मरकज मामले में असली दोषी तो केजरीवाल की सरकार है ?

आखिर तब्लीगी जमात मरकज में बीमार हुए लोगों का दोषी कौन है. कौन है जिसे देश भर में कोरोना फैलने के लिए जिम्मेदार माना जाना चाहिए. क्या ये मरकज़ में शामिल हुए लोग हैं या कोई और ? देश भर में कोरोना के जो मरीज मिल रहे हैं उनमें करीब तीस फीसदी लोग ऐसे हैं जो दिलली में तब्लीगी मरकज़ के जलसे में शामिल होने आए थे. ये सच है कि मरकज में आए लोगों में कोरोना बुरी तरफ फैला, ये भी सच है कि सबसे ज्यादा पीड़ित भी दिल्ली की इस इमारत से ही निकले. लेकिन क्या इनको बीमार करने के लिए सजा के हकदार सरकार में बैठे लोग नहीं हैं. आप केजरीवाल और अमित शाह का नाम भी जोड़ सकते हैं.क्योंकि दिल्ली पुलिस अमित शाह के पास है और दिल्ली सरकार केजरीवाल के पास . दोनों के ही मातहत इस खेल में लगे रहे.

मरकज की इमारत में जिन लोगों को कोरोना हुआ वो ही इसके दोषी कैसे हो सकते हैं. आप आंख बंद करके उन्हें कोसने लगेंगे तो आप उन लोगों को छोड़ देना चाहते हैं जो देश की इतनी बड़ी महामारी में तीस फीसदी योगदान के लिए जिम्मेदार हैं. कौन जिम्मेदार है इसका फैसला आप दोनों पक्षों की बात सुने बगैर कैसे कर सकते हैं..

नीचे तारीखबार घटनाक्रम है जो मरकज की तरफ के सच को बयान करता है. कैसे एक तरफ लॉकडाउन था बाहर निकलना अपराध घोषित कर दिया गया था  दूसरी तरफ पुलिस दबाव डाल रही थी कि परिसर खाली करो और तीसरी तरफ प्रशासन जाने के लिए इंतजाम नहीं होने दे रहा था. आसान बनाना चाहें तो सरकारी अमले ने मरकज के परिसर को कोरोना वायरस का फॉर्म बना दिया था जहां कोरोंना लगातार पनपता रहा.

क्या वो गुनहगार नहीं जिन्होंने 40 अलग अल देशों से आए 1000 लोगों को एक ही कैंपस में बंद कर दिया और उन्हें एक दूसरे से संक्रमित होने देते रहे. क्या बिना सोचे समझे इतने बड़े लॉकडाउन का एलान करने वाले दोषी नहीं. लेकिन जल्दी नतीजे पर पहुंचना ठीक नहीं होगा. पहले हमें पहले क्रोनोलॉजी को समझना होगा.

21 मार्च को मरकज का पांच दिवसीय कार्यकर्म दिल्ली में शुरू होता है. कार्यक्रम में 40 देशों के मेहमान आते हैं. भारत के भी लोग होते हैं और वहां करीब 1000 विद्वान पांच दिन के इस समारोह के लिए जुटते हैं.( सभी धार्मिक लोग ऐसे लोगों को विद्वान ही कहते हैं, हम भी मानकर चलते हैं हालांकि धर्म की विद्या पर हमेशा बहस रही है.)

100 साल से होते आ रहे इस आयोजन में 40 देशों से लोग आते हैं. और कोरोना के लिए देश में बाहर से आने वालों की जांच होती ही नहीं. हम सरकार को इस बात की रियायत दे सकते हैं कि कुछ लोग काफी पहले आ गए होंगे इसलिए जांच नहीं हुई लेकिन सभी एक साथ उसी दिन आए ये बात हजम होने वाली नहीं है. तो ये चालीस देशों के जमाती जमात में लेने आए.

जिस दिन जमात शुरू हुई उसी दिन 21 मार्च की तारीख थी. भारत में रेलगाड़ियां बंद करने का एलान कर दिया गया. बसें भी बंद कर दी गई. जमातियों को लगा होगा कि पांच दिन का सम्मेलन खत्म होते होते कुछ हो जाएगा. और इसके अलावा कोई विकल्प भी नहीं रहा होगा.

