छत्तीसगढ़: नक्सलियों के हाथों 32 कांग्रेस नेताओं की हत्या में बीजेपी पर सवाल

छत्तीस गढ़ में 32 कांग्रेस नेताओं को उड़ा देने के मामले में अब तत्कालीन मुख्यमंत्री रमन सिंह और बीजेपी की तरफ उंगलियां उठने लगी हैं. इस मामले में पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल और पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नन्द कुमार पटेल भी शिकार हुए थे. जाने माने पत्रकारों की रिसर्च साइट ‘सत्य हिंदी’ ने अपनी रिपोर्ट में कई खुलासे किए हैं. ये है पूरी रिपोर्ट…

छत्तीसगढ़ और देश भर में चर्चित झीरम घाटी सामूहिक हत्याकांड की एसआईटी जाँच डेढ़ माह बाद भी शुरू नहीं हो पाई है. राज्य के नए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने 17 दिसंबर 2018 को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद इस हत्याकांड की एसआईटी जाँच का एलान किया था. राज्य सरकार ने केंद्र सरकार और एनआईए की एसआईटी जाँच का हवाला देते हुए एनआईए से इस घटना को लेकर तैयार की गई रिपोर्ट देने को कहा था.

डेढ़ माह बाद भी नहीं आई रिपोर्ट

राज्य सरकार ने एनआईए से कहा था कि इस हत्याकांड का ना तो मक़सद साफ़ हुआ है और ना ही इस मामले में दोषी पाए गए और ज़िम्मेदार ठहराए गए किसी भी अफ़सर और अभियुक्त के नाम का ख़ुलासा छह साल बाद हो पाया है. एनआईए को पत्र लिखे डेढ़ माह बीत गए हैं लेकिन अभी तक केंद्र से राज्य सरकार को रिपोर्ट नहीं सौंपी गई है.

नक्सलियों ने किया था नरसंहार

25 मई 2013 को नक्सलियों ने बस्तर की झीरम घाटी में 32 कांग्रेसी नेताओं और कार्यकर्ताओं को मौत के घाट उतार दिया था. ये सभी नेता कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा में शामिल हुए थे. इस सामूहिक हत्याकांड में कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं को अपनी जान गंवानी पड़ी थी. बावजूद इसके राज्य की तत्कालीन बीजेपी सरकार ने इस हत्याकांड की जाँच में कोई गंभीरता नहीं दिखाई.

एनआईए की जाँच में थी ख़ामियाँ

एनआईए ने मामले की जाँच की थी. लेकिन जाँच में कई ख़ामियाँ रहीं. एनआईए ने ना तो बस्तर के तत्कालीन आईजी और पुलिस अधीक्षकों से बातचीत की और ना ही प्रशासनिक अधिकारियों से. इस हत्याकांड में जान गंवाने वाले पूर्व मंत्री और नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा को तो ‘ज़ेड प्लस’ सिक्योरिटी थी.

पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल और पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नन्द कुमार पटेल को विशेष सुरक्षा व्यवस्था मुहैया कराई गई थी. लेकिन बस्तर में तैनात ज़िम्मेदार अधिकारियों ने सिक्योरिटी प्रोटोकॉल का कोई पालन नहीं किया.

बस्तर के तत्कालीन चीफ़ कंजर्वेटर ऑफ फ़ॉरेस्ट ने राज्य के तत्कालीन ख़ुफ़िया प्रमुख एडीजीपी मुकेश गुप्ता को झीरम घाटी में नक्सलियों के जमावड़े की महीने भर पहले ही लिखित सूचना दी थी. इसके बावजूद भी पुलिस अफ़सरों ने कांग्रेसी नेताओं की सुरक्षा व्यवस्था का कोई बंदोबस्त नहीं किया था.

कांग्रेस सरकार को अंदेशा है कि झीरम घाटी हत्याकांड उसके नेताओं को मारने की एक सुनियोजित साज़िश थी. जिसे नक्सलियों की मदद से बस्तर और रायपुर में तैनात आला पुलिस अफ़सरों ने अंजाम तक पहुँचाया था.

कांग्रेस के पास हैं ख़ुफ़िया टेप

हत्याकांड से पर्दा हटाने के लिए कांग्रेस सरकार एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है. बताया जा रहा है कि कांग्रेस के पास कई ऐसे ख़ुफ़िया टेप हैं जिससे साबित होता है कि राज्य के कुछ नेताओं और पुलिस के आला अफ़सरों ने नक्सलियों के साथ मिलकर इतनी बड़ी घटना को अंजाम दिया था.

6 साल में भी नहीं आई रिपोर्ट

एनआईए की जाँच के अलावा राज्य की तत्कालीन बीजेपी सरकार ने झीरम घाटी हत्याकांड की जाँच के लिए 28 मई 2013 को एक न्यायिक आयोग का गठन किया था. हाईकोर्ट के न्यायाधीश प्रशांत कुमार मिश्रा की अध्यक्षता में गठित इस न्यायिक आयोग को तीन माह के भीतर अपनी जाँच रिपोर्ट सरकार को सौंपनी थी. लेकिन 6 साल बीत जाने के बावजूद इस आयोग ने भी अपनी जाँच रिपोर्ट राज्य सरकार को नहीं सौंपी. अलबत्ता आयोग का कार्यकाल साल दर साल बढ़ता चला गया. न्यायिक आयोग ने अब तक 70 लोगों के बतौर गवाह बयान दर्ज किए हैं. इसमें से 50 निजी व्यक्ति हैं जबकि 20 सरकारी गवाह हैं.

