लॉक डाउन से इनके उपर मंडरा रहा है मौत का साया, कुछ करो सरकार

कोरोना वायरस से सबसे ज्यादा खतरे में बेघर लोग हैं. न तो उनके लिए रहने को घर हैं न खाने के लिए भोजन प्रधानमंत्री ने लोगों से घरों में रहने को कहा है लेकिन जिनके पास घर नहीं हैं वो घर में कैसे रहें.

जो लोग घर वाले हैं वो इनकी मदद के लिए नहीं आ सकते क्योंकि घर से निकलने पर रोक है. अभी तक जो दिन में दिहाड़ी या भीख मांग कर पेट भरते और फुटपाथों पर, फ्लाईओवरों के नीचे, अपने रिक्शा और ठेले पर रात गुजर कर लिया करते थे. अब समस्या ये है कि उन्हें भोजन कौन देगा.

दिल्ली सरकार ने हालांकि गरीबों के लिए भोजन की व्यवस्था की है ये व्यवस्था रैन बसेरों में की गई है. जाहिर बात है कि परिवहन के साधन न होने के कारण इन बसेरों में जाना आसान नहीं है दूसरा सबसे बड़ा खतरा भोजन के लिए सामूहिक रूप से रहना और खाना है. ऐसे में ये रोग फैलने से रोकने की हालत में नहीं होंगे.

दिहाड़ी मजदूर और आश्रित गुरुद्वारों में चल रहे स्थायी लंगरों की ओर रुख कर रहे हैं. यहां पिछले कुछ दिनों में जबरदस्त भीड़ देखी गई. लेकिन भीड़ ही तो कोरोना वायरस के खत्म होने में सबसे बड़ी अड़चन है.

इस बीच 50 से ज्यादा संगठनों से जुड़े शिक्षाविदों, बुद्धिजीवियों और सामाजिक वैझानिक आगे आए हैं. पीयूसीएल की कविता श्रीवास्तव, एनसीपासीआर की पूर्व प्रमुख शांथा सिन्हा, सामाजिक कार्यकर्ताओं में हर्ष मंदर, योगेंद्र यादव, निखिल ड , अर्थशास्त्री जयती घोष, आइआइएम बंगलूर के प्रोफेसर दीपक मलघान और हेमा स्वामीनाथन, आइआइटी दिल्ली के आदितेश्वर सेठ, ऐपवा की कविता कृष्णन, बगैरह ने सरकार को चिट्ठी लिखी है. चिट्ठी में जन वितरण प्रणाली के तहत अप्रैल से जून के लिए एक साथ मुफ्त अनाज, खाद्य तेल, दाल, नमक, मसाला, व साबुन मुफ्त में देने का सुझाव दिया गया है.

ऐसे में स्थिति ये है कि भूखे रहने वाले लोगों के लिए कही भी जिंदगी की आस नहीं है. वो अपनी जगह पर बने रहते हैं तो भूख से मरते हैं और भोजन के लिए सरकार और समाज के किए इंतजामों की ओर जाते हैं तो कोरोना से.