68 लोगों की हत्या में बच गया असीमानंद, क्योंकि RSS से जुड़ा था ?

क्या मोदी सरकार ने संघ से जुड़े होने के कारण समझौता एक्सप्रेस बम कांड के आरोपियों को बचाया ? क्या असीमानंद सचमुच आतंकवादी था लेकिन सरकार की जानबूझ कर अपनाई गई ढील ने उसे छुडवा दिया? क्या समझौता एक्सप्रेस बम कांड में मारे गए 68 लोगों का हत्यारा कोई नहीं था ?  उन्हें किसी ने नहीं मारा ? क्या एनआईए की ढिलाई नहीं होती तो असीमानंद को समझौता मामले में अदालत से मुक्ति नहीं मिलती ? ये बातें किसी और ने नहीं खुद मामले में जज ने फैसले में लिखी जो टिप्पणी लिखी हैं उनसे दिमाग में आती हैं.

जाने माने पत्रकारों के न्यूज़ पोर्टल सत्य हिंदी ने मामले के फैसले के आधार पर ऐसी ही आशंकाएं जाहिर की है. पोर्टल कोर्ट के फैसेल के हवाले से लिखता है कि राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने 2014 में सत्ता बदलने के बाद केस को जानबूझकर कमज़ोर किया.

इस मामले में फ़ैसला देने वाले पँचकुला स्पेशल कोर्ट के जज जगदीप सिंह ने कहा है कि ऐसे बहुत सारे सबूत अदालत के सामने पेश ही नहीं किए गए जो अभियुक्तों के ख़िलाफ़ केस को मज़बूत कर सकते थे, वे. उन्होंने अपने 160 पेज के फ़ैसले में कहा है कि इसी कारण उनको सभी अभियुक्तों को बरी करना पड़ा और ‘असली मुजरिम’ सज़ा से बच गए. यह विस्तृत फ़ैसला कल सार्वजनिक किया गया.

इस सिलसिले में जज ने चार प्रमुख ‘चूकों’ का उल्लेख किया है जो अगर नहीं होतीं तो ‘असली मुजरिम’ बच नहीं निकलते. जज के अनुसार ये चूकें क्यों होने दी गईं, यह तो जाँच एजेंसी ही जानती है.

NIA ने अपने एक गवाह डॉ. रामप्रताप सिंह के हवाले से दावा किया था कि असीमानंद ने 2008 में भोपाल में एक मीटिंग में ‘बम के बदले बम’ के सिद्धांत का समर्थन करते हुए कहा था कि ‘जिस तरह जिहादी हिंदुओं के धर्मस्थलों पर हमला कर रहे हैं, उसी तरह हिंदुओं को भी उसका जवाब देना चाहिए.’ डॉ. रामप्रताप सिंह ने बाद में NIA के दावे का समर्थन नहीं किया. लेकिन सरकारी वकीलों ने न तो इस संबंध में अदालत से किसी प्रकार की कार्रवाई की अनुमति माँगी न ही गवाह को उसके पिछले बयान पर क्रॉस एग्ज़मिन किया.

NIA के जाँच अधिकारी ने कहा था कि पुरानी दिल्ली स्टेशन पर सीसीटीवी कैमरे लगे हुए थे. यह फ़ुटेज दोषियों के विरुद्ध पक्का सबूत होता. लेकिन NIA ने उस सीसीटीवी फ़ुटेज की जाँच करके ऐसा कोई फ़ुटेज उपलब्ध नहीं कराया जो अभियुक्तों को दोषी ठहराता.

NIA ने दावा किया था कि ट्रेन में फटने से रह गए जो दो सूटकेस बम मिले थे, उसके कवर इंदौर कोठारी मार्केट के एक टेलर ने सीए थे और उन कवरों को सीनेवाला एक ही व्यक्ति था. लेकिन इस सबूत को पुख़्ता करने के लिए अभियुक्त की जो शिनाख़्त परेड होनी चाहिए थे, वह नहीं कराई गई.

एनआई के दावे के अनुसार कॉल रेकॉर्ड से पता चलता है कि इस कांड का मास्टरमाइंड सुनील जोशी फरवरी 2007 में कोठारी मार्केट, इंदौर में था (जहाँ सूटकेस के कवर सीए गए थे) और उसी साल फ़रवरी-मार्च के महीनों में प्रज्ञा जोशी, असीमानंद, सुनील जोशी और संदीप डांगे की आपस में और दूसरे संदिग्धों और अभियुक्तों के साथ लगातार बातचीत होती थी. लेकिन NIA ने इसके पक्ष में न तो कोई कॉल डेटा रेकॉर्ड पेश किया और न ही उन मोबाइल फ़ोन का स्वामित्व साबित करने वाला कोई रेकॉर्ड कोर्ट के सामने रखा.

NIA ने जानबूझकर अपने दावे के पक्ष में सबूत अदालत के सामने नहीं रखे, जिससे अभियुक्तों के ख़िलाफ़ केस कमज़ोर हो गया. यही काम NIA ने सुनील जोशी हत्याकांड वाले मामले में किया था, उसमें भी जज ने प्रज्ञा सिंह समेत सभी अभियुक्तों को बरी करते हुए जाँच एजेंसी के बारे में ऐसी ही तीखी टिप्पणी की थी.

आपको याद होगा कि मालेगाँव मामले में NIA की वकील रह चुकी रोहिणी सालियान 2015 में कह चुकी हैं कि उनपर दबाव डाला जा रहा था कि मालेगाँव मामले में जाँच को ’धीमा’ चला जाए. बाद में NIA ने उनको अपने वकीलों की टीम से हटा दिया.

2 टिप्पणियाँ

  1. क्या एन आई ऐ इस आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील करेगी। क्या मोदी साहिब इस आदेश के खिलाफ कोर्ट में जाएंगे सुरक्षा के नाम पर

  2. Author

    सरकार ने फैसला किया है कि वो अदालत में अपील नहीं करेगी

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