कन्हैया कुमार को क्लीन चिट, झूठा निकला देशद्रोह का आरोप ?

आम आदमी पार्टी की सरकार कन्हैया और 9 लोगों के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा चलाने की दिल्ली पुलिस को अनुमति नहीं देगी. दूसरे शब्दों में कहें कि ये कन्हैया कुमार के लिए क्लीनचिट की तरह है क्योंकि अब अदालत में चार्जशीट दाखिल होने नहीं जा रही. सूत्रों के मुताबिक, दिल्ली के गृह मंत्री सत्येंद्र जैन ने इस मामले में अदालत को अपनी राय दी है.

उन्होंने कहा है कि पुलिस ने जो साक्ष्य पेश किया है, उसके मुताबिक कन्हैया और अन्यों पर देशद्रोह का मामला नहीं बनता. सूत्रों के मुताबिक सरकार अदालत से कहेगी कि हमें प्रमाणों को देखकर नहीं लगता है कन्हैया कुमार ने देशद्रोही नारे लगाए था. सरकार की ये राय उस कोर्ट के समक्ष पेश किया जाएगा, जहां मामले की सुनवाई हो रही है. दिल्ली के उपराज्यपाल और दिल्ली पुलिस को भी इस मामले पर दिल्ली सरकार के रुख से अवगत कराया जाएगा.

कन्हैया कुमार और जेएनयू के अन्य छात्रों के खिलाफ देशद्रोह के मामले में पुलिस ने आईपीसी की धारा 124 ए के तहत मामला दर्ज किया है. दिल्ली के गृह मंत्री ने कहा, ‘एफआईआर नं.110/2016 के संदर्भ में पेश किए गए साक्ष्य के मद्देनजर हिंसा भड़काकर राज्य के खिलाफ देशद्रोह और राष्ट्र की संप्रभुता पर हमले का मामला नहीं बनता है और इस मामले में जिन 10 आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई है, उनके खिलाफ आईपीसी की धारा 124 ए के तहत मुकदमे का कोई केस नहीं बनता है. इसलिए सीआरपीसी की धारा 196 के तहत और आईपीसी की धारा 124ए के तहत अपराध के लिए मंजूरी अवांछित है.’ उन्होंने यह भी कहा कि मुकदमा चलाने की मंजूरी देने से उन लोगों की जिंदगी को खतरा पैदा हो सकता है, जिनके खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई है.

फरवरी 2016 में संसद पर हमले के मास्टरमाइंड अफजल गुरु की फांसी के खिलाफ एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था. कन्हैया पर उस दौरान मार्च का नेतृत्व करने और भारत विरोधी नारे लगाने का आरोप था. दिल्ली पुलिस ने इस साल जनवरी में कन्हैया कुमार, उमर खालिद, अनिर्बान भट्टाचार्य और अन्यों के खिलाफ देशद्रोह एवं अन्य अपराधों के लिए चार्जशीट दाखिल की थी. चार्जशीट दाखिल करने से पहले दिल्ली सरकार की मंजूरी नहीं ली गई थी. इस साल 23 जुलाई को जब कोर्ट में यह मामला सुनवाई के लिए आया था तो कोर्ट ने पुलिस को दिल्ली सरकार से आवश्यक मंजूरी लेने के लिए दो महीने का समय दिया था. इस केस में 18 सितंबर को सुनवाई की संभावना है.

सूत्रों ने बताया, पेश किए गए साक्ष्यों के आधार पर दिल्ली के गृह मंत्री का विचार है कि आरोपियों का हिंसा भड़काने का कोई इरादा नहीं था और मार्च के दौरान लगाए गए नारे को आरोपियों से नहीं जोड़ा जा सकता है. मंत्री ने कहा है कि छात्रों के दो राजनीतिक गुटों ने एक-दूसरे को चिढ़ाने के इरादे से नारे लगाए थे. कथित देशविरोधी नारे अन्य गुट को चिढ़ाने के लिए थे न कि राज्य और उसकी संप्रभुता को चुनौती देने के लिए.

उन्होंने कहा है कि छात्रों के दो गुटों के बीच झगड़े के कारण कथित घटना हुई और कथित नारों को आरोपियों से नहीं जोड़ा जा सकता है. लेकिन उन्होंने कहा है कि पुलिस एफआईआर में उल्लेख की गई अन्य धाराओं के तहत आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर सकती है. गृह मंत्री ने सक्षम प्राधिकारी की पूर्व मंजूरी के बगैर अधूरी चार्जशीट दाखिल करने पर भी सवाल उठाया है. उन्होंने कहा है कि जांच एजेंसी (इस मामले में दिल्ली पुलिस) ने कोर्ट में चार्जशीट दाखिल करने के बाद मंजूरी मांगी.