जानिए क्यों खतरनाक हो सकता है, कोरोना का देसी टीका, मोदी जी के चक्कर में रिसर्च से खिलवाड़!

आईसीएमआर के उपर अफरा तफरी में कोविड 19 का टीका बनाने के लिए दबाव बनाया जा रहा है. खबर है कि संस्थान के वैज्ञानिकों पर दबाव डाला जा रहा है कि वो टीका जल्दी बनाएं ताकि प्रधानमंत्री 15 अगस्त के अपने भाषण में इसका एलान कर सके. जानकार लोग कहते हैं कि ऐसी जल्दबाजी लोगो की सेहत से खिलवाड़ होगी और हो सकता है कि कई लोगों की जान पर बन आए. खबर पूरी पढ़ेगे तो पता चलेगा कि वैज्ञानिक इसे कितना खतरनाक मान रहे हैं.

द वायर ने खुलासा किया है कि मौजूदा समय में क्लीनिकल परीक्षण के लिए 12 स्थलों की पहचान की गई है और आईसीएमआर ने चिकित्सकीय संस्थाओं एवं प्रमुख जांचकर्ताओं से यह सुनिश्चित करने को कहा है कि जांच के लिए चुने गए लोगों का नामांकन सात जुलाई से पहले शुरू हो जाए.

भारत के पहले स्वदेशी कोविड-19 टीके ‘कोवैक्सीन’ को डीसीजीआई से मानव पर परीक्षण की बीते 29 जून को अनुमति मिली है. ‘कोवैक्सीन’ को हैदराबाद की कंपनी भारत बायोटेक ने भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) और राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान (एनआईवी) के साथ मिलकर विकसित किया है.

आईसीएआर के महानिदेशक डॉ. बलराम भार्गव ने 12 स्थलों के प्रमुख जांचकर्ताओं को लिखे पत्र में  कहा है कि यह ‘शीर्ष प्राथमिकता वाली परियोजनाओं’ में शामिल है ‘जिसकी सरकार उच्चतम स्तर पर निगरानी कर रही है’.

भार्गव ने पत्र में लिखा, हमारा लक्ष्य है कि ‘सभी क्लीनिकल ट्रायल को पूरा करके इसे 15 अगस्त तक इसका इस्तेमाल शुरू हो जाना है. बीबीआईएल इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए तेजी से काम कर रहा है लेकिन अंतिम परिणाम इस परियोजना में शामिल सभी क्लीनिकल परीक्षण स्थलों के सहयोग पर निर्भर करेगा.’ इसलिए वो रफ्तार से काम करें.

पत्र में लिखा है कि आपको सलाह दी जाती है कि आप क्लीनिकल परीक्षण संबंधी सभी मंजूरियों की प्रक्रिया तेज करें और सुनिश्चित करें कि विषय नामांकन की प्रक्रिया सात जुलाई तक पूरी हो जाए.’

पत्र में चेतावनी दी गई है कि इसका पालन नहीं करने के मामले को गंभीरता से लिया जाएगा. पत्र की एक प्रति भारत बायोटेक को भेज दी गई है.

पत्र में कहा गया है, ‘कृपया गौर करें कि इसका पालन नहीं करने पर इसे गंभीरता से लिया जाएगा. इसलिए आपको सलाह दी जाती है कि इस परियोजना को शीर्ष प्राथमिकता के तौर पर लें और समय सीमा के तहत काम पूरा करें.’

आईसीएमआर के दिशानिर्देश से अलग कोवैक्सीन का विकास करने वाली भारत बायोटेक खुद अक्टूबर से पहले वैक्सीन का ट्रायल पूरा करने से इनकार कर रही है.

कंपनी ने कहा, ‘अक्टूबर 2020 तक पहले और दूसरे चरण में मिली सफलता के बाद हम बड़े पैमाने पर ट्रायल कर पाएंगे. इसके बाद विनियामक अनुमोदन प्राप्त करने पर लाइसेंस की समय सीमाएं निर्धारित की जाएंगी.’

बता दें कि कंपनी को अभी तक पहले और दूसरे चरण का ट्रायल करने की मंजूरी मिली है जबकि बड़े पैमाने के ट्रायल तीसरे चरण में किए जाते हैं.

