जानिए भारत की किस चीज के दीवाने हैं चीनी, सबसे ज्यादा होती है एक्सपोर्ट

दुनिया चीन का माल इंपोर्ट करती है लेकिन एक चीज़ ऐसी है जो चीन भारत से इंपोर्ट किए बगैर रह ही नहीं सकता. ये ऐसी चीज़ है जिसके लिए चीन एडवांस पैसे देने को तैयार रहता है. ये चीज़ है भारत की समुद्री झींगा (PRAWN) मछली तथा कुछ अन्य समुद्री खाद्य पदार्थ (Sea Food). चीनियों को हमारा सी फूड इतना पसंद आता है कि वह इसके लिए 30 फीसदी एडवांस दे देता है और जैसे ही माल उसके यहां पहुंचता है. 100 फीसदी पेमेंट हो जाता है. इसके उलट अमेरिका या यूरोपीय देशों को पैसे बाद में खाते कमाते दिए जाते हैं. यानी उधारी या एलसी (LC). यही वजह है कि अभी भारत से सी फूड का सबसे ज्यादा निर्यात चीन को ही होता है.

मरीन प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथारिटी (MPEDA) के अध्यक्ष के. एस. श्रीनिवास हैं. उनका कहना है कि यूं तो वर्ष 2019-20 के दौरान सी फूड का उतना निर्यात नहीं हो पाया. जितना कि इससे एक वर्ष पहले हुआ था. लेकिन अच्छी बात यह रही है कि चीन में हमारा निर्यात तेजी से बढ़ा है. इस समय यदि वॉल्यूम टर्म में देखें तो वर्ष 2019-20 के दौरान देश से कुल 6.52.253 टन सी फूड का निर्यात हुआ. इसमें से 3.29.497 टन सीफूड सिर्फ चीन को गया. यह हमारे कुल निर्यात का 25.55 फीसदी है. इसके बाद अमेरिका का नंबर आता है. वहां इस साल 3.05.178 टन सीफूड का निर्यात हुआ जो कि कुल निर्यात का 23.66 फीसदी है.

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यदि वॉल्यूम के हिसाब से देखें तो बीते एक साल के दौरान चीन को भेजे जाने वाले सी फूड की मात्रा में 46.10 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. वर्ष 2018-19 के दौरान चीन को हमने 2.25.519 टन सी फूड भेजा था. जो कि इस साल बढ़ कर 3.29.497 टन पर पहुंच गया. इसमें से अधिकतर Frozen Shrimps है. जिसकी ज्यादा कीमत मिलती है. यदि डॉलर के हिसाब से देखें तो पिछले एक साल में चीन को हमारे निर्यात में 69.47 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है.

ट्रेड प्रोमोशन काउंसिल आफ इंडिया (TPCI) के अध्यक्ष मोहित सिंगला का कहना है कि सी फूड के निर्यात में चीन हमारा अच्छा ग्राहक है. वहां किये जाने निर्यात के बदले भारतीय निर्यातकों को एडवांस में 30 फीसदी राशि मिल जाती है. जैसे ही हमारा माल वहां के बंदरगाह पर उतर गया. शेष 70 फीसदी राशि का भी भुगतान हो जाता है. दूसरी ओर यदि हम किसी अन्य देश. यहां तक कि अमेरिका या यूरोपीय देश में भी सी फूड भेजते हैं. तो वहां उधारी यानी कि लेटर आफ क्रेडिट पर माल भेजा जाता है.

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लेटर आफ क्रेडिट (Letter of Credit) का भी कॉस्ट होता है. जो भी निर्यातक एलसी के जरिये माल भेजते हैं. वह एलसी की सुविधा के लिए बैंक को एक से दो फीसदी का भुगतान करते हैं. इसलिए उनका मार्जिन कम हो जाता है. इसके विपरीत चीन को होने वाला निर्यात कैश एंगेस्ट डोक्यूमेंट (CAD) के जरिये होता है. उसमें निर्यातक पर कोई अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ता है.

सिंगला का कहना है कि चीन हमारे पड़ोस में है. इसलिए टर्नअराउंड टाइम कम है. यदि हम पानी के जहाज से भी वहां सी फूड भेजें तो 15 से 25 दिन में वहां के हर बंदरगाह तक पहुंच जाता है. इसके उलट अमेरिका भेजने में 45 दिन तो आराम से लग जाते हैं. कुछ बाधा हुई तो इससे ज्यादा दिन भी लग सकते हैं. ऐसे में यदि कोई निर्यातक जितनी अवधि में अमेरिका दो बार माल भेज पाता है. उतने दिनों में ही चीन कई बार माल चला जाता है.