लॉकडाउन में खत्म हो गई सीजेरियन की लूट, सिर्फ 4% मामलों में हुए ऑपरेशन से बच्चे

जिस डॉक्टर को लोग भगवान की तरह देखते थे वो धीरे धीरे लालची और बेईमान की छवि का शिकार होने लगा है. लॉकडाउन ने डॉक्टरों के पेशे की तो पोल ही खोल दी है. अस्पतालों के जो प्रसव के आंकड़े सामने आ रहे हैं वो शर्मनाक है.

लाकडाउन के दौरान डॉक्टर कोरोना से डरे हुए थे और सरकारी नियमों का भी डर था इसका नतीजा ये हुआ कि प्रईवेट अस्पतालों में सीजेरियन करीब करीब बंद हो गए. सुरक्षित प्रसव के नाम पर जहां आम दिनों में अस्पतालों में 80 फीसदी सिजेरियन डिलीवरी होती है वहां लाकडाउन से दौरान यह आंकड़ा 3.9 फीसदी सिमट गया. इस अवधि में सिजेरियन डिलीवरी की तादाद में भी भारी कमी आई है, यानी 96 फीसदी बच्चे नार्मल पैदा हुए हैं. प्राइवेट अस्पतालों के बंद होने से सरकारी अस्पतालों में प्रसूताओं की संख्या भी बढ़ी है.

कोरोना संक्रमण के डर से प्राइवेट अस्पताल अप्रैल माह में डिलीवरी केस नहीं ले रहे थे. इस दौरान यूपी के फतेहपुर 1415 बच्चों ने जन्म लिया. जिनमें 56 आपरेशन से पैदा हुए, शेष बच्चे नार्मल डिलीवरी से ही हुए. बड़ी संख्या में महिलाओं ने कोरोना संक्रमण के खतरे को देखते हुए घर पर ही सुरक्षित प्रसव कराया है. स्वास्थ्य विभाग से जुड़े लोगों की माने तो यह संख्या निजी और सरकारी अस्पताल में होने वाले प्रसव से कई गुना अधिक है. घरों में हुए प्रसव का विभाग आशा के माध्यम से गणना करा रहा है.

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उधर शाहजहांपुर के आंकड़े भी कुछ ऐसे ही हैं.  लॉकडाउन अवधि में 25 मार्च से 25 अप्रैल तक 14 बच्चों का ही सिजेरियन प्रसव से जन्म हुआ. वहीं, नार्मल डिलीवरी का आंकड़ा 500 है. जो चिकित्सक करीब 95 फीसद सिजेरियन डिलीवरी करते थे, वे भी सामान्य प्रसव की सलाह दे रहे हैं. प्रसव से पूर्व प्रसूता की थर्मल स्क्रीनिंग भी की जा रही है.

लॉकडाउन के पहले आम धारणा ये थी कि गर्भ में पल रहे बच्चे और मां को खतरा का खौफ दिखा कर अस्पताल लोगों को डरा देते हैं. बाद में सिजेरियन डिलीवरी के लिए मजबूर कर मनमानी रकम ऐंठी जाती है. सरकारी अस्पतालों में भी कमोवेश यहीं हाल है. दूसरा पहलू यह है कि नार्मल डिलीवरी में खतरे की आशंका पर डाक्टर रिश्क नहीं लेते है और थोड़ी सी दिक्कत पर सिजेरियन डिलीवरी के लिए सलाह दी जाती है. जिसका नतीजा है कि जिले में करीब 80 फीसदी सिजेरियन डिलीवरी होती है.

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संस्थागत प्रसवों को बढ़ावा देने के लिए सरकार आशा को प्रति डिलीवरी छह सौ रुपये प्रोत्साहन राशि देती है. इसके बाद भी कई आशा गर्भवती महिलाओं को प्राइवेट नर्सिंग होम ले जातीं हैं. वहां, सिजेरियन डिलीवरी होती है तो आशा को तीन हजार रुपये दिए जाते हैं. अप्रैल के शुरूआती 20 दिनों तक प्राइवेट अस्पतालों में केस नहीं लिए गए तो सरकारी अस्पताल में लाना आशा की मजबूरी बन चुका था.