बलात्कारियों को फांसी देना ठीक नहीं है, यहां बताया गया है क्यों ?

हर बार जब कोई जघन्य अपराध होता है हर तरफ से मारो मारो की चीत्कार सुनाई देने लगती है. एक भीड़ जो मौत देकर सारी समस्याएं हल कर देना चाहती है. कठुआ के बाद यही सुना , उससे पहले निर्भया में यही सुना जब भी कोई आपराध होता है मांग उठती है. चौराहे पर लटकाकर मार दो. फांसी कम से कम सजा है. कुछ लोग तो कहते हैं कि सुनवाई कोर्ट अदालत की भी ज़रूरत नहीं है लटका दो. लेकिन कभी सोचा कि आपकी तरह कानूनविद क्यों नहीं सोचते. महिलाओं के मामलें में दुनिया भर में संघर्ष करने वाली नारी समानाधिकार कार्यकर्ता क्यों नहीं ऐसी मांग करते.
जाहिर बात है आप में से ज्यादातर ये बात न तो जानते हैं और न जानना चाहते हैं. दर असल खून का बदला खून में सभी को हर समस्या का हल दिखाई देता है. लेकिन समस्या का हल इतना आसान नहीं है फांसी चढ़ाने से समस्या बढ़ सकती है.

  1. क्या कभी आपने सोचा कि सामाजिक जागृति के बगैर आप जितना अधिक सज़ा सख्त करते जाएंगे पीड़ित महिला की जीवन की दिक्कतें बढ़ती जाएंगी. जैसे ही किसी महिला से बलात्कार होगा. पूरा समाज और परिवेश उस महिला पर दबाव डालना शुरू कर देगा. महिला के साथ अन्याय से ज्यादा लोगों के मन में आरोपी के प्रति दया उमड़ पड़ेगी. मामला सिर्फ शहर का नहीं है. हमारे गांवों में मजबूती से जड़ जमाए बैठा पुरुष सत्तात्मक समाज ऐसा वातावरण बनाने लगता है कि रिपोर्ट करके लड़की ने पाप कर दिया है. वो किसी की जान लेना चाहती है. खुद पीड़ित भी हमेशा इस मानसिक दबाव से गुजरेगी कि उसकी शिकायत से किसी की जान जानेवाली है. क्या कोई और तरीका हो सकता है बगैरह बगैरह.
  2. गांव की व्यवस्था में फांसी की सजा की जगह बीच के रास्ते निकाले जाने लगेगे . कभी आरोपी से पीड़ित का विवाह करा देने का फार्मूला आएगा. कभी पांव झुआकर छोड़ देने की बात होगी तो कभी आर्थिक मुआवजा देकर मामले को खत्म करने के सुझाव आएंगे. अगर पीड़िता इन दबावों को नहीं मानती तो पूरा समाज उसके ही खिलाफ खड़ा हो जाएगा. सबसे बडा हमला हमारे समाज का महिला के चरित्र पर होता है. हमारा दकियानूसी समाज प्राय: महिलाओँ को ही दोषी ठहराने लगता है. ताली दोनों हाथ से नहीं बजती, ताली दोनों हाथ से नहीं बजती, सुनसान में जाने की क्या जरूरत थी, बात क्यों करती थीं उससे बगैरह. और जब इसमें प्राणदंड जैसी चीज़ें शामिल हो जाएंगी तो समाज के दबाव को झेलना आसान नहीं होगा.
  3. भारत की सभी नारियां अधिकारों को लेकर उतनी सबला नहीं हैं. वो आर्थिक रूप से परिवार के अन्य सदस्यों पर निर्भर रहती है. कोई भी कानून सोचने से पहले आप शहरी महिलाओं की स्थिति को देकर नहीं चल सकते. गांव में परिवार पर पूरी तरह निर्भर रहने वाली महिला का परिवार के दूसरे सदस्य उतनी मजबूती से साथ दें ये बेहद दुर्लभ उदाहरण होता है. पुरुष सत्तात्मक समाज़ महिला को इन मामलों में सिर उठाने ही नहीं देता. जाहिर बात है परिवार के बगैर कोई भी भारतीय परंपरागत ग्रामीण स्त्री अपने अस्तित्व की कल्पना भी नहीं कर सकती. वो अंततोगत्वा किसी पर निर्भर ही होती है.
