सुशांत की मौत पर ये है न्यूज़ चैनल न देखने वाले का लेख, कन्फ्यूजन की पराकाष्ठा

सुशांत से मेरा व्यक्तिगत तौर पर कोई नाता नहीं है, सिवाय उसके और मेरे भारतीय नागरिक होने के. इसके बावजूद सुशांत से मेरा बड़ा गहरा नाता है, बहुत सारे स्तरों पर. यही वजह है कि अब तक मैं लिखने से रुका हुआ था. दरअसल रुकने के दो कारण थे!

लिखना तो मैं उसकी मौत के तुरंत बाद ही चाहता था लेकिन रुक गया. मेरा टीवी 2 साल से बंद है, इसलिए टीवी कवरेज से मेरा कोई पाला नहीं पड़ा है. यह दरअसल एक अच्छी बात है क्योंकि सुशांत मामले को लेकर मेरी जो सोच है, वह एकदम निजी है और किसी पूर्वाग्रह से प्रभावित नहीं है.

सुशांत की मौत को लेकर 3 तरह की बातें चल रही है… एक राजनीतिक, एक लगातार बमबारी हो रही टीवी डिबेट्स और एक रिया समेत उनके परिवार का आकलन.

तीनों ही पार्टियों के अपने-अपने पूर्वाग्रह और स्वार्थ है और वह अपने तरीके से चल रहे हैं. ज्यादातर लोग इस कवरेज को देखकर या अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर राजनीतिक पूर्वाग्रह से ग्रसित होते हुए इसको एक लिमिटेड चश्मे से देख रहे हैं.

भारत में दो गुट बन गए हैं. बिल्कुल एक राजनीतिक व्यक्ति की तरह. एक सुशांत की तरफ है और दूसरा उससे जुड़ी हुई हर खबर पर नाक भौं सिकोड़ रहा है . इस बात को नजरअंदाज करते हुए कि मामला सुशांत का नहीं है.

लेखक राजेश शर्मा जाने माने पत्रकार और मीडिया कर्मी हैं. अपनी कलम से कई टीवी प्रोजेक्ट और समाचारपत्रों को धार दे चुके हैं.

किसी भी मौत का सच सामने आना चाहिए.

चाहे वह एक किसान की क्यों ना हो, चाहे निर्भया, जेसिका लाल, हेमंत करकरे, गौरी लंकेश, अखलाक, पहलू, रोहित वेमुला, पुलवामा, गलवान, मेरी गली या आप की गली, की क्यों ना हो. चाहे वह आरुषि की, प्रियंका रेड्डी की, आसिफा की क्यों ना हो. मौत ही क्यों किसी भी घटना का सच सामने आना चाहिए.

लेकिन इस मामले में अब कुछ लोगों का नजरिया टीवी पर 24 घंटे सुशांत की कवरेज देखकर एक अलग तरह का आक्रोश अख्तियार कर चुका है. सवाल तो यह बनता है कि जब आप जानते हैं कि टीवी प्रोपेगंडा का माध्यम बन चुका है तो आप टीवी क्यों देख रहे हैं और क्यों प्रभावित हो रहे हैं?

आप दरअसल ना चाहते हुए भी अनजाने में वहीँ उलझ रहे हैं, जहां वो ‘लोग’ आप को उलझाना चाहते हैं और आप खुद उनके उद्देश्य को सफल कर रहे हैं.

जिन्हें भी सुशांत की मौत की जांच से परेशानी है, उन्हें यह वादा करना चाहिए कि भविष्य में वह किसी और मौत पर जांच का सवाल नहीं उठाएंगे. लेकिन सच तो यह है कि अगर मैं उनकी टाइमलाइन चेक करूं तो उन्होंने विकास दुबे, पुलवामा, गलवान आदि की जांच की मांग भी उठाई होगी. अगर ऐसा है तो यह उनका दोहरा चरित्र उजागर करता है, अगर वह आरुषि की मौत की, आसिफा की मौत की जांच की मांग करते हैं तो सुशांत की मौत की जांच क्यों नहीं.

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…. क्योंकि आप उसके राजनीतिकरण, फिल्मीकरण या अन्य पहलुओं के कारण उस बात को लेकर एक अजीब सा उदासीनता और आक्रोश भरा रवैया अपना रहे हैं.

बल्कि मैं इससे एक कदम आगे जाकर साफ-साफ कहना चाहता हूं कि सुशांत की मौत से ज्यादा जरूरी है कि दिशा सालियान की मौत का राज खोजा जाए. अगर दिशा की मौत की गुत्थी सुलझा ली गई तो सुशांत सिंह की मौत की गुत्थी शायद अपने आप सुलझ जाएगी लेकिन सच तो यह है कि शायद ना दिशा की मौत का सच सामने आएगा, ना सुनंदा पुष्कर की, ना शीना मुखर्जी की, ना श्रीदेवी की, ना सैनिकों और किसानों की और ना ही सुशांत की.

दरअसल मीडिया और राजनीति के जाल में फंस कर लोग वही गलती कर रहे हैं, जो बाकी मुद्दों पर भी करते हैं. लोगों का फोकस मीडिया और सुशांत हो गया है, राजनीतिकरण हो गया है जबकि लोगों का फोकस सिस्टम होना चाहिए था. नहीं समझ में आया! दूसरे तरीके से बताता हूं.

लोगों का फोकस कोरोना से हुई मौतौं और अर्थव्यवस्था पर नहीं बल्कि पूरे सिस्टम के फेल होने पर होना चाहिए था लेकिन लोगों का फोकस कहीं और है.

