संजीव भट्ट को फंसाए जाने की पूरी ‘कहानी’ ऐसे एक ईमानदार अफसर को कातिल करार दिया !

उम्रकैद की सजा होने के बाद संजीव भट्ट की पत्नी और 2011 में उस वक्त गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी के खिलाफ विधानसभा का चुनाव लड़ने वाली श्वेता भट्ट ने फेसबुक पर वो सभी बातें कही हैं जो सबूत हैं कि संजीव भट्ट हिरासत में मौत के लिए जिम्मेदार हो नही नहीं सकते. श्वेता भट्ट ने कहा है कि उन्हें उस अपराध की सजा दी गई है, जिसे उन्होंने कभी किया ही नहीं है. श्वेता भट्ट ने अपनी पोस्ट अंग्रेजी में लिखी है, आप यहां उसका लल्लनटॉप द्वारा किया गया अनुवाद पढ़ सकेत हैं.

बिहार में लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा रोक दी गई. उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. इसके बाद 24 अक्टूबर, 1990 को जामनगर में बड़ा सांप्रदायिक दंगा हुआ. उस वक्त संजीव भट्ट जामनगर ग्रामीण में एएसपी के तौर पर तैनात थे. उस वक्त जामनगर तीन पुलिस डिवीजन में बंटा था. जामनगर शहर, जामनगर ग्रामीण और खंभालिया. खंभालिया के डिप्टी एसपी बीमारी की वजह से छुट्टी पर थे.

16 अक्टूबर, 1990 को संजीव भट्ट को खंभालिया का भी अतिरिक्त प्रभार दिया गया था. 24 अक्टूबर, 1990 को जब जामनगर जिले में दंगा भड़का, आईपीएस प्रवीण गोंदिया छुट्टी पर चले गए. इसके बाद तुरंत ही संजीव भट्ट को जामनगर शहर का चार्ज लेने और पूरा बंदोबस्त देखने को कहा गया. इस तरह से 24 अक्टूबर, 1990 को पूरे जामनगर जिले की कमान संजीव भट्ट के ही हाथ में थी और वो शहर में दंगे को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे थे.

30 अक्टूबर, 1990 को विश्व हिंदू परिषद और बीजेपी की ओर से भारत बंद बुलाया गया था. इसकी वजह से 30 अक्टूबर को बड़े पैमाने पर हिंसा की आशंका थी. देश के सभी संवेदनशील राज्यों को हाई अलर्ट पर रखा गया था. जामनगर में जब 30 अक्टूबर को सांप्रदायिक हिंसा शुरू हुई, डीएम और जामजोधपुर के एग्जीक्यूटिव मैजिस्ट्रेट ने तत्काल प्रभाव से कर्फ्यू लगाने का आदेश जारी कर दिया. अभी कर्फ्यू शुरू भी नहीं हुआ था कि पूरा शहर दंगाइयों के कब्जे में आ गया था. वो लोग कुछ खास तबके के लोगों के खिलाफ हिंसा कर रहे थे, दुकानें लूट रहे थे, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचा रहे थे और मुस्लिमों की संपत्तियों में तोड़-फोड़ कर रहे थे.

संजीव भट्ट की पहली प्राथमिकता दंगाइयों की भीड़ को हटाना, कर्फ्यू लगाना और शांति बहाल करना था. कई सारी हिंसाओं की घटनाओं को देखते, उनसे निबटते और कर्फ्यू लगवाते हुए संजीव भट्ट 30 अक्टूबर, 1990 को दोपहर के 1.30 बजे जामजोधपुर पुलिस स्टेशन पहुंचे. वहां मौजूद सीपीआई भानवाड़ केएन पटेल ने बताया कि कुल 133 लोगों को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें मरने वाला प्रभुदास माधवजी वैष्णानी भी शामिल था. इन सभी को जामजोधपुर पीएसआई ने सुबह 9.30 से लेकर दोपहर के 12.15 के बीच 15 अलग-अलग हिंसा की घटनाओं में गिरफ्तार किया था.

मरने वाले प्रभुदास माधवजी वैष्णानी को भानवाड़ सीपीआई केएन पटेल, पीएसआई ठाकोर और महाशंकर जोशी ने संजीव भट्ट और उनकी टीम को जामजोधपुर पुलिस स्टेशन पहुंचने के कई घंटे पहले गिरफ्तार किया था. और जब पुलिस की ये टीम सुबह 9.30 से लेकर 12.15 के बीच प्रभुदास माधवजी वैष्णानी, उनके भाई और दूसेर 131 लोगों को गिरफ्तार कर रही थी, संजीव भट्ट अपनी टीम के साथ दूसरी जगह पर दंगे को शांत करवा रहे थे. इसलिए ये साफ है कि इन 133 लोगों में किसी को भी संजीव भट्ट या उनकी टीम ने गिरफ्तार नहीं किया था और न ही संजीव भट्ट या उनकी टीम ने इन गिरफ्तार लोगों में से किसी से कोई पूछताछ की थी.

