इसलिए प्रशासन को हो रही है दंगा काबू करने में मुश्किल

राज धर्म , आज दंगों के समय आप राजधर्म शब्द का मर्म समझ रहे होंगे. इसलिए नहीं कि मैं सरकार पर भेदभाव पूर्ण कार्रवाई का आरोप लगा रहा हूं. बल्कि इसलिए क्योंकि आज दिल्ली को सबसे ज्यदा जरूरत है तो वो है प्रशासन और सरकार पर भरोसे की.

जब राजधर्म निभाया जाता तो शासन और व्यवस्था पर लोगों को भरोसा होता है तो वो कानून के हाथ में नहीं लेते एक विश्वास होता है कि सरकार ने कह दिया है तो अब वो संभाल लेगी. अगर राजधर्म निभाया होता तो आज हालात अलग होते. गृहमंत्री एक बार अपील करते कि प्रशासन पर भरोसा रखिए और आधे लोग मान लेते कि अब सरकार है सब संभाल लेगी. प्रशासन और पुलिस दंगाग्रस्त क्षेत्र में पहुंचती तो लोगों में सुरक्षा का एहसास आता. लगता कि अब सब संभल जाएगा. लेकिन अब स्थितियां सबसे अलग है.

एक जमाना था कि दंगे होते ही सारे अखबार और चैनल प्रशासन के पक्ष में हो जाते थे. बुद्धिजीवी प्रशासन के कंधे से कंधा मिलाकर चलते थे. यकीन था कि प्रशासन का उद्देश्य शांति की स्थापना होता है. वो हर हाल में शांति चाहता है.

लेकिन इस बार जब दंगे हुए तो एक नया शब्द था. शब्द था गुजरात मॉडल. .ये शब्द अतीत में राजधर्म न निभाने का फलित है. ये शब्द हो सकता है कि व्यंग्य में इस्तेमाल किया जाता हो लेकिन इसके साथ ही बड़ी खौफनाक सूचना लिपटी हुई है.सूचना ये कि एक खास पार्टी के शासन में पुलिस राजधर्म नहीं निभाती. सरकार पर इसे लेकर कई आरोप भी लगते रहे हैं. कहा जाता है कि गोधरा में दंगे हुए तो वो स्टेट स्पॉन्सर्ड दंगे थे. सरकार को द्वारा संरक्षित दंगे. वैसे ही दंगे जैसे 1984 में हुए थे. हमने भी देखा है कि कैसे भीड़ दुकानें लूटती थी और सरकारें पुलिस मुंह फेर लेती थी. वैसी ही पुलिसिंग जिसके कारण राम जन्मभूमि आंदोलन के बाद में लगातार उत्तर प्रदेश में हुई और जिसके कारण पीएसी पर सांप्रदायिक फोर्स का आरोप लगा.

ये भी पढ़ें :  पब्लिक ने बीजेपी पार्षद को पेड़ से बांधकर धुना, गालियां दी अलग से, गरीबों के घर तोड़ने गए थे नेताजी

ये सब बातें सिर्फ आरोपों में होती तो ठीक था लेकिन जब इन आरोपों की वो ही लोग पुष्टि करें जिनपर आरोप लगे हैं वो ही लोग गर्व से इनका जिक्र करें तो ये छवि जनता के दिमाग में पुख्ता होने लगती है कि प्रशासन निष्पक्ष नहीं है. इस पर भरोसा नहीं किया जा सकता. वारिस पठान के भड़काऊ भाषण को सबने सुना होगा. मुस्लिम समाज ने उसकी जिस कर ह निंदा की वो भी सबने सुना होगा लेकिन उसके जवाब में बीजेपी का विधान परिषद का सदस्य जब कहता है कि वारिस पठान गोधरा भूल गए तो वो पुलिस की निष्पक्षता पर सवालिया निशान भी लगाता है.