…. बल्कि ज्यादातर मामलों में तो हर दूसरे-तीसरे दिन नए जुमले के साथ शिफ्ट होता है. यहां से मैं आपको आजादी की लड़ाई की तरफ ले जाता हूं. वहां पर हर भारतीय का फोकस एक था. किसी भी कीमत पर आजादी हासिल करना….. शायद इसीलिए आजादी हासिल हुई.

आज फोकस कहां है…

यह पोस्ट पढ़ेंगे. अगली पर कूद जाएंगे.

क्या आपने कभी सोचा है कि सिर्फ 5 मिनट के अंदर आप 10 पोस्ट देखते हैं.

एक किसी की सेल्फी, उस पर लव लगाते हैं,

एक किसी की मां की मौत की खबर, उस पर सैड लगाते हैं, नमन वाला कमेंट लिखते हैं.

अगली किसी के बच्चे के टॉप करने की खबर आप वाओ करते हैं…

उससे अगली पोस्ट पर कोई बीमार है, आप टेक केयर करते हैं…

अगली पोस्ट.. किसी ने बहुत बेहूदा किस्म की लगाई है. आप एंगर का आइकॉन लगाते हैं…

किसी की बात से सहमत हैं तो लाइक लगाते हैं.

कई मौकों पर आइकॉन से काम नहीं चलता तो कमेंट करते हैं..

और फिर अपना रोजमर्रा का काम छोड़ कर दो दो घंटे बहस में उलझे रहते हैं.

अगर आप अब भी नहीं समझे कि मैं क्या कहना चाहता हूं तो वह यह है कि 10 मिनट में आप 10 इमोशन जी रहे हैं.

और यह बदलाव सिर्फ और सिर्फ सोशल मीडिया और चैनलों की वजह से पिछले 10 सालों में आया है.

इस पर फिलहाल मैं और विस्तार में नहीं जाऊंगा क्योंकि यह अपने आप में एक बड़ी विकराल समस्या और मुद्दा है कि ऐसा क्यों हुआ है….

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असली पोस्ट पर वापस लौटें तो सच तो यह है कि सुशांत मामले पर ज्यादा लिखने पर मैं अब भी कतरा रहा हूं क्योंकि सुशांत की मौत के बाद अगले 3 दिनों तक मैं उसकी मौत के कारणों में उलझा रहा और पूरे कैरियर तथा घटनाक्रम का विश्लेषण करने के दौरान उसने मुझे वह नज़र दी, जिसने पिछले 30 साल में उठे कई अनुत्तरित सवालों और मौतों की कड़ियां जोड़ने में अंतर्दृष्टि का काम किया.

यहां पर मैं चार बातें स्पष्ट करना जरूरी समझता हूं. पत्रकारिता, फिल्म लाइन में मेरी रुचि, जन्मजात अनवरत जिज्ञासु स्वभाव और व्यक्तिगत समानताएं. यह चार ऐसे पहलू है, जिसकी वजह से फिल्म लाइन में हुई तमाम आत्महत्याएं, रहस्यमय मौतें या फिल्मी दुनिया की वर्किंग का तिलिस्म लगातार मेरे सोच के दायरे में शामिल रहे हैं.

आखिर में दो ऐसे सच, जिनसे कुछ लोग वाकिफ हैं और काफी लोग नहीं!

20 साल की उम्र में 1986 में ग्रेजुएशन का सफर पूरा करने से पहले ही मैं दिल्ली के श्रीराम सेंटर से एक्टिंग कोर्स कर चुका था और अगर स्थितियां अनुकूल होती तो शायद मैं एक्टर होता. संभावना इस बात की थी कि उस समय की सामाजिक, पारिवारिक और कैरियर से जुड़ी स्थितियों को देखते हुए शायद में सफल एक्टर ना बन पाता.

लेकिन अपने लिखने के हुनर की स्वाभाविक परिणति 1993 में ही मैंने स्क्रिप्टराइटर के तौर पर देखनी शुरू कर दी थी और 1999 तक उस दिशा में काम भी किया. अगर उसमें ठीकठाक सफलता मिल जाती तो शायद निर्देशन के बारे में भी सोचता लेकिन यह सब ख्याली पुलाव और मुंगेरीलाल के हसीन सपने श्रेणी में चला गया.

क्योंकि जिंदगी आप को नियंत्रित करती है…. आप जिंदगी को नहीं चलाते….

और वैसे भी तब तक व्यवहारिक और यथार्थवादी नजरिया होने की वजह से मुझे यह स्पष्ट हो चुका था कि सिर्फ काबिलियत के बल पर तो आप फिल्म लाइन में जगह नहीं बना सकते.

आख़िरी बात!

सुशांत ने आत्महत्या की या नहीं की, नहीं पता परन्तु कुछ लोग एक कुतर्क जरूर जमकर पेश कर रहे हैं.वो कुतर्क यह है कि सुसाइड नोट तो है नहीं पर है सुसाइड ही.

मैं उन सब लोगों से एक दो टूक सवाल पूछना चाहता हूं.

अगर आप सुशांत को विलक्षण नहीं मानते, तो समझदार तो मानते ही होंगे.

समझदार नहीं मानते होंगे तो औसत बुद्धि का तो मानते ही होंगे.

तो क्या एक औसत बुद्धि का आदमी ही, आज के हालात में, बिना सुसाइड नोट के आत्महत्या कर सकता है????

यह जानते हुए भी, कि उसके जाने के बाद उसके करीबियों को, किस तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है.

मैंने सुशांत की जगह खुद को रखकर सोचा, आप भी खुद को रखकर सोचिए.

अगर आपमें औसत बुद्धि भी है, तो आपको अपने सवाल का जवाब मिल जाएगा….