निधन: लहू से मेरी पेशानी पे हिन्दुस्तान लिख देना, के साथ थम गई राहत इन्दौरी की शायरी

राहत इंदौरी का निधन हो गया है. जी हां जाने माने शायर राहत इंदोरी नहीं रहे. राहत इंदौरी की शायरी हमेशा बुलंद इरादों की शायरी कहराएगी. राहत इंदौरी के शेर वो शेर थे जो सत्ता के सांप्रदायिक होते जाने के तौर में सीना तानकर खड़े थे. उन्होंने लिखा. सभी का खून है शामिल यहाँ की मिट्टी में ‘किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है’ (Kisi Ke Baap ka Hindustan Thodi hai), राहत कहते रहे बुलाती है मगर जाने का नहीं और खुद चले गए. जाते जाते राहत कह गए.. मैं मर जाऊं तो मेरी एक अलग पहचान लिख देना, लहू से मेरी पेशानी पे हिन्दुस्तान लिख देना.

राहत इंदौरी कोरोना की चपेट में आ गए थे और इन्दौर के अस्पताल में उन्होंने आखिरी सांस ली. राहत ने ट्वीट के ज़रिए अपनी बीमारी का हाल सुनाया था. इंदौर में उन्हें देर रात को अस्पताल में भर्ती कराया गया है. ये जानकारी उन्होंने खुद ट्वीट कर दी है. उन्होंने लिखा, ‘कोविड के शुरुआती लक्षण दिखाई देने पर कल मेरा कोरोना टेस्ट किया गया, जिसकी रिपोर्ट पॉजिटिव आई है. ऑरबिंदो हॉस्पिटल में एडमिट हूं, दुआ कीजिए जल्द से जल्द इस बीमारी को हरा दूं.’

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शायर राहत इंदौरी ने अपने ट्वीट में लोगों से अपील की है कि उनके बारे में जानकारी के लिए बार-बार उन्हें या परिवार को फोन न करें, इसकी जानकारी ट्विटर और फेसबुक के माध्यम से मिलती रहेगी.

शायरी की दुनिया के चमकते सितारे राहत इंदौरी ने कई तरह की शायरी की. ग़ज़ल, नज़्में पढ़ीं जो खूब मशहूर हुईं. वहीं, राहत इंदौरी ने कुछ ऐसा भी रचा, जिसमें चुनौती भी है और चुनौती बनकर टकराने का माद्दा भी. ‘किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है’ (Kisi ke baap ka Hindustan thodi hai) राहत इंदौरी की ऐसी ही ग़ज़ल है, जो पैग़ाम भी बन चुकी है. ये ग़ज़ल न सिर्फ लोकप्रिय हुई, बल्कि आंदोलनों में लोगों द्वारा अपनी बात कहने का जरिया भी बना ली गई. पढ़ें… Also Read – मशहूर शायर राहत इंदौरी हुए कोरोना का शिकार, खुद ट्वीट कर बोले- दुआ कीजिए इसे हरा दूं

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अगर खिलाफ हैं, होने दो, जान थोड़ी है

ये सब धुँआ है, कोई आसमान थोड़ी है

लगेगी आग तो आएंगे घर कई ज़द में

यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है

मैं जानता हूँ कि दुश्मन भी कम नहीं लेकिन

हमारी तरह हथेली पे जान थोड़ी है

हमारे मुंह से जो निकले वही सदाक़त है

हमारे मुंह में तुम्हारी ज़ुबान थोड़ी है

जो आज साहिब-इ-मसनद हैं कल नहीं होंगे

किराएदार हैं जाती मकान थोड़ी है

सभी का खून है शामिल यहाँ की मिट्टी में

किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है.

आखिर राहत भी हिंदुस्तान की जमीन पर ही सुपुर्दे खाक होंगे. उनका खून भी इसी मिट्टी का हो गया.