CBI एक असंवैधानिक संस्था है, स्टे ऑर्डर पर टिका है अस्तित्व

क्या आप जानते हैं कि गोवाहाटी हाईकोर्ट अपने एक फैसले में सीबीआई को असंवैधानिक करार चुका है. आपको बता दें कि आज तक उस फैसले को गलत नहीं करार किया गया है बस इतना हैकि केन्द्र सरकार इस फैसले को तारीख पर तारीख के ज़रिए लटकाए हुए हैं. जब ये फैसला आया था तब भी केन्द्र ने सुप्रीम कोर्ट में नौ नवंबर 2013 को दूसरे शनिवार की छुट्टी के दिन स्टे ले लिया. खास बात, तब से लेकर आज तक सुप्रीम कोर्ट में वह अपील पेंडिंग है.
सरकार हर बार नई तारीख ले लेती है. यही वजह है कि ‘सीबीआई’ तोते की छवि से बाहर नहीं निकल पाई. अदालत में तर्क दिया गया था कि दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टेबलिसमेंट (डीएसपीई) एक्ट-1946, के तहत सीबीआई के गठन या उसके अधिकार क्षेत्र की बात कही जाती है. खास बात है कि डीएसपीई एक्ट में ‘सीबीआई’ शब्द ही नहीं लिखा है. इस एक्ट में संशोधन हुए, मगर सीबीआई नाम फिर भी शामिल नहीं हो सका.
ये एक्ट अंग्रेज़ों ने बनाया था और इसका मकसद द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद करप्शन के मामलों की जांच करने का था. बाद में इसमें दूसरे करप्शन के मामले भी शामिल कर लिए गए.
चूंकि कानून और व्यवस्था राज्य का विषय है इसलिए केन्द्र के पास सीबीआई जैसी पुलिस होने का कोई तार्किक कारण बनता ही नहीं है लेकिन केन्द्रीय विभागों की जांच जैसे मामलों को लेकर इसे लटकाकर रखा गया. ये भी दूसरी पुलिस की तरह है जिसका सरकार और प्रशासन गलत इस्तेमाल करते रहते हैं.
संविधान के जानकारों का कहना है कि किसी भी चेप्टर में सीबीआई के गठन का कहीं कोई प्रावधान ही नहीं है. यही वजह है कि ‘केंद्रीय जांच एजेंसी’ को आज भी संवैधानिक दर्जा हासिल नहीं है. सीबीआई एक अप्रैल 1963 को एक एग्जीक्यूटिव ऑर्डर के तहत बनी थी.
संविधान सभा के सदस्य नजीरुददीन अहमद और डॉ बीआर अंबेडकर ने सीबीआई जैसी संस्था बाबत कहा था, ऐसी एजेंसी केंद्र सरकार की ‘संघ सूची’. के पास रहेगी. इसका कामकाज क्रिमिनल केस दर्ज करना या अपराधी को गिरफ़्तार करना नहीं होगा. यह एजेंसी केंद्र सरकार के पास विभिन्न अपराधों की जो सूचनाएं आती हैं, उन्हें क्रॉस चैक कर सकती है.
एजेंसी के पास इंटरस्टेट अपराधों की तुलना कर उसकी रिपोर्ट केंद्र सरकार को देने का अधिकार था. पुलिस, जो कि ‘राज्य सूची’ का विषय है, उसकी तर्ज पर यह जांच एजेंसी न तो किसी को गिरफ़्तार कर सकती है और न ही किसी से पूछताछ. आज सीबीआई द्वारा किसी को गिरफ़्तार करने, जांच करने या पूछताछ का जो भी अधिकार मिला है, वह दिल्ली स्पेशल पुलिस एक्ट ) डीएसपीई) एक्ट के तहत संभव हो सका है.
सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता डॉ. एनएस चौधरी ने सीबीआई की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी, के मुताबिक गोवाहाटी हाईकोर्ट ने छह नवंबर 2013 को नरेंद्र कुमार बनाम भारत सरकार केस में फैसला सुनाया था कि सीबीआई संवैधानिक संस्था नहीं है.
इसके पास किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने का अधिकार नहीं है. खास बात, हाईकोर्ट ने कहा, संविधान के अनुसार केंद्र सरकार ऐसी एजेंसी या फोर्स नहीं रख सकती. अदालत ने सीबीआई को पूरी तरह असंवैधानिक घोषित कर दिया था. अगर सीबीआई को पुलिस की तरह अधिकार देने हैं तो उसे संविधान की ‘समवर्ती सूची’ में शामिल करना होगा.
जानकारों का कहना है सीबीआई को संवैधानिक दर्जा दिलाने के लिए सरकार को संविधान संशोधन करना होगा. इसके लिए दोनों सदनों में अलग-अलग दो तिहायी बहुमत से प्रस्ताव पास होना जरुरी है. जाहिर बात है जब तक ये काम नहीं होता सीबीआई एक ऐसी संस्था है जिसकी नींव सत्ताधारियों की साजिश पर टिकी है. ये केन्द्र की एक अवैध पुलिस है जो राज्यों के अधिकार में हस्तक्षेप करने के लिए कानून में दखलंदाजी करके बनाई गई है. आईचौक पर पत्रकार गिरिजेश वशिष्ठ का लेख

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