नोटबंदी से खाली हुआ बैंकों का खज़ाना, 55 साल का सबसे कम पैसा

नई दिल्ली : नोटबंदी से कैशलेस भारत की बाद के दावे करते करते सरकार ने ऐसे उल्टे सीधे कदम उठाए कि भारत कैश लेस की जगह कैशफुल देश बन गया है. हालात ये हैं कि लोग बैंकों में न तो पैसे जमा कर रहे हैं न बैंकों के जरिए कैशलेस भुगतान करना चाहते हैं. आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक बैंक डिपोजिट ग्रोथ रेट पिछले 55 सालों में सबसे कम हो गया है. मार्च 2018 को खत्म हुए वित्त वर्ष में बैंक में लोगों ने 6.7 फीसदी की दर से पैसे जमा किए. यह 1963 के बाद सबसे कम है.

भारतीय रिजर्व बैंक की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक वित्त वर्ष 2017-18 में बैंक का ग्रोथ रेट 6.7 फीसदी रहा. इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार यह नोटबंदी की वजह से हो सकता है. दर असल नोटबंदी के बाद लोगों ने कैश की किल्लत को महसूस किया. उसके बाद सरकार ने लोगों पर मोटा शुल्क लगाना शुरू कर दिया. लोग एटीएम से पैसे निकालते तो ज्यादा पैसे देने पड़ते. पेटीएम पर शुल्क लगा दिया गया . जैसे ही कोई पेटीएम से पैसे अपने खाते में डालता उसे पैसे देने पड़ते. इसके साथ ही एटीएम में कैश की किल्लत शुरू हो गई.

इसका नतीजा ये हुआ कि लोगों ने बैंकों से ज्यादा पैसे निकालने शुरू कर दिए. वो कैश से ही व्यवहार करने लगे. अब हालात ये हो गए हैं कि पैसा बैंकों के पास जाए बगैर ही यहां से वहा घूम रहा है.

नवंबर 2016 में नोटबंदी किए जाने के बाद तकरीबन 86 फीसदी डिपोजिट बैंकों में पहुंची थी. इससे बैंकों के पास काफी बड़ी मात्रा में डिपोजिट जमा हुआ था, लेकिन अब नोटबंदी का उल्टा असर बैंकों पर पड़ता दिख रहा है. रिपोर्ट के मुताबिक नोटबंदी के बाद जो पैसा बैंकिंग सिस्टम में आया था, वह अब निकल चुका है.

हाल ही में हुई कैश की किल्लत के लिए भी बैंक से बड़ी मात्रा में पैसों को विद्ड्रॉ करने को ही माना गया था. नोटबंदी के बाद बैंकों ने पुराने नोटों में आई कुल डिपोजिट को 15.28 लाख करोड़ बताया था. इससे मार्च 2017 को खत्म हुए वित्त वर्ष तक बैंकों के पास कुल जमा राश‍ि 108 लाख करोड़ पर पहुंच गई. वहीं, मार्च 2018 तक कुल रकम 117 लाख करोड़ थी. इस दौरान बैंकों में रकम जमा होने की दर 6.7 फीसदी रही.

साबित हो सकती है बुरी खबर:

इस खबर का मतलब ये है कि बैंकों के लिए सीआरआर यानी कैश रिजर्व रेशियो को मेन्टेन करना मुश्किल होगा. जाहिर बात है बैंकों की ब्याज दर बढ़ेगी. लोन मंहगे होंगे. आपकी होम लोन की किश्त बढेगी, और इंडस्ट्री को महंगा पैसा मिलने के कारण जीडीपी पर भी बुरा असर पड़ेगा.