पहले चरण में कुछ दर्जन लोगों पर शरीर में वैक्सीन की सुरक्षा की जांच की जाती है. वहीं, दूसरे चरण में वैज्ञानिक यह पता लगाने की कोशिश करते हैं कि क्या वैक्सीन मनमुताबिक प्रतिक्रिया दे रहा है.

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दूसरे चरण के लिए सैकड़ों वालंटियर चाहिए होते हैं जिसमें महीनों लग सकते हैं.

वास्तव में सभी क्लीनिकल ट्रायल के आधिकारिक ऑनलाइन केंद्र क्लीनिकल ट्रायल्स रजिस्ट्री पर दिया गया है कि क्लीनिकल ट्रायल्स के लिए कोवैक्सीन के पास 15 महीने हैं.

इसमें कहा गया है कि दो चरणों में ट्रायल का मूल्यांकन 14, 28, 104 और 194 दिन पर किया जाएगा.

वहीं, आईसीएमआर द्वारा चुने गए 12 में से छह अस्पतालों के संस्थागत नैतिकता समितियों द्वारा पहले और दूसरे चरण के ट्रायलों को मंजूरी दिया जाना बाकी है.

ट्रायल शुरू किए जाने से पहले इस मंजूरी की अनिवार्य आवश्यकता होती है. जिन छह अस्पतालों ने पहले और दूसरे चरण के ट्रायल को मंजूरी दी है, वे गोवा, गोरखपुर, बेल्गावी, रोहतक और कानपुर के कम जाने-पहचाने अस्पताल हैं.

वहीं, जिन छह अस्पतालों से मंजूरी मिल चुकी है उनमें एम्स, दिल्ली और एम्स पटना शामिल हैं.

सरकार की जल्दबाजी से चिंतित वैज्ञानिक

वहीं, आईसीएमआर द्वारा वैक्सीन के लिए समयसीमा निर्धारित किए जाने पर डॉक्टरों और वैज्ञानिकों ने भी आश्चर्य जताया है. पत्र के लहजे और जल्दबाजी के संकेत से कुछ वैज्ञानिक चिंतित हैं.

उन्होंने पत्र में निर्धारित समयसीमा पर सवाल उठाया है और टीके के विकास प्रक्रिया को छोटा न करने की सलाह दी.

एम्स निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया ने कहा, ‘वैक्सीन की प्रभावशीलता और सुरक्षा दोनों को ध्यान में रखते हुए यह एक बहुत ही चुनौतीपूर्ण और कठिन काम होगा. इसके अलावा अगर हमें मनमुताबिक परिणाम मिलते हैं तो दूसरी चुनौती वैक्सीन के बड़े पैमाने पर उत्पादन की प्रक्रिया है.’

वायरस मामलों के जानकार और भारत में स्वास्थ्य अनुसंधान के लिए फंड देने वाली संस्था वेलकम ट्रस्ट-डीबीटी अलायंस के मुख्य कार्यकारी शहीद जमाल ने 15 अगस्त की समयसीमा को बेतुका कहा है.

उन्होंने कहा, ‘मुझे डर है कि इसके लिए वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय हम पर हंस रहा होगा. ऐसा नहीं होना चाहिए था. भारत विज्ञान के क्षेत्र में एक गंभीर देश है. अगर हम इस तरह का व्यवहार करेंगे तो कौन हम पर भरोसा करेगा? अगर हम वास्तव में कल एक अच्छा वैक्सीन लेकर आएं तो भी हम पर विश्वास करने वाला कौन करेगा? पत्र में जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया गया है, उससे मैं स्तब्ध हूं. यह कोई पत्र नहीं है, यह एक धमकी की तरह है.’

विषाणु वैज्ञानिक उपासना राय ने कहा कोरोनो वायरस के खिलाफ वैक्सीन लॉन्च की प्रक्रिया को गति देना या जल्द लॉन्च करने का वादा करना प्रशंसा के योग्य है, लेकिन यह सवाल महत्वपूर्ण है कि क्या ‘हम बहुत ज्यादा जल्दबाजी कर रहे हैं.’

सीआईएसआर-आईआईसीबी कोलकाता में वरिष्ठ वैज्ञानिक रे ने से कहा, ‘हमें सावधानी से आगे बढ़ना चाहिए. इस परियोजना को उच्च प्राथमिकता देना नितांत आवश्यक है. हालांकि, अतिरिक्त दबाव जरूरी नहीं कि जनता के लिए सकारात्मक उत्पाद दे.’

