ऐसा मई दिवस मनाने से क्या फायदा ? ये पढ़कर आंखें खुल जाएंगी, गोली खाकर भी क्या मिला ?

लो फिर मई दिवस आ गया है लेकिन पूरी सदी से ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद मई दिवस पर देश का मज़दूर या कहें मेहनतकश या कहें कर्मचारी वहीं का वहीं खड़ा है. 1889 से लेकर 1989 तक सौ साल में जो हालात बदले थे वो फिर से बिगड़ गए हैं. 1889 में जिस चीज को लेकर पूरी दुनिया ने प्रस्ताव पारित किया वो फिर बिखरी पड़ी है. पिछले करीब 28 साल में मज़दूरों का शोषण फिर से बढ़ा है.

 

आज की हकीकत इन बातों से आसानी से समझी जा सकती है…

 

  1. पहले सरकारी अस्पतालों और कार्यालयों में पक्के कर्मचारी होते थे लेकिन उनकी जगह अब ठेके पर न्यूनतम मजदूरी पर काम करने वाले कर्मचारी लेते जा रहे हैं.
  2. पहले कर्मचारी 8 घंटे काम करते थे और उन्हें 1886 की मई दिवस की अवधारणा के चलते 8 घंटे काम करना होता था. अब ज्यादातर सिक्योरिटी गार्ड, मजदूर, अस्पतालों में काम करने वाले नर्सिंग स्टाफ और हाऊस कीपिंग समेत कई कर्मचारियों को 12 घंटे काम करना होता है.
  3. देश के नामी संपादक और पत्रकार भी 9 घंटे की शिफ्ट करने को मजबूर हैं. देश के सभी मीडिया हाऊसेस में ये शोषण जारी है. दुनिया भर के शोषण के खिलाफ खबरें दिखाने का दावा करने वाले लोग खुद शोषित हैं. पत्रकारों को काम के घंटे के अलावा कभी भी छुट्टी के लिए दफ्तर बुला लिया जाता है.
  4. नौकरी किसी की पक्की नहीं रही. पहले कर्मचारी को निकालने से पहले नोटिस देना पड़ता था. जांच होती थी. उसके बाद दोषी पाए जाने पर निकालने का नोटिस दिया जाता था. कानून आज भी वही है( हालांकि मोदी सरकार ये कानून बदल रही है) लेकिन कर्मचारियों को डरा धमकाकर लोग इस्तीफा लिखवा लेते हैं.
  5. ज्यादातर दफ्तरों, फैक्ट्रियों और दूसरी काम की जगहों से यूनियन गायब हो चुकी है. कर्मचारियों की सुनवाई थाना पुलिस और दूसरी जगहों पर कभी नहीं होती.

 

 

ऐसे शुरु हुआ मई दिवस

 

वर्ष 1886 में शिकागो शहर के हेमार्केट चौक पर जब मजदूरों ने अपने हितों के बारे में जब आवाज बुलंद की थी तब उस विरोध प्रदर्शन को बंदूकों की फायरिंग से दबा दिया गया, किंतु प्रदर्शनकारियों की मौत ने विश्व समुदाय का ध्यान मजदूर वर्ग की समस्या की ओर आकृष्ट किया. वर्ष 1889 में आयोजित अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में हेमार्केट नरसंहार में मारे गए निदरेष लोगों की याद में ‘1 मई’ को के रूप में मनाने की घोषणा की गई. मजदूर दिवस मनाने के साथ-साथ मजदूरों के काम के घंटों की अवधि 8 घंटे निर्धारित की गई और साप्ताहिक अवकाश होना सुनिश्चित किया गया.

 

भारत में मजदूर दिवस की शुरुआत

 

भारत में मजदूर दिवस पहली बार 1923 में चेन्नई में मनाया गया. इस दिन मजदूरों को अवकाश प्रदान किया जाता है. दरअसल श्रमिक दिवस को न सिर्फ भारत में, बल्कि पूरे विश्व में एक विरोध के रूप में मनाया जाता है. ऐसा तब होता है जब कामकाजी पुरुष व महिला अपने अधिकरों व हितों की रक्षा के लिए सड़क पर उतरकर जुलूस निकालते हैं. विभिन्न श्रम संगठन व ट्रेड यूनियन अपने-अपने लोगों के साथ जुलूस, रैली व परेड निकालते हैं. जुलूस के अलावा बच्चों के लिए तरह-तरह की प्रतियोगिताएं आयोजित होती हैं, जिसमें वे हिस्सा लेते हैं और एकजुटता के सही मतलब को समझते हैं. इस तरह बच्चे एकता की ताकत, जो श्रमिक दिवस मनाने का सही मतलब है, समझ सकते हैं. इससे मजदूर दिवस के प्रति सामाजिक जागरूकता बढ़ती है.