जमात के अगले दिन ही यानी 22 मार्च को प्रधानमंत्री मोदी ने देश में जनता कर्फ्यू का एलान कर दिया. जमात के सम्मेलन को इस एलान के बाद खत्म कर दिय गया और सभी लोग जमात के बड़े से भवन के अंदर शिफ्ट हो गए. कुछ लोग कमरों में तो कुछ बरामदों में. ये लोग फंस चुके थे लेकिन जनता कर्फ्यू खत्म होने के बाद लोगों के पास समय था कि वो घर चले जाएं.

रात 9 बजे जनता कर्फ्यू खत्म हुआ और पीएम ने अगले दिन सुबह 6 बजे से लॉक डाउन का एलान कर दिया. प्रधानमंत्री के एलान के बाद मरकज़ में फंसे हुए लोग अपने अपने तरीकों से निजी वाहनों से या किसी और तरीके से वापस भागे. करीब 1500 लोग अलग अलग तरीकों से घऱ चले गए. इन लोगों में से कुछ के अंदर कोरोना का वायरस घर कर चुका था. मरकज के पास इस बीच इसके अलावा कोई चारा नहीं था कि करोना के हालात होते हुए भी वो लोगों को अंदर ही रखता और उसने रखा. आपके ही घर में अगर शादी समारोह है. पचास मेहमान आएं और कर्फ्यू लग जाए तो आप क्या करेंगे. ठहराना ही पड़ेगा.

अगले दिन यानी 24 मार्च को हजरत निजामुद्दीन थाने के एसएचओ  ने एक नोटिस दिया जिसमें कहा गया था कि परिसर को बंद कर दिया जाए. इसी दिन यानी नोटिस में एक दिन की देरी किए बगैर ही मरकज वालों ने जवाब दिया कि हम खाली कर ही रहे हैं 1500 लोग जा चुके हैं और बाकी एक हजार के करीब लोगों को भेजना का इंतजाम किया जा रहा है. मरकज ने लिखित में एसडीएम से कहा कि देश और विदेश के फंसे हुए लोगों को बाहर भेजने के लिए वाहनों को पास दे दिए जाएं. कुल 17 वाहनों की बाकायदा रजिस्ट्रेशन नंबर के साथ जानाकारी एसडीएम को दी गई कहा गया कि इन वाहनों से हम अलग अलग जगह तक इन लोगों को पहुंचाएंगे. जिसकी परमिशन आखिर तक नहीं दी गई.

यानी लॉक डाउन घोषित कर दिया. लोग परिसर में बंद हैं एसएचओ कह रहा है इनहो यहां से हटाइए. लेकिन हटाने के लिए वाहन की इजाजत नहीं दी जा रही. जाहिर बात है बीमारी अंदर फैलती रही और सरकार लाल फीते वाले खेल खेलती रही.

25 मार्च को यानी लॉकडाउन के तीसरे ही दिन तहसीलदार को मेडिकल टीम के साथ मरकज भेजा गया. मेडिकल टीम ने मरकज में  मौजूद लोगों की सेहत की जांच की. उन्होंने परिसर का मुआयना भई किया.

26 मार्च को एसडीएम ने मरकज के लोगों को बैठक के लिए बुलाया. बैठक में डीएम भी मौजूद थे. फिर से मरकज ने वाहनों के परमिट की मांग की.  

27 मार्च को मरकज़ के 6 लोगों को मेडिकल चेकअप के लिए लेजाया गया.

28 मार्च को मरकज में एसडीएम और डब्लूएचओ की टीम मरकज पहुंची और 33 लोगों को मेडिकल जांच के लिए राजीवगांधी अस्पताल ले गई. इसी दिन एसीपी का सख्त पत्र आया कि लॉकडाउन में परिसर खाली किया जाए. एक तरफ पुलिस परिसर खाली करने को दबाव बना रही थी दूसरी तरफ लॉकडाउन में बाहर निकलने की मनाही थी और तीसरी तरफ बसों के लिए परमिटन हीं दिए जा रहे थे. एसीपी की चिट्ठी के जवाब में मरकजने बताया कि लोगों के निकालने के लिए क्या किया जा रहा है.

30 मार्च को एक खबर सोशल मीडिया पर आई कि मरकज में कोरोना के मरीज यानी कोविड 19 के मरीज मौजूद हैं. इसी खबर को मेनट्रीम मीडिया ने उठा लिया. सीएम केजरीवाल ने भी इसी आधार पर कार्यवाही के आदेश दे दिए. लेकिन मरकज का कहना है ये अफवाह थी. आगे की कहानी आप जानते ही हैं (फेसबुक पर पत्रकार गिरिजेश वशिष्ठ का लेख)

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