ये पोस्ट नहीं लताड़ है ‘बुद्दिजीवी, अपनी कमियों से मुंह नहीं चुरा सकते’

आप कहिए लोकतंत्र खतरे में है, आप कहिए चिंता का विषय है. छाती पीटिए, सिर धुनिए लेकिन ये पराजय है. आपकी पराजय. आपकी असफलता. ये संघ की जीत है. भारत के लोग नहीं मानते कि लोकतंत्र खतरे में है. अगर आप ये कहेंगे तो सामने खड़ा शख्स पूछेगा कि कैसे. वो नहीं जानता आपकी बात का मतलब. आप जिन संज्ञा सर्वनाम विशेषण और क्रियाओं के साथ अपनी बात समझाएंगे वो न तो उसे समझ में आएंगे न वो समझने का धैर्य रखता है. सच तो ये है कि आप स्वांत: सुखाय विमर्श में प्रसन्न हैं.

आप कहते हैं गरीब के मुद्दों को नहीं उठाया जा रहा लेकिन गरीब को नहीं पता कि उसके मुद्दे भी कुछ होते हैं. आप चिल्लाते रहिए बेरोज़गारी बढ़ रही है, बेरोज़गार कह रहा है कि दस साल वोट मत करो बस पाकिस्तान को सबक सिखा दो. चुनाव में रोटी कपड़ा मकान के मुद्दे नहीं उठते लेकिन अपनी दशा में मस्त देश को क्या सचमुच ये मुद्दे मुद्दे लग रहे हैं?

सच तो ये है कि आपकी चिंता विधवा विलाव घोषित कर दी गई है. सच तो ये है कि जिस बेरोज़गार और जिस गरीब की आप बात करते हैं वो आपको रुदाली गैंग कहने वाली गैंग में सारे दुख दर्द दिखाकर खड़ा है. आप कुछ नहीं कर सकते. आप बस चिंता व्यक्त करते हैं. आप गरीबी की बात करते हैं लेकिन गरीब से संवाद नहीं करते, आप बेरोज़गारी की बात करते हैं लेकिन उसके पास नहीं जाते. बस कभी कॉफीहाऊस में होने वाली बातेंअब थोड़े बड़े हॉल में होने लगी हैं और सोशल मीडिया भी आपकी बहस का हिससा बन गया है.

लेकिन बात आप खुद से करते हैं. एक दूसरे से करते हैं. पर उनसे नहीं करते जिनकी बात आप करते रहते हैं. आपके भाषण नीरस होते हैं, उबाऊ होते हैं, पारिभाषिक शब्दावलियों से भरे होते हैं और एक एक शब्द आप सा बखानते हैं. एक एक शब्द में जो पन्नाभर आप बखानते हैं वो लोग भूल चुके हैं. आपका हर शब्द एक लिंक है जिसे खोलने पर किताब सामने होती है. आप कहते हैं कि आप अशिक्षित गरीब लोगों के लिए लड़ते हैं वो आपकी इस महान भाषा को कैसे समझेगा.  

आपकी विचारधारा अच्छी है या बुरी है या कांग्रेस की तरह अनिश्चित है लेकिन उसके बारे में लोग जानते नहीं है. उसे पहचानते नहीं हैं. वो लोगों की रोज़मर्रा की बातों से जुड़ी नहीं है. लोग औरतों की बराबरी के पक्षधर हैं लेकिन इस विचार को लाने वाले को नहीं जानते. लोग असमानता दूर करने के हामी हैं लेकिन वो नहीं जानते कि आप ही ऐसे विचारों वाले हैं. वो तो समझते हैं आप भी दूसरों की तरह ये महान बातें बेचकर निकल जाना चाहते हैं.

आपका मुकाबला उस विचारधारा से है जो रोजमर्रा के मुद्दे उठाकर उन पर भावनात्मक मुलम्मे चढ़ाकर हर रोज़ तमाशा लूट रही है. वो देश में बेहद व्यापक जनाधार बना चुकी है लेकिन आपके पास अपनी विचारधारा का गुणगान है उसकी महानता के किस्से हैं लेकिन ये सब आपकी अपनी खुशी के लिए हैं.

मानिये या मत मानिए ये बीजेपी की विचारधारा की जीत है, बीजेपी की विचारधारा के प्रति समर्पण की जीत है. उसके अपनी विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए सतत काम किया है. लोगों के पास तरह तरह से लेकर गई है. उसने साम दाम दंड भेद से लोगों को जोड़ा है

दूसरी तरफ आप है. लगातार गिर रहे हैं. गिरते जा रहे हैं. लोगों से दूर जा रहे हैं. आप स्टीरियोटाइप हैं. आपकी बात आपकी खुद की समझ में आती है. और लोगों को ये समझ में आता है कि आप जो कह रहे हैं वो आपका रुदन, कृदन, नकारात्मकता और आत्ममुग्धता है. आप अपनी हार के बहाने ढूंढ रहे हैं. आप लुप्त हो रहे हैं. आप मानें या न मानें आप दुर्लभता की ओर जा रहे हैं. आप असफल हो रहे हैं. संसदीय राजनीति के ज़रिए बदलाव में आप असफल हुए. आप ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’  माने जा रहे हैं. मुझे लगता है शुरू से शुरू करें. थोड़ा गांव हो आएं, गरीब से मिल आएं. देख आएं कि आप जिसकी चिंता कर रहे हैं उसकी अपनी चिंताएं वही हैं जो आप समझते हैं या बदल गई हैं. (पत्रकार गिरिजेश वशिष्ठ का फेसबुक पोस्ट)