कर्फ्यू तो हो गया मोदी जी, अब कोरोना से कब लड़ोगे

गलती एकबार होती है मूर्खता बार बार होती है. आपको समझाया कि नोट की लाइन में खड़े होने से देश बदल जाएगा. आपने आतंकवाद खत्म होने से लेकर काला धन खत्म होने तक हर बात पर बहस की. झूठ के झुनझुने आपके हाथ में पकड़ा दिए गए. हाथ में झुनझुने लेकर आपने गाली गलौज की. आप जिनको अक्ल थी उन्हें बेवकूफ कहते रहे, लड़े भिड़े, हाथ में क्या आया मंदी, बेरोज़गारी और दुर्दशा.

डोकलाम पर चीन के समान के बहिष्कार का झुनझुना आपको पकड़ाया गया आप बजाते रहे. नेता जी चाइना गए, झूला झूले, काला चश्मा लगाकर मूर्ति के साथ फोटो खिंचवाए और आपका चीन विरोध फुर्र हो गया . डोकलाम पर वीर रस चला. नेता जी ने चुपचाप सेना वापस बुला ली . आप का ओज़ समाप्त हो गया. थोड़े बहुत झूठ सच के बाद आप वापस बैठ गए. लेकिन बुद्धि हैं कि भक्ति भाव में गहरे डूबी हुई है. बीमारी आयी, सरकार ने हाथ में थाली की शक्ल का झुनझुना थमा दिया.

आप फिर इसे क्रांतिकारी कदम बता रहे हैं. सोशल मीडिया पर वैसी ही हाई लेवल की इंटेलीजेंट झूठ की बहार आ गई है. कहा जा रहा है एक दिन घर में रहने से सड़क पर मौजूद वायरस भूखा मर जाएगा . तालियों की गड़गड़ाहट मनों में गूंज रही है. परम पढ़े लिखे फॉरवर्ड पर फॉरवर्ड कर रहे हैं. वहीं नोट बंदी जैसे बदलाव की उम्मीद है. जो वायरस 14 दिन चुपचाप पड़ा रहता है उसे भागने के इस इवेंट मैनेजमेंट वाले आइडिया पर आप मुग्ध हैं. कुछ दिन बाद फिर मैसेज फॉरवर्ड करेंगे.

भारत विश्वगुरु था. फिर पूछेंगे कि इसमें गलत क्या है. फिर कहेंगे आप एक आदमी का विरोध करते करते देश के खिलाफ हो गए हैं. कहेंगे आप नेगेटिव हैं क्युकि आप हर बार हमें मूर्ख बनने से रोकते हैं. सच है उल्लू बनने का अपना सुख है. कम से कम उल्लू आपको चैन से जीने देते हैं.