ये भी पढ़ें :  कपिल मिश्रा पढ़ लो, हिंदू खतरे में नहीं मुसलमानों के बीच सुरक्षित हैं

सिर्फ एक एमएलए या एक एमएलसी की बात होती तो ठीक था लेकिन जिम्मेदार लोगों ने दिल्ली जैसे छोटे राज्य का चुनाव जीतने के लिए जो आरोप लगाए  पुलिस की मौजूदगी में जैसे प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चली , उस सबसे जनता के मन में प्रशासन का विश्वास कमजोर ही हुआ.

जब ऐसे हालात हों तो कौन प्रशासन पर भरोसा करके चल सकता है. कौन ये जोखिम उठा सकता है कि प्रशासन पर पूरी तरह भरोसा किया जाए. ये सरकार की छोटी बदनामी नहीं है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जिनके कंधे पर देश की धर्म, जाति, प्रांत, भाषा और लिंग का भेद किए बगैर सुरक्षा की जिम्मेदारी है. वो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जब हालात को नियंत्रित करने के लिए खुद दंगाग्रस्त क्षेत्र में जाकर कोशिशें करते हैं तो वाट्सएप पर मैसेज तैरने लगता है कि अब इनको असली आजादी दी जाएगी. ये प्रशासन की निष्पक्षता पर सवाल ही है कि घर से मेहमान चला जाता है उसके बाद ही बच्चों की पिटाई होती है. ऐसे सैकड़ों पोस्ट सोशल मीडिया पर हैं जो सरकार विरोधी नहीं सरकार समर्थकों के हैं और जो ध़ड़ल्ले से कहते हैं कि प्रशासन निष्पक्ष होकर राजधर्म नहीं निभाएगा.

ये भी पढ़ें :  प्रधानमंत्री मोदी के साथ फिर जुड़ेंगे प्रशांत किशोर, सीधे मोदी से हो रही है बात ?

हालात इतने मुश्किल हैं जटिल हैं कि व्यवस्था पर भरोसा करने को कोई तैयार नहीं. खुद प्रदर्शनकारी भीड़ पर पथराव करने वाले , पुलिस को चेतावनी देने वाले कपिल मिश्रा सत्ताधारी पार्टी के नेता हैं. वो प्रशासन को धमकाते हैं. प्रदर्शन में शामिल लोगों के खिलाफ भड़काऊ नारे लगाते हैं. सीएए समर्थन के नाम पर सांप्रदायिक नारे लगाते हैं. लेकन पुलिस उन्हें गिरफ्तार नहीं करती. जो लड़का भीड़ पर गोली चलाता है उसे गिरफ्तार नहीं किया जाता. आखिर प्रशासन पर भरोसा जमे तो कैसे जमे. बुरी बात ये है कि प्रशासन पर भरोसा इस समय प्रशासन की नहीं देश की जरूरत है. प्रशासन पर भरोसा करना और उसका साथ देने की जरूरत है.

लेकिन अगर आप अपील करते हैं कि पुलिस पर भरोसा रखें तो न तो ए पक्ष न बी पक्ष आप पर विश्वास करेगा. यही राजधर्म न निभाने का साइड इफैक्ट है. ये राजधर्म शब्द की महत्ता है. राजधर्म का मतलब है राष्ट्रधर्म. संविधान की शपथ लेकर , संविधान के द्वारा दिए गए अधिकर प्राप्त करके , देश द्वारा दिए गए वेतन भत्ते और सुविधाओं पर सुविधापूर्ण जीवन जीने वाले अगर संविधान प्रदत्त जिम्मेदारी नहीं निभाएंगे तो बहुत मुश्किल होगी. न्याय होना ही नहीं चाहिए दिखना भी चाहिए. ये उक्ति न्याय वय्वस्था पर ही लागू नहीं होती सत्तातंत्र पर भी सटीक बैठती है. आजतक के पत्रकार गिरिजेश वशिष्ठ का लेख