हिंदुओं को गद्दार कहने पर गुस्से में उबला पत्रकार, पढ़िए पोस्ट

पूरा एक हफ्ता हो गया. जिसे देखो जो चाहे कहकर चला जाता है. हिंदुओं को दिन रात गालियां. कोई कुछ कह रहा है कोई कुछ. सोशल मीडिया सेल रोज़ रोज़ मैसेज बना रही है और हमारे वाट्सएप ग्रुप में लगातार बौछार चल रही है. कोई कहता है कि तुम गद्दार हो. कोई कहता है तुम गुलाम रहने के ही लायक हो. कोई कहता है आने वाले वक्त में तुम खत्म हो जाओगे. क्यों भैया क्यों गद्दार हैं.

आपको वोट नहीं दिया तो गद्दार हो गए. आप हार गए तो गद्दार घोषित कर दिया. चुनाव जीत रहे थे तब तो पूछा नहीं. खुद शंकराचार्य कह रहे हैं कि गौरक्षा के लिए कुछ नहीं किया. अब उनको भी कांग्रेसी कह देना. ये मत मानना कि तुम खुद नालायक हो. जो खुले दिल से स्वतंत्रविचारों के साथ अपनी बात कहता है उसे देश द्रोही और गद्दार कह देते हो. तुमने समाज तो सही रास्ता दिखाने वाले बुद्धिजीवियों को देश द्रोही कहा. उन्हें कांग्रेसी कहा. कहा कि वो सत्तातंत्र की मलाई काटते थे अब बंद हो गई है इसलिए तुम्हारी निंदा करते हैं. लेकिन कितना और किसे झूठ ठहराओगे. तुम्हारे अपने अलावा दुनिया में कोई सच्चा नहीं है क्या.

पहले सबको हिंदुओं का दुश्मन बताते थे अब हिंदू ही दुश्मन दिखने लगे तुम्हें. क्यों बगैरह बगैरह. अरे सच तो ये हैं कि तुम्हारी आंतड़ियों से ये दर्द इसलिए निकल रहा है क्योंकि तुम हार चुके हो. ये खिसियाहट है. हार जाने की खिसियाहट . तुम्हारे हाथ में अब कुछ नहीं बचा है जिससे तुम ये उम्मीद करो कि तुम हिंदुओं का भला कर सकोगे इसलिए तुमने उन्हें ही कोसना शुरू कर दिया जिनके कारण तुम्हारा वजूद है. जिन्होंने उम्मीद के साथ तुम्हें ज़िम्मेदारी दी और मौका दिया. लेकिन तुमने क्या दिया. गालियां. एक कैराना क्या हार गए तुमने हिंदुओं को जयचंद कहना शुरू कर दिया. तुम्हें वोट दें तो पृथ्वीराज न दें तो जयचंद.

खुद गालियां नहीं दे पाते तो दूसरों के नाम से दिलवाते हों. मंथरा के बाप तो तुम हो, जयचंद के फूफा तो तुम हो जो दूसरों का झूठा नाम लगाकर लगाई बुझाई करते हो. खुद गालियां देकर जी नहीं भरता तो कभी किसी मुसलमान महिला के मुंह से गालियां दिलवाकर आग लगाते हो तो कभी किसी का आधा अधूरा बयान काटकर मज़ाक उड़ाते हो.

तुम लोग ऐसी छोटी-छोटी हार पर पूरी कौम को धिक्कार भेज रहे हो. क्या समझते हो हिंदु तुम्हारे गुलाम हैं. तुम जिसे कहोगे उसे वोट देंगे और नहीं देंगे तो तुम उन्हें गद्दार बता दोगे. हिंदू क्या मुसलमान, सिख, ईसाई, पारसी, जैन, बौद्ध हर इनसान तुम्हें वोट देगा पहले इनसान तो बन जाओ. ये अजीब सी गुंडई पेल रखी है. जो चाहो करने को कहते हो. न करे तो गालियां देते हो. वोट न दो तो गद्दार, तुम्हारे निकम्मेपन पर सवाल उठाए तो गद्दार, गालियां देनी है तो खुद को दो जो लोगों की उम्मीदों से गद्दारी कर रहे हो. वोट लेकर भूल जाते हो. अब भी मौका है. सुधर जाओ. जो वादे किए हैं उन्हें 2021 पर मत डालो, 2022 पर मत टालो, काम करो काम, वर्ना सोशल मीडिया पर गालियां देते रह जाओगे. पत्रकार गिरिजेश वशिष्ठ का फेस बुक पर लेख

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