अमेरिका ने पाकिस्तान से रिश्ते तोड़े, अब चीन से लंबी लड़ाई की तैयारी, भारत से लेगा मदद

कभी दक्षिण एशिया में अमेरिका का सबसे खास रहा पाकिस्तान अब अपना भरोसा खत्म कर चुका है. चीन की गोद में खेल रहे पाकिस्तान को छोड़कर अब अमेरिका ड्रैगन के खिलाफ लंबी जंग की तैयारी कर रहा है. हाल में ही पाकिस्तान ने हर मोर्चे पर चीन का साथ देने का खुलेआम वादा किया है. पाक ने न केवल वन चाइना पॉलिसी का समर्थन किया है बल्कि ताइवान और हॉन्ग कॉन्ग के मुद्दे पर भी चीन के साथ हरदम खड़े रहने की बात कही है.

यूरोपीय फाउंडेशन फॉर साउथ एशियन स्टडीज के अनुसार, चीन का खास दोस्त पाकिस्तान अब अमेरिका के लिए वैसी अहमियत नहीं रखता जैसी वह अफगानिस्तान वॉर के समय रखता था. अमेरिका एशिया में रूस की बढ़त रोकने और सामरिक रूप से खुद को मजबूत बनाने के लिए पाकिस्तान की मदद लेता रहा है. लेकिन, हाल के दिनों में चीन के साथ तनाव बढ़ने के बाद समीकरण बदल गए हैं.

अमेरिका ने पाकिस्तान को न केवल अलग-थलग कर दिया है बल्कि, कई आर्थिक सहायता पर भी रोक लगा दी है. ओबामा से लेकर ट्रंप तक के शासन काल में पाकिस्तान को दी जाने वाली आर्थिक सहायता को खत्म कर दिया गया. इतना ही नहीं, हाल के दिनों में अमेरिका ने पाकिस्तान को सैन्य सहायता देने से भी इनकार किया है.

अमेरिका की एक शीर्ष राजनयिक ने कहा था कि ट्रंप प्रशासन आतंकवादी समूहों का सफाया करने के लिए ‘विश्वसनीय कदम’ उठाने के वास्ते इस्लामाबाद पर दबाव बना रहा है. साथ ही उन्होंने कहा कि इस्लामाबाद की ओर से जेयूडी प्रमुख हाफिज सईद के अभियोजन और दोषसिद्धि जैसे आतंकवाद रोधी हाल में उठाए कदम महत्वपूर्ण तो हैं लेकिन स्थायी नहीं हैं.

अमेरिका ने तिब्बती लोगों की सार्थक स्वायत्तता के लिए अपने समर्थन का फिर से खुला इजहार किया है. अमेरिकी विदेश मंत्री ने कहा कि तिब्बती लोगों के बुनियादी तथा अहस्तांतरणीय मानवाधिकारों के लिए, उनके विशिष्ट धर्म, संस्कृति और भाषायी पहचान को संरक्षित रखने की खातिर काम करने के लिए हम दृढ़ संकल्पित हैं. भारत में रह रहे तिब्बत के निर्वासित धार्मिक नेता दलाई लामा तिब्बत के लोगों के लिए सार्थक स्वायत्तता की मांग करते रहे हैं. लेकिन चीन 85 वर्षीय दलाई लामा को अलगाववादी मानता है.

अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रॉबर्ट ओ ब्रायन ने कहा था कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव शी जिनपिंग खुद को सोवियत तानाशाह जोसेफ स्टालिन के उत्तराधिकारी के रूप में देखते हैं. इतना ही नहीं, अमेरिकी एनएसए ने फीनिक्स में एक कार्यक्रम के दौरान यह भी कहा कि हमारी सहनशीलता और भोलेपन के दिन अब खत्म हो गए हैं. हम अब कम्युनिस्ट पार्टी और उसकी विचारधारा के प्रसार पर लगाम लगाने के लिए कार्रवाई करेंगे. अमेरिका अब चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के कारण पैदा होने वाले खतरों को लेकर सचेत हो गया है.

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अमेरिका ने पहले ही ताइवान के समीप अपने तीन न्यूक्लियर एयरक्राफ्ट कैरियर को तैनात कर दिया है. जिसमें से दो ताइवान और बाकी मित्र देशों के साथ युद्धाभ्यास कर रहे हैं, वहीं तीसरा एयरक्राफ्ट कैरियर जापान के पास गश्त लगा रहा है. अमेरिका ने जिन तीन एयरक्राफ्ट कैरियर को प्रशांत महासागर में तैनात किया है वे यूएसएस थियोडोर रूजवेल्ट, यूएसएस निमित्ज और यूएसएस रोनाल्ड रीगन हैं.

अमेरिका के पास दुनिया की सबसे आधुनिक सेना और हथियार हैं. दुनियाभर के देशों की सैन्य ताकत का आंकलन करने वाली ग्लोबल फायर पॉवर इंडेक्स के अनुसार 137 देशों की सूची में आर्मी, नेवी और एयरफोर्स के मामले में अमेरिका दुनिया के बाकी देशों से बहुत आगे है. अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के अनुसार, अमेरिका के दुनिया में 800 सैन्य ठिकाने हैं. इनमें 100 से ज्यादा खाड़ी देशों में हैं. जहां 60 से 70 हजार जवान तैनात हैं.