 

इन सबके अलावा इसी तारीख को 1960 में बंबई को भाषा के आधार पर दो हिस्सों में विभाजित कर दिया गया था तथा गुजरात और महाराष्ट्र का स्वतंत्र राज्यों के रूप में उदय हुआ था. इसीलिए गुजरात और महाराष्ट्र में मई दिवस इनके स्थापना दिवस के रूप में बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है. श्रमिक दिवस एक ऐसा अवसर होता है, जब दुनिया के सभी मजदूर वर्ग की सच्ची भावना को समझ कर उसका जश्न मनाते हैं. यह एक ऐसा दिन है जब सभी श्रमिकों को एक साथ सबके सामने अपनी ताकत, एकजुटता दिखाने का मौका मिलता है, जो यह दर्शाता है कि श्रमिक वर्ग अपने अधिकारों के लिए कितने प्रभावी ढंग से सकारात्मक रूप में संघर्ष कर सकता है.

 

समाज के अंतिम पायदान पर खड़ा व्यक्ति

 

वे लोग, जो मजदूर को गुलाम समझते हैं, उनका हक मारते हैं साथ ही उनका शोषण करते हैं, उनको यह समझना चाहिए कि मजदूर तुच्छ नहीं है, बल्कि मजदूर समाज का एक महत्वपूर्ण अंग है. वह समाज का आधार स्तंभ है, नींव का पत्थर है, जिस पर ‘समाज और देश’ की आकर्षक इमारत खड़ी है. मजदूर समाज के अंतिम पायदान पर खड़ा वह व्यक्ति है, जो अपने पसीने की बूंदों से मेहनत के कतरों को जोड़-जोड़ कर समाज के अन्य वर्ग के सपनों की इमारत को खड़ा करता है. जिसके बदले में मजदूर (श्रमिक) को मिलते हैं मात्र मुट्ठी भर पैसे, जो न तो उसे सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक व पारिवारिक सुरक्षा देने में सक्षम हैं, न हीउससे वह ठीक से अपने परिवार का भरण-पोषण कर पाता है.

 

सराहनीय कदम उठाए

 

शाम को मिली मजदूरी के साथ पेट की भूख तो मिटती है साथ ही शुरू होती है अगले दिन ‘मजदूरी (काम)’ मिलेगी या नहीं, इसकी जद्दोजहद. बहुत आवश्यक है, इस वर्ग को आर्थिक व सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध कराना. यद्यपि सरकारों ने श्रमिक लाभकारी योजनाओं के माध्यम से सराहनीय कदम उठाए हैं, जो किसी मजदूर के लिए बहुत उपयोगी हैं, किंतु ‘लाभ’ की उपलब्धता की पहुंच वांछित वर्ग तक है या नहीं इसको सुनिश्चित करना अति आवश्यक कार्य है. मजदूर वर्ग केवल निर्माण कार्य में संलग्न कंक्रीट, सीमेंट से सना हुआ व्यक्ति ही नहीं है, बल्कि फाइलों के बोझ में दबा हुआ या लैपटॉप/कंप्यूटर स्क्रीन से 15-15 घंटे तक जूझता वह ऑफिस का व्यक्ति भी है, जिसे ओवरटाइम, न्यूनतम मजदूरी, बोनस तथा ग्रेच्युटी इत्यादि मिलने वाले हितलाभों से वंचित रखा जाता है.

 

सवा सौ साल से अधिक समय बीते

 

मजदूर दिवस मनाते हुए सवा सौ साल से अधिक समय बीत चुका है. पहले की अपेक्षा ना अब उस तरह की दिक्कतें हैं और ना ही बड़ी-बड़ी और सशक्त मजदूर यूनियनें ही हैं. अब ज्यादातर जॉब्स भी ‘ब्लू कॉलर’ से ‘व्हाइट कॉलर’ में बदल चुकी हैं. इसलिए कुछ लोग इस दिवस के महत्व को कम आंकने लगे हैं, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अगर इस दिन की शुरुआत न होती तो फैक्टियों और कार्यालयों में कार्य की दशाएं आज इतनी ठीक भी न होतीं. अगर कामगार एकता न दिखाते तो शायद आज भी हम हफ्ते के सातों दिन कार्य कर रहे होते और लाखों-करोड़ों बच्चे ‘बालश्रम’ का दंश झेल रहे होते तथा गर्भवती महिलाएं भी मातृत्व हितलाभ पाने के लिए संघर्ष कर रही होतीं.

 

सुधारों की और गुंजाइश

 

मजदूर वर्ग के हितों में सुधार हुआ है, पर अभी बहुत से और सुधारों की और गुंजाइश है. मजदूर वर्ग हमारे समाज का अभिन्न और महत्वपूर्ण अंग है. यदि कहीं मजदूर पर अन्याय/अत्याचार हो रहा हो तो इस बात को सार्वजनिक करना और उस अनीति के खिलाफ आवाज उठाना प्रत्येक नागरिक का फर्ज है तथा मजदूर दिवस मनाने का वास्तविक उद्देश्य. और अंत में : ‘मेहनत उसकी लाठी है. मजबूत उसकी काठी है. हर बाधा वो कर देता है दूर. दुनिया उसे कहती है मजदूर.’

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