श्वेता भट्ट ने कहा है कि संजीव भट्ट ने न तो उस आदमी को गिरफ्तार किया था और न ही उससे पूछताछ की थी, जिसकी हत्या में संजीव को उम्रकैद हुई है.

विहिप और बीजेपी के ऐक्टिव मेंबर रहे अमृतलाल मणजावजी वैष्णानी ने संजीव भट्ट पर झूठा आरोप लगाते हुए शिकायत की थी कि हिरासत में रहने के दौरान गिरफ्तार किए गए लोगों को सिट-अप्स करवाए गए और उन्हें पुलिस स्टेशन से जुड़े एक चौक पर खुले में रखा गया. ये भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि जब 31 अक्टूबर, 1990 को गिरफ्तार किए गए लोगों को मैजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, तो न तो मरने वाले प्रभुदास माधवजी वैष्णानी और न ही दूसरे 133 लोगों ने अपने साथ हुई मारपीट या टॉर्चर की शिकायत की थी और न ही मैजिस्ट्रेट को ऐसे सबूत मिले थे. मैजिस्ट्रेट ने सभी को ज्यूडिशियल कस्टडी में भेज दिया था, जहां वो 8 नवंबर, 1990 तक बंद रहे. न तो जेल में बंद रहने के दौरान और न ही जमानत पर रिहा होने के बाद प्रभुदास माधवजी वैष्णानी या फिर किसी और ने टॉर्चर की शिकायत की और न ही कोई सबूत दिए.

12 नवंबर, 1990 को बीमारी की वजह से प्रभुदास माधवजी वैष्णानी को पहले जामनगर और फिर राजकोट लाया गया. अस्पताल लाए जाने के दौरान भी संजीव भट्ट के खिलाफ कोई शिकायत दर्ज नहीं करवाई गई. 18 नवंबर को इलाज के दौरान प्रभुदास माधवजी वैष्णानी की मौत हो गई. प्रभुदास माधवजी वैष्णानी के अस्पताल के रिकॉर्ड और फरेंसिक पोस्टमॉर्टम रिकॉर्ड में किसी तरह की आंतरिक या बाहरी चोट या फिर टॉर्चर के सबूत नहीं मिले. प्रभुदास माधवजी वैष्णानी की मौत के बाद बीजेपी और विहिप के सक्रिय सदस्य रहे अमृतलाल मडजावजी वैष्णानी ने हिरासत में टॉर्चर की शिकायत की.

30 अक्टूबर, 1990 को जब सांप्रदायिक दंगा हुआ और प्रभुदास माधवजी वैष्णानी की गिरफ्तारी हुई, जामनगर में संजीव भट्ट की पोस्टिंग के सिर्फ 20 दिन ही पूरे हुए थे. गिरफ्तार किए गए लोगों मे से न तो किसी को संजीव भट्ट जानते थे, न ही किसी से उनकी कोई पुरानी दुश्मनी थी. संजीव भट्ट के खिलाफ की गई शिकायत राजनीतिक प्रतिशोध का नायाब नमूना है. ऐसा इसलिए है, क्योंकि उस वक्त के गुजरात के मुख्यमंत्री चिमन भाई पटेल को सदन में बहुमत साबित करना था. 1 नवंबर 1990 को वोटिंग होनी थी और चिमन भाई पटेल बीजेपी और कांग्रेस दोनों पार्टियों के पटेल विधायकों का समर्थन चाहते थे. गिरफ्तार किए गए ज्यादातर लोग पटेल समुदाय के थे और संजीव भट्ट ने गिरफ्तार किए गए लोगों पर से टाडा हटाने से मना कर दिया था. और इस इनकार को उस वक्त के गृह मंत्री नरहरी अमीन और मुख्यमंत्री चिमन भाई पटेल ने अपने व्यक्तिगत अपमान के तौर पर देखा, क्योंकि दोनों ही पटेल समुदाय से ताल्लुक रखते थे.

