क्या भारत में नागरिकों को हत्या करवाती है सरकार? does government kills its own people?

are we really free, is a parallel sytem there. extra constitutional #killings​, extra judicial killings, #human#right​ violation, gun culture of police. क्या भारत में इनसान की आजादी आजादी नहीं है. क्या मानवाधिकार खत्म हो चुके हैं. क्या भारत में एक समानांतर सिस्टम चल रहा है. क्या पुलिस के नाम पर सरकार ने हत्यारे पाल रखे हैं.

सोचने की बात ये भी नहीं है कि वो किसके लिए काम करता था सोचने की बात ये है कि ऐसे लोग भले ही वो प्रदीप शर्मा हों, या विजय सालस्कर हों या दयानायक हों या नवनीत सिकेरा हों या मोहन लाल शर्मा हों ये सब लोग पाले ही क्यों जाते हैं इन सबके सिर पर कम से कम दस पन्द्रह लोगों को मार देने के आरोप हैं. ज्यादातर मामलों में एक्स्ट्रा जुडीशियल किलिंग होती थीं. किसने इनको या इनके आकाओं (सरकार) को ये हक दिया कि वो मौत की सजा सुना दें. ये जंगल राज नहीं है. देश के हर राज्य में सरकारी लोग इस तरह की हत्याएं करते हैं. जिसे मारना है कसूरवार बताओ और मार दो. नोएडा में जो मुठभेड़ रोज होती थीं सब में पचास हजार का इनामी पकड़ा या मारा जाता था. सारे इनाम एक दिन पहले घोषित किए जाते थे. हम सब को ये सोचना चाहिए कि आम आदमी कितनी कमजोर हालत में है. हम किसी सचिन वाज़े से मुकाबला हो जाए तो क्या उसे सबक सिखा सकते हैं. क्या अंबानी के ऊपर न आई होती तो सचिन वाजे को सजा मिलती ? पुलिस हिरासत में एक बेकसूर इंजीनियर को मारा और उसकी लाश समंदर में फेंक दी गई. पन्द्रह लोग सचिन वाजे समेत उसी केस में सस्पेंड हुए थे. लोकतंत्र का मतलब होता है न्याय का शासन. सब को न्याय की आवाज उठाने के हक लेकिन जब भी ये हक छीना जाता है हम न्याय न देखकर दे देखते हैं कि जिसका हक छीना जा रहा है वो हमारा या गैर. ये नहीं सोचते कि वो था भी या नहीं. यहीं से उगाही और अवैध वसूली की शुरुआत होती है. ये लोग अपरादी खुद भी बन जाते हैं और अपराधी भी इनकी छत्र छायामें काम करते हैं. क्योंकि हम अनजाने में इन्हें असीम ताकत दे देते हैं. पता नहीं हमारे जैसे कितने आम लोगों को ये ठिकाने लगा देते होंगे और हम इनकी झूठी कहानियो को सच मानकर तालियां बजाते हैं या फिर अब तक छप्पन जैसी फिल्में देखते हैं. मुख्यमंत्री लोगों को ऊपर पहुंचाने की धमकी देता है और हम तालियां बजाते हैं.

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