति है जिन्होंने इसे बांट दिया.

हमने इंडियन एयरलाइंस का भी अंजाम देखा है. उसे जानबूझकर बर्बाद करने की कोशिश हुई .ताकि विजय माल्या और नरेश गोयल जैसे लोग अपना कारोबार जमा सकें.

बीएसएनएल का मामला ले लीजिए. उसमें काम करने वालों ने क्या कसर छोड़ी. समय पर तकनीक लाए. गांव गांव में नेटवर्क पहुंचाया . देश को देश समझा . सिर्फ पैसे वालों की सेवा नहीं की. गांव में संचार नेटवर्क बनाया क्या हुआ. बीएसएनएल का समझौता देश के सबसे बड़े लाला की मोबाइल कंपनी से देश के रहनुमाओं ने कर दिया . देश की कंपनी. देश की कंपनी का नेटवर्क और प्राइवेट कंपनी ने उसका दोहन कर लिया. आज बीएसएन बंद होने के कगार पर खड़ी है. क्या ये देशभक्ति नहीं है कि हम बीएसएनएल का कनेक्शन लें एक फोन वहां पोर्ट करा लें. यकीन मानिए सेवाएं बहुत अच्छी है सस्ती हैं मैं तो करा रहा हूं.

कुल मिलाकर देश का मतलब क्या होता है ये आपको समझाने की एक कोशिश थी. सत्ता के शीर्ष सिंहासन पर बैठे लोगों का पिछलग्गू बन जाना देशभक्ति नहीं होता. सरकार देश नहीं होती. देश सरकार से बड़ा होता है. सरकार सिर्फ एक संचालक मंडल है. जो देश की देखभाल करता है. जैसे आपकी सोसायटी का आऱडब्लूए या मोहल्ला सुधार समिति . अगर आप नज़र नहीं रखेंगे तो आरडब्लूए में घोटाला हो जाएगा. अगर आप नज़र नहीं रखेंगे तो देश में घोटाला हो जाएगा. और आप नज़र न रखें इसलिए आपकी नज़र को कहीं और घुमा दिया जाता है. नजर को ऐसी जगह लगा दिया जाता है जहां आपकी समस्याओं का हल नहीं है. ये नफरत करने की चीज़ नहीं है. ये मोहब्बत करने की चीज़ है. अपनी मिट्टी से मोहब्बत करने की चीज़. दोस्ती पर ध्यान दीजिए. नफरतें सिर्फ तबाह करती हैं. ©गिरिजेश वशिष्ठ

लेखक आजतक में वरिष्ठ पत्रकार है