इसे पढ़कर किसी भक्त का भी दिमाग घूम जाएगा, नीम से भी कड़वी सच्चाई

मंदी है. काम धंधे ठप पड़े हैं. आप पूंजीवाद के रास्ते पर चलने वाली सरकार हो लेकिन अमेजॉन का भारत में निवेश आता है. वो 1 अरब डालर भारत में लगाने जा रहे हैं. कोई शर्तें नहीं रखी जातीं. अगले पांच साल में दस लाख नौकरियां देने का भी प्रस्ताव लेकर आते हैं. लेकिन निवेश के लिए दर दर चक्कर लगाने वाली सरकार जैफ बेजो के प्रस्ताव पर ऐसे मुंह बनाती है जैसे कोई गुनाह हो गया हो, वजह बताई जाती है कि वाशिंगटन पोस्ट मोदी जी के खिलाफ लेख छापता है. उसके मालिक बेजो साहब है.

क्या ड्रामा है भारत मंदी से जूझ रहा है. नौकरियां जा रही हैं. बेरोज़गार आत्म हत्या कर रहे हैं. और मोदी जी निजी आलोचना बर्दाश्त नहीं कर पाते इसलिए उन्हें निवेश अखर रहा है. जीडीपी डूबती है तो डूबने दो. देश का पीएम देश से बड़ा हो गया है.

दूसरा मामला. आपने एक सेक्युलर देश होते हुए सांप्रदायिक सीएए का वरण किया. ये इतना बड़ा राष्ट्रीय हित का मुद्दा था कि देश के अंदर के विरोध को तो आप सुन ही नहीं रहे बाहर के गुस्से को भी जीभ चिढा रहे हैं. हालत ये है कि मलेशिया ने भारत की सीएए को लेकर निंदा की तो उससे खाद्यतेल का निर्यात करने से ही इनकार कर दिया. लोग महंगा खाद्य तेल खरीद रहे हैं. जनता लुट रही है. एक लीटर तेल पर 25 रुपये तक की बढोतरी हो चुकी है लेकिन आपकी नाक सबसे ऊंची है. लोग मरते हैं तो मरें.

उधर 15 बिलियन डॉलर की अरामको के साथ अंबानी की रिलायंस पेट्रोलियम की डील खतरे में पड़ गई है. वजह वही है देश के खिलाफ बनता माहौल. धार्मिक आधार पर भेदभाव की नीति से बेहद बुरा संदेश जाना.

अर्य़व्यवस्था का हाल ये है कि भारत के फिसलने के कारण पूरे विश्व की अर्थयव्यवस्था लड़खड़ाने लगी है. ये कोई और नहीं अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का विचार है. उसने दुनिया की आर्थिक प्रगति का अनुमान घटा दिया है और कहा है कि भारत की अर्थव्यवस्था की फिसलन के कारण दुनिया का अनुमान भी कम कर दिया गया है.

एक तरफा अकड़ की नीतियां. हठधर्मी, खुद को देश से ऊपर समझना जैसी अहंकारी प्रवृत्तियां अब देश को बेहद नाज़ुक मुहाने तक घसीट लाई हैं. आब भी नहीं जागे तो कब जागेंगे सरकार. कुछ कीजिए कमजोर विपक्ष था तो जनता सड़क पर आ गई . अब उससे मत अकड़िए . बात चीत कीजिए. मसले सुलझाइये. थोड़ी आलोचना सुनने की आदत डालिए. (आजतक के पत्रकार गिरिजेश वशिष्ठ का फेसबुक पोस्ट)