  4. कानून के जानकार कहते हैं कि इससे प्राण का खतरा भी महिला के लिए बढ़ जाता है. कई अपराधी सिर्फ इसलिए बलात्कार के मामले में लड़की की हत्या करने लगेंगे . इसकी एक तकनीकी वजह भी है. हत्या करने के मामले में कम से कम भुक्तभोगी नहीं होगा और दोष सिद्ध करना तुलनात्मक रूप से कठिन होगा. इसके अलावा दोनों मामलों में समान दंड होने के कारण जघन्य अपराधी हत्या को ही चुनेंगे. हमारे सामने सैकड़ों मामले आते हैं जिनमें अपराधी सिर्फ अपनी पहचान सामने आ जाने के डर से लूट को हत्या में बदल देते हैं. बलात्कार के मामलों में भी कई बच्चियों की जान इसी वजह से गई है.
  5. करप्शन के मामले बेहद बढ़ जाएंगे. आप जानते हैं कि पुलिस झूठे मुकदमे लादकर अक्सर लोगों को फंसा दिया करती है. महिला आपराध से जुड़े मामलों में आज भी कानून सिर्फ सख्त ही नहीं है काफी हदतक महिलाओं की तरफ झुकाव वाला है. यौन उत्पीड़न की एक शिकायत ही किसी को जेल पहुंचाने के लिए काफी है. लेकिन ये ताकत जितनी महिलाओँ की है उतनी ही पुलिस की भी बन गई है. आज के जमाने में झूठा मुकदमा बनाकर किसी को जेल में डाल देना बहुत आसान है. अगर पुलिस को अनंत शक्ति दे दी गई तो फांसी से डराकर वो लूट का धंधा शुरू कर देगी. ये सिद्ध बात है कि जितना कानून सख्त होता है उतना ही करप्शन बढ़ता है. यहां जानबूझ कर मैं झूठी शिकायत करने वाली महिलाओं का जिक्र नहीं कर रहा हूं क्योंकि ऐसा करके हम पूरे स्त्री समाज के साथ अन्याय करेंगे . गलत लोग हर समाज में होते हैं और चुटकी भर गलत महिलाएँ भी हो सकती है.
  6. समाधान
    दरअसल बलात्कार अपराध होने के साथ-साथ एक सामाजिक समस्या है. महिला को उपभोग की वस्तु समझने की मानसिकता इसके पीछे सबसे प्रबल है. दुर्भाग्य से हमारे समाज में इस सोच को बदलने के लिए कुछ नहीं हुआ बल्कि ज्यादातर विज्ञापन, सिनेमा, टीवी और अन्य माध्यम स्त्री के तन को प्रोडक्ट ही समझते हैं व्यक्ति के तौर पर स्त्री के अस्तित्व को भी उपभोगात्मक बना दिया जाता है.
    न तो घर में स्त्री को व्यक्ति होने और सम्माननीय होने की शिक्षा जी जाती न बाहर किशोरावस्था शुरू होते ही रिश्तों का तो सम्मान होता है लेकिन स्तरी का नहीं. स्त्री अगर मां हो तो सम्माननीय है बहन है तो आदरणीय है लेकिन अगर वो आपकी रिश्ते में कुछ नहीं लगती तो भोग्या है.
    इस मानसिकता को दूर करने के लिए व्यापक स्तर पर काम करने होंगे. कला , संस्कृति, साहित्य, टीवी और सिनेमा इसमें अहम भूमिका निभा सकते हैं. अमेरिका में रंगभेद को खत्म करने की कोशिशों का ही नतीजा है कि श्वेत हीरो के साथ एक अश्वेत व्यक्ति भी समान रूपे से दिखाई देता है. यही कारण है कि लोग रंगभेद की मानसिकता से काफी हद तक निजात पा चुके हैं.
    सामाजिक जागृति और बदलाव इस मामले में अहम भूमिका निभा सकते हैं. इसके अलावा कोई रास्ता नहीं है. आधुनिक समता मूलक समाज की अवधारणा पर ध्यान दे. लड़किओं और लड़कों को बराबर समझें. उन्हें आपसे में बात करने का मौका दें एक दूसरे के प्रति समझ बढ़ाएं. समाधान वक्त के साथ ही होगा लेकिन फांसी से बच्चियों की ज़िंदगी का खतरा बढ़ेगा और कन्विक्शन रेट भी कम हो जाएगी यानी सजा पाने वालों की तादाद में गिरावट आएगी. ये लड़कियों के लिए बिलकुल ठीक नहीं होगा.
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