इस तरह भारत में लूट मचा रही हैं बहुराष्ट्रीय कंपनियां, सरकार भी नहीं दे रही साथ

भारत की कंपनियों , भारत के व्यापारियों और भारत के किसानों को मल्टी नेशनल कंपनियां जैसे चाहें लूट रही हैं लेकिन सरकार इस बारे में न तो कुछ करती है न कुछ बोलती है. पिछले दिनों आपने खबर पढ़ी होगी कि कैसे गुजरात में किसानों को आलू उगाने के लिए पेप्सीको ने उन पर सैकड़ों करोड़ रुपये का केस कर दिया और बाद में केस वापस लेने के नाम पर किसानों के सामने समझौता करने की शर्त रखी गई.

अब जो मामला सामने आया है वो अमेरिका की चर्चित फूड चेन मैकडॉनल्ड्स का है. कंपनी पिछले दस साल से भारत में मैक्डोनाल्ड के  और भारत में कंपनी के एमडी विक्रम बख्शी के बीच के 10 साल पुराने विवाद की चर्चा एक बार फिर होने लगी है. इस विवाद की वजह से साल 2017 से मैकडॉनल्ड्स के कई स्टोेर बंद पड़े रहे. लेकिन अब मैकडॉनल्ड्स इंडिया और विक्रम बख्शी के बीच के विवाद का सेटलमेंट होने वाला है. हालां‍कि इस पर नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT)ने रोक लगा दी है. लेकिन सवाल है कि मैकडॉनल्ड्स और विक्रम बख्शी के बीच विवाद की शुरुआत क्यों  हुई थी. आज हम आपको सिलसिैलेवार इस बारे में बताने जा रहे हैं.

बात की शुरुआत साल 1995 से करते हैं. पूरा मामला समझने के लिए साल 1995 में जाना होगा. इस साल विक्रम बख्शी और मैकडॉनल्ड्स ने 50:50  फीसदी की हिस्से दारी के साथ एक ज्वाइंट वेंचर बनाया.

इस वेंचर का नाम कनॉट प्लाजा रेस्टोरेंट लि. यानी CPRL था. यह समझौता 25 साल के अवधि के लिए किया गया. इस ज्वा्इंट वेंचर कंपनी को मैकडॉनल्ड के नाम से देश के उत्तरी और पूर्वी क्षेत्र में रेस्त्रां चेन खोलने का जिम्मा दिया गया.

विक्रम बख्शी और मैकडॉनल्ड्स के बीच विवाद की शुरुआत पहली बार साल 2008 में हुई. तब मैकडॉनल्ड्स ने CPRL में बख्शी की 50 फीसदी हिस्सेदारी खरीदने की कोशिश की थी. यह मामला दुनिया की निगाहों में तब आया जब 2013 में बख्शीा को मिसमैनेजमेंट का आरोप लगाते हुए CPRL के प्रबंध निदेशक के पद से हटा दिया गया.

इसके बाद सितंबर 2013 में बख्शी नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) पहुंच गए. एनसीएलटी ने बख्शीब के पक्ष में फैसला सुनाया और उन्हें फिर से पद पर बिठा दिया गया. अब बारी मैकडॉनल्ड्स की थी और कंपनी ने बख्शीम को पद पर बिठाने के फैसले को नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) में चुनौती दे दी.

इस बीच, अगस्त 2017 में मैकडॉनल्ड्स ने CPRL के साथ फ्रेंचाइजी एग्रीमेंट खत्म कर लिया. इसके बाद उत्तर और पूर्व भारत के करीब 165 मैकडॉनल्ड्स आउटलेट्स अचानक बंद हो गए. लेकिन इस साल मई के शुरुआती हफ्ते में मैकडॉनल्ड्स और CPRL ने NCLAT को कहा कि वे सेटलमेंट करना चाहते हैं.

इसके बाद NCLAT ने दोनों कंपनियों को सेटलमेंट की शर्तें जमा करने का निर्देश दिया. लेकिन इस बीच अब आवास एवं शहरी विकास निगम (हुडको) ने याचिका दायर कर दी है. हुडको विक्रम बख्शीी से अपना बकाया वसूलना चाहती है.

इस मामले ने कोक को भी याद दिला दिया है. जब भारत में कोका कोला आई तो उसने पार्ले ड्रिंक्स कंपनी को खरीदने की कोशिश की पहले कंपनी झुकने को तैयार नहीं थी. उसके प्रोडक्ट मार्केट में धूम मचा रहे थे. थम्स अप और लिम्का जैसे ब्रांड को हिलाना भी मुश्किल था. कंपनी को नुकसान पहुंचाने के लिए कोका कोला ने नयी बॉटल का आकार 300 मिली लीटर कर दिया. इससे पहले भारत में कोल्डड्रिंक 200 मिली लीटर की बोतल में बिका करते थे. कोला कंपनियों का सबसे बड़ा इनवेस्टमेंट खाली बोतलों में ही होता था. दौर भी कांच की बॉटल्स का था. एक झटके में पारले ड्रिंक्स का का सारा वारदाना बेकार हो गया.

आखिर थम्स अप और लिम्का बानाने वाली कंपनी पारले ड्रिंक्स को कोका कोला ने खरीद लिया. कैम्पा कोला इस मार को नहीं झेल पाई और धन की कमी के कारण सिमट गई.