राफेल मामले पर दोबारा होगी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई, मोदी सरकार को बड़ा झटका

सुप्रीम कोर्ट ने राफेल सौदे पर नरेंद्र मोदी सरकार को झटका दिया है. शीर्ष अदालत ने मोदी सरकार को दी गई क्लीरन चिट की पुनर्विचार याचिकाओं पर केंद्र की आपत्तियों को खारिज कर दिया है. तीन जजों की बेंच ने एकमत से कहा कि जो नए दस्ताीवेज सामने आए हैं, उनके आधार पर याचिकाओं का निपटारा किया जाएगा. याचिकाकर्ताओं ने विभिन्न अखबारों/पोर्टल्स पर छपी खबरों का हवाला देते हुए केंद्र को दी गई क्लीग चिट पर पुनर्विचार की मांग की थी.

पूर्व बीजेपी नेता यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी और वकील प्रशांत भूषण की तरफ से राफेल डील केस में अपने फैसले पर पुनर्विचार की मांग वाली याचिका को रद्द करने की मांग सरकार ने की थी. कोर्ट ने इस पर सभी दलील सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था. 

इससे पहले सुनवाई में सर्वोच्च अदालत ने कहा था कि राफेल डील के तथ्यों पर गौर करने से पहले वह केंद्र सरकार द्वारा उठाई गई प्रारंभिक आपत्तियों पर फैसला करेगा. दरअसल, केंद्र ने राफेल लड़ाकू विमानों से संबंधित दस्तावेजों पर विशेषाधिकार का दावा किया है और सुप्रीम कोर्ट से कहा कि साक्ष्य अधिनियम के प्रावधानों के तहत कोई भी संबंधित विभाग की अनुमति के बगैर इन्हें पेश नहीं कर सकता है. अटॉर्नी जनरल ने कहा कि कोई भी राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े दस्तावेज प्रकाशित नहीं कर सकता है और राष्ट्र की सुरक्षा सर्वोपरि है.

सरकार ने दिया देश की सुरक्षा का हवाला

सरकार का पक्ष रखते हुए अटॉर्नी जनरल ने पूर्व वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा, पत्रकार से नेता बने अरुण शौरी और सामाजिक कार्यकर्ता-वकील प्रशांत भूषण की तरफ से दायर याचिका को खारिज करने की मांग की थी. केंद्र सरकार ने कोर्ट में दलील दी कि तीनों याचिकाकर्ताओं ने अपनी समीक्षा याचिका में जिन दस्तावेजों का इस्तेमाल किया है, वह सरकार का विशेषाधिकार है. अटॉर्नी जनरल ने उन दस्तावेजों को याचिका से हटा देने की मांग की थी.

एजी के के वेणुगोपाल ने कहा था, मूल दस्तावेजों की फोटोकॉपी गैर-अधिकृत रूप से तैयार की गई है और इसकी जांच की जा रही है. हालांकि, सरकार के दावे के विरोध में वकील प्रशांत भूषण ने तर्क दिया था कि राफेल के जिन दस्तावेजों पर अटॉर्नी जनरल विशेषाधिकार का दावा कर रहे हैं, वे प्रकाशित हो चुके हैं और सार्वजनिक दायरे में हैं. उन्होंने कहा कि सूचना के अधिकार कानून के प्रावधान कहते हैं कि जनहित अन्य चीजों से सर्वोपरि है और खुफिया एजेंसियों से संबंधित दस्तावेजों पर किसी प्रकार के विशेषाधिकार का दावा नहीं किया जा सकता.