मुसलमानों के बगैर कैसे जियोगे प्यारे, ये लेख आंखें खोल देगा

क्या क्या खाना बंद करोगे, कुल्फी , शाही टुकड़ा, मुरब्बे, अचार, गुलाब जामुन, समोसा, कुल्चा, पनीर ये सब बाहर से ही आए हैं. क्या क्या पहनना बंद करोगे. पजामा, पेंट, हौजरी का कच्चा ये सब भी बाहर से ही आए हैं. कुर्ता भी अपना नहीं है. और तो और अगर दादा कोंडके स्टाइल पट्टे वाला अंडरवेयर पहनना चाहोगे तो वो भी विदेशी है. मुगलों से बहुत कुछ आया है यहां, अंग्रेज़ों के साथ भी, पुर्तगालियों के साथ भी और फ्रांसीसियों के साथ भी. कुछ उनके आने से पहले ही आ गया और कुच उनके आने के साथ. बहुत सा ऐसा है जो आने के बाद आया है.

हम कट्टर हो ही नहीं सकते. हम लगातार मिलते गए. गंगोत्री की गंगा हरिद्वार आते आते गंगा काफी कुछ समाहित कर लेती है लेकिन रहती गंगा है. कोई नहीं कहता कि उसमें यमुना, रामगंगा, घाघरा, चंबल, गंडक , कोसी महानदी, बेतवा, पता नहीं कौन कौन सी नदियां मिलती हैं. लेकिन गंगा गंगा रहती है. भारत भारत है. यहां सभी धर्मों की सुगंध है. सभी का हाथ लगा है इसे बनाने में. सभी को इसने अपने सीने में समा लिया है.

यहां कोई नहीं पूछता कि जो आया है वो कहां से आया है. कौन सा शब्द किस भाषा से आया है. जो आप खा रहे हैं वो किस संस्कृति से आया है.जो आप पहन रहे हैं उसकी जड़ क्या है. शादी में कोई भारतीय परिधान पहन सकता है क्या. पहले लोग अंग्रेज़ी पेंट कोट पहनते थे अब शेरवानी पर आने लगे हैं. चूड़ीदार पाजामा क्या है?

जोमेटो के नाम पर सनसनी फैलाने वाले बताएं कि जो फूड वो ऑर्डर कर रहे हैं उसमें कितने मसाले हैं जो हिंदू नहीं हैं. वो भारत में नहीं होते. आप व्रत में जो सेंथा नमक झोक कर डालते हो वो पाकिस्तान से आता है. वही मुसलमान उस नमक को खोदकर आपतक पहुंचाते हैं. आपकी नज़र में तो वो घटिया लोग हैं फिर नमक तो पक्का अशुद्ध ही कर देते होंगे.

हींग कहां से आई. आज भी कहां से आती है. किस जानवर की खाल पर हींग का दूध सुखाकर खुरचा जाता है ये पता है आपको ? प्याज़ से ज्यादा पवित्र हींग को मानते हैं ना आप.

सावन का महीना है मन खराब नहीं करना चाहूंगा लेकिन ज़रा यूट्यूब पर पता कर लीजिए कि साबूदाना कैसे बनता है. कहां से ये प्रक्रिया आई.

भाई साहब मिर्ची लगे तो माफ कर देना. इसी देश में राजा मानसिंह के राज में आम लोगों के सिले हुए कपड़े पहनने पर रोक थी. पुरानी बात नहीं है. संस्कृतियां साथ बहती हैं.  साथ पलती है. एक दूसरे में समाहित हो जाती है. उन्हें अपना बना लेती है. उनमें मिल जाती है और एक दूसरे को समृद्ध करती है.

साथ रहना सीखिए. प्रेम से रहना सीखिए. ऐसे हालत मत बनाइये कि स़ड़क पर चलते वक्त आपको साथ वाले का धर्म सोचकर मुंह खोलना पड़े. 15 फीसदी आबादी के बहिस्कार से आपकी ज्यादातर सेवाएं समाप्त हो जाएंगी. आप जानते है कि कितने कारोबार ऐसे हैं जो हिंदू करते ही नहीं. पसंद ही नहीं करते. आपकी दीवार को जब पीपल का पेड़ फाड़ने लगता है तो कौनसा जोमेटे उसे उखाड़ने के लिए आपको हिंदू उपलब्ध करा पाएगा.

मिलकर रहिए . देश सबका है. रहने के लिए है. प्रेम से रहें सब. देश बपौती बताने की चीज़ नहीं है. इसकी जमीन पर आप कितना भी इसे अपना मान लैं आपका रत्ती भर भी हक नहीं है. जहां चाहें आपके जाने पर रोक लगा दी जाती है. वही लगाते हें जिन्हें आपसिर आंखों पर बिठाते हैं. पहले आप राष्ट्रपति भवन के अंदर से होते हुए ब्रासी एवेन्यु से बाहर निकला करते थे अब विजय चौक से आगे भी जाने से रोक दिया जाता है. आप कुछ नहीं कर पाते. कल ही फिर अमरनाथ यात्रा पर रोक लगा दी गई. क्या कर लिया आपने. फिर 100 साल का परमिट लेकर आए हैं आप धरती पर इन सौ साल में चैन से रहें और दूसरो को भी रहने दें. ये परमिट भी बीच में कभी भी केंसल हो जाता है.

कोई आपको समझाए ना कि आपकी कौम खतरे में तो समझलो वो खुद खतरे में है और आपको खतरे में डाल रहा है. दुनिया में 63 फीसदी मुस्लिम बाहुल्य देश सेक्युलर हैं. विकिपीडिया देख लें. लेकिन वो आपको समझाएंगे कि बहुमत में आते ही ये कब्जा कर लेते हैं. वो आबादी बढ़ने का खतरा दिखाते हैं लेकिन उनकी आबादी बढ़ने की दर तो कम हो रही है. पढ़ाई लिखाई के साथ बदल रही है. पिछली और इस जनगणना का बीस साल का आँकड़ा देख लो. कोई पाकिस्तान में आजादी के बाद हिंदुओं की संख्या कम होने की बात कहकर भड़काए तो उसे बताना कि तब पाकिस्तान में बांग्लादेश भी शामिल था उसके हिंदू गिनकर बुद्धू मत बनाओ और पाकिस्तान अगर कुएं में गिरेगा तो हम भी उससे होड़ करके कुए में थोड़े ही कूद जाएंगे.

अपन तो यही कहेंगे कि किसी के भड़काने में न आएं. मिलकर रहे. सब एक शकल के नहीं हो सकते. सबका रहन सहन खानपान एक जैसा नहीं हो सकता. इसका मतलब ये नहीं है कि वो भी हमारे जैसे रहें या हम उनसे बेहतर हो गए. थोड़ा एक दूसरे को समझें और तुरंत ज़ोमैटो से एक टोमैटे सूप मंगाएं ये भूल जाएं कि सूप कहां से आया था. ये अपना है . खालिस भारतीय. पीछे जाएंगे तो पता चलेगा आदमी भी नहीं था सब बंदर थे तो क्या कपड़े उतारकर पेड़ पर रहने लगें. ©गिरिजेश वशिष्ठ, का फेसबुक पर लेख