विषाणु रोग विशेषज्ञ सत्यजीत रथ ने कहा, ‘आईसीएमआर के पत्र का लहजा और सामग्री उत्पाद के विकास की प्रक्रिया और तकनीकी रूप से व्यावहरिकता के आधार पर अनुचित है.’

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उन्होंने कहा कि वैक्सीन का विकास बहु चरणीय प्रक्रिया है. पहले चरण में छोटे स्तर पर परीक्षण होता है जिसमें बहुत कम संख्या में प्रतिभागी होते और यह आकलन किया जाता है कि क्या वैक्सीन इंसानों के लिए सुरक्षित है या नहीं.

उन्होंने कहा कि दूसरे चरण में सैकड़ों लोग हिस्सा लेते हैं और इस चरण में संभावित टीके के प्रभाव का आकलन किया जाता है.

उन्होंने कहा कि अंतिम चरण में हजारों लोगों को शामिल किया जाता है और देखा जाता है कि निर्धारित समय में क्या वैक्सीन प्रभावी है या नहीं और यह कई महीनों तक चलता है.

रे ने कहा कि टीके को विभिन्न चिकित्सकीय चरणों को पूरा करने में कम से कम 12 से 18 महीने का समय लगता है.

उन्होंने कहा, ‘आज से 15 अगस्त में कंपनी के पास टीके के विकास के लिए जरूरी प्रक्रिया पूरी करने के लिए मात्र एक महीने का समय है.’

रे कहते हैं, ‘कैसे इतनी छोटी से अवधि निर्धारित की जा सकती है? कहा से यह सबूत मिला कि इस पूरी प्रक्रिया को पूरा करने के लिए यह अवधि पर्याप्त है? संभावित टीके की सुरक्षा और प्रभाव का क्या जो किसी भी दवा के विकसित करने का मौलिक चरण है? क्या प्री-क्लीनिकल अध्ययन भी पूरा किया गया? बहुत जल्दबाजी करने से खतरा पैदा हो सकता है.’

उन्होंने कहा कि महत्वपूर्ण चरणों को छोड़ना या तो खतरनाक हो सकता है या उत्पाद की गुणवत्ता खराब हो सकती है.

रे ने आगे बताया, ‘हमें मानकों और गुणवत्ता से समझौता नहीं करना चाहिए. हमें सबसे पहले वैक्सीन लॉन्च करने की जरूरत नहीं है बल्कि हमें मेड इन इंडिया वैक्सीन बनाने की जरूरत है जिसपर पूरी दुनिया भरोसा कर सके.’

माकपा महासचिव सीताराम येचुरी ने शनिवार को आरोप लगाया कि आईसीएमआर कोरोना वायरस का वैक्सीन बनाने की प्रक्रिया तेज करने की कोशिश कर रही है, ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वतंत्रता दिवस पर इसके संबंध में घोषणा कर सकें.

उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक अनुसंधान ‘आदेश के अनुसार’ नहीं किया जा सकता.

आईसीएमआर ने कोविड-19 का स्वदेशी वैक्सीन चिकित्सकीय उपयोग के लिए 15 अगस्त तक उपलब्ध कराने के मकसद से चुनिंदा चिकित्सकीय संस्थाओं और अस्पतालों से कहा है कि वे भारत बॉयोटेक के सहयोग से विकसित किए जा रहे संभावित टीके ‘कोवैक्सीन’ को परीक्षण के लिए मंजूरी देने की प्रक्रिया तेज करें.

येचुरी ने ट्वीट से किया हमला

येचुरी ने ट्वीट कर कहा, ‘टीका वैश्विक महामारी के लिए सबसे निर्णायक समाधान होगा. विश्व ऐसे सुरक्षित टीके का इंतजार कर रहा है, जिसकी दुनियाभर में पहुंच हो.’ उन्होंने कहा, ‘लेकिन… वैज्ञानिक अनुसंधान आदेश के हिसाब से नहीं किया जा सकता. स्वास्थ्य एवं सुरक्षा नियमों संबंधी सभी नियमों को दरकिनार कर कोविड-19 के उपचार के लिए स्वदेशी टीका विकसित करने के लिए दबाव बनाया जा रहा है, ताकि प्रधानमंत्री मोदी स्वतंत्रता दिवस पर इसकी घोषणा कर सकें. इसकी मानव जीवन को भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है.’