सीबीआई ने नहीं माना जाँच लायक

तत्कालीन बीजेपी सरकार की जाँच की मंशा पर सवालिया निशान लगाने और पुलिस के कई अधिकारियों की संदिग्ध भूमिका के कांग्रेस के आरोपों को स्वीकारते हुए रमन सिंह सरकार ने विधानसभा में इस मामले की सीबीआई से जाँच कराने की घोषणा भी की थी. लेकिन एएनआई की जाँच और न्यायिक आयोग के गठन का हवाला देकर सीबीआई ने इस मामले को जाँच के लिए उपयुक्त नहीं माना.

वर्तमान में पुलिस मुख्यालय ने एसआईटी के गठन की प्रक्रिया शुरू कर दी है. नक्सली मामलों और क्राइम कंट्रोल से जुड़े चुनिंदा अफ़सरों का पैनल तैयार किया गया है. एसआईटी के जाँच के बिंदु भी तय किए गए हैं. लेकिन एएनआई की जाँच रिपोर्ट मुहैया नहीं होने से एसआईटी हाथ पर हाथ धरे बैठी है.

नेताओं की हत्या का सबसे बड़ा मामला

सिर्फ़ छत्तीसगढ़ ही नहीं बल्कि देश भर में राजनेताओं की एक साथ हत्या की दृष्टि से यह सबसे बड़ा मामला है. कांग्रेसियों की दलील है कि परिवर्तन यात्रा की सुरक्षा को जानबूझकर नजरअंदाज किया गया. जबकि प्रोटोकाल के तहत उसके सभी बड़े नेताओं की सुरक्षा की जवाबदेही छत्तीसगढ़ पुलिस और राज्य सरकार की थी. बता दें कि बस्तर में परिवर्तन यात्रा के दौरान रोड ओपनिंग पार्टी को अचानक हटा लिया गया था.

कांग्रेस नेताओं की यह भी दलील है कि नक्सलियों का इतना बड़ा जमघट झीरम घाटी में मौजूद था, लेकिन इसकी जानकारी पुलिस और ख़ुफ़िया विभाग को क्यों नहीं थी, यह सोचनीय है.

कांग्रेस नेताओं का कहना है कि 32 कांग्रेस नेताओं की जान जाने के बावजूद किसी भी पुलिस अधिकारी के ख़िलाफ़ न तो बीजेपी सरकार ने कार्रवाई की और न ही इस घटना के लिए किसी को ज़िम्मेदार ठहराया गया.

रमन सरकार पर लगाए गंभीर आरोप

झीरम घाटी हत्याकांड को लेकर नक्सलियों और कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों की सीडी भी सामने आई थी. कांग्रेसियों का दावा है कि तत्कालीन रमन सरकार ने इस महत्वपूर्ण सीडी को ना तो एएनआई को सौंपा और ना ही न्यायिक आयोग को. यहाँ तक कि इसकी फ़ॉरेंसिक जाँच तक करना मुनासिब नहीं समझा गया.

कांग्रेस के प्रदेश महासचिव रमेश वलयानी के मुताबिक़, कांग्रेस के कुछ विवादित नेता और राज्य पुलिस के कुछ अफ़सर समेत पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह के क़रीबियों की आवाज़ इस सीडी में है. जो इस साज़िश के रचे जाने के अहम गवाह और अभियुक्त भी हो सकते हैं.

कांग्रेस के मुताबिक़, कांग्रेस को सत्ता में आने से रोकने के लिए उनकी पार्टी के तमाम बड़े नेताओं को मारा गया. पार्टी ने इसे राजनैतिक षड्यंत्र क़रार दिया है.

कांग्रेस नेता वलयानी ने यह भी कहा कि बस्तर रेंज के आईजी से पूछताछ करने के बजाय तत्कालीन बीजेपी सरकार ने उन्हें पुरस्कृत करते हुए घटना के चंद दिनों बाद रायपुर स्थानांतरित कर दिया और आईजीपी सीआईडी बनाया. इसी तरह से सुकमा और जगलदलपुर के एसपी को स्थानान्तरित कर नई पोस्टिंग की गई.

कांग्रेस सरकार ने एसआईटी का गठन कर झीरम घाटी के पीड़ितों के दुखों पर मरहम लगाने की कोशिश की है. अब देखना होगा कि एसआईटी इस घटना का पर्दाफ़ाश कब और कैसे करेगी. फ़िलहाल एसआईटी के गठन के बाद से बीजेपी के कई बड़े नेताओं और पूर्व कांग्रेसी नेताओं की नींद उड़ी हुई है.

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