दिल्ली बम धमाके के तीस आरोपियों को अदालत ने छोड़ा, कहा- पुलिस ने किसी को भी उठा लिया

आपको याद होगा कि 1985 में ट्रांजिस्टर बम धमाकों में बड़ी संख्या में लोग मारे गए थे इस मामले में दिल्ली पुलिस 59 लोगों को गिरफ्तार किया था. अब अदालत का फैसला आया है जिसमें कोर्ट ने 30 लोगों को बरी कर दिया है. अदालत ने कहा है कि इस तरह की दोषपूर्ण जांच के आधार पर आरोपियों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, कोर्ट ने कहा कि जो सबूत अदालत के सामने लाए गए उनसे साफ है कि इस मामले की जांच के दौरान, पुलिस अधिकारियों ने विभिन्न व्यक्तियों को बिना किसी सबूत के उठा लिया और उनपर दबाव डालने और यातना देने के बाद उनसे जबरन मनमाफिक बयान दिलवाया गया. उन लोगों को चेतावनी दी गई थी कि अगर वे पुलिस की मांग के अनुसार नहीं गए, तो उनपर केस कर दिया जाएगा.

ये वही केस है जिसके बाद पूरे देश में पुलिस ने सार्वजनिक स्थलों और बसों में चेतावनी देनी शुरू कर दी है कि लावारिस बस्तु बम हो सकती है. उसे न छुए.

हालांकि एक सवाल इस केस में न्याय व्यवस्था पर भी उठता है. पुलिस अगर किसी को भी फंसा दे तो उसे 35 साल तक प्रताड़ना झेलने के बाद न्याय मिलता है. ऐसे न्याय का क्या न्याय कहा जा सकता है.

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अदालत ने कहा कि  “इन मामलों में की गई जांच दोषपूर्ण, एकतरफा, अनुचित हैं और इनमें विभिन्न खामियां हैं.” इतना ही नहीं अदालत ने जांच को लेकर पुलिस को फटकार भी लगाई है. 10 मई 1985 की शाम को दिल्ली और उसके आसपास के इलाकों में बम धमाके हुए. ये बम ट्रांजिस्टर में लगाए गए थे, जिसमें उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजधानी में कुल 49 लोग मारे गए और केवल दिल्ली में 127 लोग घायल हुए.

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दिल्ली पुलिस के तत्कालीन डीसीपी की देखरेख में एक विशेष जांच दल ने 59 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट तैयार की थी. 59 में से पांच घोषित अपराधी थे, जो कोर्ट में कभी पेश नहीं हुए. जुलाई 2006 में ट्रायल कोर्ट ने “अपर्याप्त सबूतों” के कारण पांच को रिहा कर दिया था. शेष 49 अभियुक्तों में से, 19 की मौत मुकदमे के दौरान ही हो गई वहीं बचे हुए 30 आरोपी 1986 से ज़मानत पर हैं.

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5 मार्च को अपने आदेश में, अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश संदीप यादव ने कहा, “यह स्पष्ट है. किसी भी परिस्थितियों में अभियुक्तों के खिलाफ अभियोजन पक्ष द्वारा लगाए गए आरोप साफ नहीं हैं और विश्वसनीय सबूतों से मेल नहीं खाते. परिस्थितियों की श्रृंखला में महत्वपूर्ण लिंक गायब हैं और यह निर्णायक रूप से साबित नहीं किया जा सकता है कि अपराध किसी और के द्वारा नहीं बल्कि सिर्फ आरोपी व्यक्तियों द्वारा ही किया गया था.”