श्वेता भट्ट का दावा है कि चिमन भाई पटेल को बहुमत साबित करना था और संजीव भट्ट ने गिरफ्तार लोगों पर से टाडा हटाने से इन्कार कर दिया था. इसके बाद ही केस दर्ज किया गया, क्योंकि आरोपी पटेल समुदाय के थे.

संजीव भट्ट के सीनियर अधिकारी और गृह मंत्रालय दोनों इस बात को जानते थे कि ईमानदारी से ड्यूटी निभाने वाले संजीव भट्ट के साथ गलत तरीके से प्रतिशोध लिया जा रहा है. इसलिए 9 जनवरी, 1991 को गुजरात के गृह विभाग ने तय किया कि संजीव भट्ट की कानूनी तौर पर मदद की जाएगी और इसके लिए रिजॉल्यूशन नंबर MIS/1090/6152-B पास किया गया. सीआईडी ने मामले की जांच की और कहा कि संजीव भट्ट के खिलाफ कोई मामला नहीं है और सरकार ने भी संजीव भट्ट पर केस चलाने की मंजूरी देने से इन्कार कर दिया.

राज्य सरकार ने अपने पुलिस अधिकारियों और संजीव भट्ट को 2011 तक बचाया. 2011 में जस्टिस नानावटी कमीशन और जस्टिस मेहता कमीशन ने 2002 के गुजरात दंगों की पूछताछ के लिए संजीव भट्ट को बुलाया. कमीशन के सामने संजीव भट्ट ने सच्चाई के साथ उस वक्त के गुजरात के मुख्यमंत्री, दूसरे और मंत्रियों और उच्च अधिकारियों की दंगों में भूमिका के बारे में बताया. संजीव भट्ट की गवाही के तुरंत बाद उसी दिन शाम को राज्य सरकार ने अप्लीकेशन वापस ले लिया. अगले ही दिन निर्देश दिए गए कि संजीव भट्ट और दूसरे अधिकारियों के खिलाफ तुरंत की केस शुरू किया जाए, जिन्हें अभी तक राज्य सरकार की ओर से बचाया जा रहा है.

गोधरा दंगे में मोदी के खिलाफ बोलने वाले पहले अधिकारी थे संजीव भट्ट. जब उन्होंने बयान दे दिया तो उसी दिन उनके खिलाफ केस चलाने के लिए राज्य सरकार ने आदेश दे दिया.

केस शुरू हुआ और 300 गवाहों में से सिर्फ 32 गवाहों से पूछताछ हुई. जो शिकायत 1990 से 2012 तक खामोशी से दबी रही, अचानक सबकी नज़र में आ गई और इसमें कई बड़े-बड़े वकील शामिल हो गए. संजीव भट्ट को अपने बचाव में गवाह भी पेश नहीं करने दिया गया. फरेंसिक मेडिसिन एक्सपर्ट डॉ. रेड्डी को कोर्ट में बुलाने की रिक्वेस्ट की गई. कोर्ट ने दोपहर के 12.30 बजे आदेश दिया कि डॉक्टर को उसी दिन 3 बजे शाम को कोर्ट में पेश किया जाए, जबकि वो डॉक्टर हैदराबाद में रहते थे. उन्हें अदालत में आने के लिए कम से कम एक दिन का वक्त चाहिए था, लेकिन कोर्ट ने सिर्फ 2.5 घंटे का वक्त दिया. केस के ट्रायल का आदेश भी एकपक्षीय था और ये आदेश संजीव भट्ट के वकील की गैरमौजूदगी में दिया गया था. संजीव भट्ट को उस अपराध में दोषी करार दिया गया है, जो उन्होंने किया ही नहीं था. राजनीतिक दबाव में एक ईमानदार अधिकारी जो अपनी ड्यूटी कर रहा था, उसे आईपीसी की धारा 302 के तहत उम्रकैद की सजा दे दी गई.

ये बहुत अजीब है कि हिरासत से निकलने के 18 दिन के बाद एक मौत हुई. कोई चोट नहीं लगी थी. न तो आंतरिक और न ही बाहरी. फरेंसिक मेडिकल एक्सपर्ट ने इसकी जांच भी की थी और टॉर्चर या मारपीट के कोई सबूत भी नहीं मिले थे. और इस मामले को हत्या करार दे दिया गया. राजनीतिक प्रतिशोध का इससे बड़ा उदाहरण कोई और नहीं हो सकता, जिसमें बिल्कुल ही निर्दोष संजीव भट्ट और उनके अधिकारियों को दोषी करार दे दिया गया, जो ईमानदारी से दंगे को रोकने की कोशिश कर रहे थे.