कहीं ये विरोध मोशाह के जाने की आहट तो नहीं, पत्रकार का विश्लेषण

ये मजाक नहीं है कि जेएनयू मामले में उद्योगपति आनंद महेन्द्र खुलकर सामने आते हैं. मैरिको कंपनी के किशोर मारी वाला खुलकर सीएए पर लिखते हैं. अनुराग कश्पप बेहद मुखर तरीके से सरकार पर हमले करते हैं. दीपिका पादुकोणे जेएनयू पहुंच जाती है. वरुण धवन छात्रों पर हमला करने के खिलाफ खड़े हो जाते हैं. एक लंबी लिस्ट है सेलेब्रिटीज की जो अब खुलकर सामने आने लगे हैं. पहले जावेद अख्तर जैसे लोग भी संतुलन बनाते हुए ही बोला करते थे.

दो दो नोबल पुरस्कार विजेता खुलकर बोल रहे हैं. पूर्व जज, पूर्व वित्तमंत्री , पूर्व नौकरशाह. आपको नहीं लगता कि अचानक ये हिम्मत कहां से आ गई. कल तक जो लोग चुप-चाप बैठे थे. सहमे हुए थे अचानक मुखर कैसे हो गए?

बाहर वाले तो दूर खुद संघ की विचारधारा के लोग आरएसएस के काडर रहे लोग. विश्व हिंदू परिषद के काडर खुलकर बोल रहे हैं.

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मेरी समझ में इसकी दो वजह हैं. पहली वजह है. अलग अलग राज्यों से बीजेपी का हटते जाना. जाहिर बात है मुंबई से बीजेपी के हटने का मतलब ये है कि असहमति की आवाज़ को वहां खुलकर नहीं कुचला जा सकता. आप गेटवे ऑफ इंडिया पर बैठे हैं तो कोई आपको लाठियां नहीं मारेगा. आप पर दिल्ली में जेएनयू के जुलूस निकालने वाले छात्रों की तरह न तो लाठियां चलाई जाएंगी न जामिया की तरह कोई लाइब्रेरी में घुसकर तबाही मचाएगा. प्रदर्शनकारियों पर गोलिया चलाकर इस सच को छिपा जाने की सुविधा भी पुलिस के पास नहीं होगी.

यूपी की तरह कोई आपके पोस्टर गली मोहल्ले में नहीं लगाएगा. दंगाइयों को पकड़ने के नाम पर गोलियां नहीं चलेंगी. और पॉइंट ब्लैंक से गोली मारने वालों को खौफ होगा.

जो मध्यवर्ग के लोग हैं उनके पास खोने को कुछ होता है. वो नापतौल कर लड़ते हैं. उनका विरोध नपातुला होता है. वो नफे नुकसान का फायदा गिन लेते है. यही वजह है कि उन्हें खोने का डर कम लग रहा है. डर कम होने की एक वजह सीएए पर लोगों के मुखर विरोध का सामने आना भी है. देश भर में हिंदू मुस्लिम सिख इसाई सैक्युलर संविधान की हिफाजत के लिए सड़कों पर उतरे. व्यापक विरोध हुआ. अब जब सेलेब्रिटीज मुंह खोलते हैं तो उन्हें लगता है कि उनके लिए आवाज उठेंगी. देश में सहमी हुई चुप्पी नहीं होगी जैसी शाहरुख और आमिर के मामले में हुई थी. वैसा भी नहीं होगा जो सम्मान लौटाने वाले साहित्यकारों या कन्हैया कुमार के साथ हुआ था.

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यही वजह है कि राहुल बजाज हो या आनंद महेन्द्रा आवाज निकलने लगी है. यही वजह है कि अंबानी भी अब थोड़ा चंदा कांग्रेस को देने लगे हैं. इसका पता राहुल गांधी के भाषणों से आसानी से लग जाता है. अब वो अपने भाषणों में अंबानी नहीं अनिल अंबानी शब्द का इस्तेमाल करने लगे हैं. दिल्ली में अगर बीजेपी फिर से हारती है तो इससे उसकी हालत और खराब होगी. जब दिमाग से भय का साया हटता है तो कर्मचारी और अधिकारी भी दिल की बातें सामने लाने लगते हैं. गडकरी के गढ़ में बीजेपी की बुरी हार हम हाल ही में देख भी चुके हैं.

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हालात देखकर साफ लगता है कि विरोध आने वाले समय में और मुखर होगा. और जैसे जैसे विरोध मुखर होगा. हालात और बदलेंगे. एक चीज़ मानकर चलें. दर्द सिर्फ दूसरी विचारधाराओं के मन में नहीं खुद बीजेपी के अपने संघ वालों में भी है. जो सामने वाले की ताकत को देखकर चुप हैं. सबको डर लगता है कि कहीं तोगड़िया, शत्रुघ्न सिन्हा या अडवाणी न बना दिए जाएं. बालात बदलेंगे तो आवाज़ें वहां से भी उठेंगी. अब वो दिन गए कि सोशल मीडया पर मैन्युफैक्टर्ड जानकारियों के जरिए दुनिया बदल दी जाए. (आजतक के पत्रकार गिरिजेश वशिष्ठ का फेसबुक पेज)

1 Comment

  1. ऊपर जिन लोगों का नाम लिखा गया है, वे सब 2019 से पहले भी थे और तब भी तमाम तरह की कहानियां बना कर जनता को गुमराह करने की नाकाम कोशिश कर चुके हैं लेकिन मोशाह का कुछ भी नहीं उखाड़ सके क्योंकि ये ये सोशल मीडिया का युग है और जनता को पता है कि क्या सही है !

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