एशिया में किन-किन देशों को चीन से खतरा

एशिया में चीन की विस्तारवादी नीतियों से भारत को सबसे ज्यादा खतरा है. इसका प्रत्यक्ष उदाहरण लद्दाख में चीनी फौज के जमावड़े से मिल रहा है. इसके अलावा चीन और जापान में भी पूर्वी चीन सागर में स्थित द्वीपों को लेकर तनाव चरम पर है. हाल में ही जापान ने एक चीनी पनडुब्बी को अपने जलक्षेत्र से खदेड़ा था. चीन कई बार ताइवान पर भी खुलेआम सेना के प्रयोग की धमकी दे चुका है. इन दिनों चीनी फाइटर जेट्स ने भी कई बार ताइवान के हवाई क्षेत्र का उल्लंघन किया है. वहीं चीन का फिलीपींस, मलेशिया, इंडोनेशिया के साथ भी विवाद है.

फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट्स, इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के आंकड़ों के मुताबिक, पूरे एशिया में चीन के चारों ओर 2 लाख से ज्यादा अमेरिकी सेना के जवान हर वक्त मुस्तैद हैं और किसी भी अप्रत्याशित हालात से निपटने में भी सक्षम हैं. वहीं चीन की घेराबंदी में अमेरिका और अधिक संख्या में एशिया में अपनी सेना को तैनाक करने की तैयारी कर रहा है. इससे विवाद और गहराने के आसार हैं. जानिए एशिया मे कहां-कहां है अमेरिकी सैन्य ठिकाने-

मालदीव के पास स्थित डियेगो गार्सिया में अमेरिकी नेवी और ब्रिटिश नेवी मौजूद है. यह द्वीप उपनिवेश काल से ही ब्रिटेन के कब्जे में है और हिंद महासागर में रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इस लोकेशन से चीनी नौसेना की हर एक मूवमेंट पर नजर रखी जा सकती है.

जापान में द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से ही अमेरिकी सेना मौजूद है. एक अनुमान के मुताबिक यहां अमेरिकी नेवी, एयरफोर्स और आर्मी के कुल 10 बेस हैं जहां एक लाख से ज्यादा अमेरिकी सैनिक तैनात हैं. अमेरिका और जापान में हुई संधि के अनुसार इस देश की रक्षा की जिम्मेदारी यूएस की है. यहां से साउथ चाइना सी पर भी अमेरिका आसानी से नजर रख सकता है.

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प्रशांत महासागर में स्थित इस छोटे से द्वीप पर अमेरिकी सेना की महत्वपूर्ण रणनीतिक मौजूदगी है. इस द्वीप से अमेरिकी सेना न केवल प्रशांत महासागर में चीन और उत्तर कोरिया की हरकतों पर नजर रख सकता है बल्कि उन्हें मुंहतोड़ जवाब देने और नेवल ब्लॉकेज लगाने में बड़ी भूमिका अदा कर सकता है. यहां 5000 अमेरिकी सैनिकों की तैनाती है.

उत्तर कोरिया के कोप से बचाने के लिए दक्षिण कोरिया में अमेरिकी फौज तैनात है. जिसमें आर्मी, एयरफोर्स, मरीन कॉर्प और यूएस नेवी के जवान शामिल हैं. यहां से अमेरिका चीन की हरकतों पर भी निगाह रखता है. अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के अनुसार, यहां 28500 ट्रूप्स तैनात हैं.

चीन के नजदीक फिलीपींस में भी अमेरिकी सेना का बेस मौजूद है. हाल मे ही फिलीपींस के राष्ट्रपति रोड्रिगो डुटर्टे ने अमेरिका के साथ दो दशक पुराने विजिटिंग फोर्सेज एग्रीमेंट (VFA)को आगे बढ़ाने का फैसला किया है. बता दें कि 2016 में सत्ता में आने के बाद से रोड्रिगो डुटर्टे का झुकाव चीन की तरफ ज्यादा था. जिस कारण अमेरिका से फिलीपीन्स की तल्खियां भी बढ़ी थी.

ताइवान में अमेरिकी सेना का कोई स्थायी बेस नहीं है, लेकिन यहां अमेरिकी सेना अक्सर ट्रेनिंग और गश्त को लेकर आती जाती रहती है. वर्तमान समय में भी अमेरिका के दो एयरक्राफ्ट कैरियर इस इलाके में तैनात हैं. अमेरिका शुरू से ही ताइवान की स्वतंत्रता का समर्थक रहा है. हाल के दिनों में चीन से बढ़ते टकराव के बाद से अमेरिका ने पूर्वी चीन सागर और ताइवान की खाड़ी में अपनी उपस्थिति दर्ज करवानी शुरू कर दी है.

अफगानिस्तान में अमेरिका के 14 हजार सैनिक

अफगानिस्तान में अमेरिका के 14 हजार सैनिक मौजूद हैं. इसके अलावा यहां गठबंधन सेनाओं के आठ हजार सैनिक भी हैं जो तालिबान के खिलाफ अक्सर कार्रवाईयों को अंजाम देते रहते हैं. हालांकि अमेरिका ने हाल के दिनों में अफगानिस्तान में तैनाक अपने सैनिकों की जानकारी नहीं दी है. अमेरिकी सैनिक बड़े पैमाने पर अफगानिस्तान की सेना को ट्रेनिंग भी दे रहे हैं.

इन मुद्दों को लेकर अमेरिका चीन में विवाद

अमेरिका और चीन के बीच विवाद का प्रमुख कारण दुनिया में अपना धौस जमाना है. ट्रेड वॉर के बाद, कोरोना वायरस, हॉन्ग कॉन्ग में नया सुरक्षा कानून, साउथ चाइना सी में अधिपत्य की होड़, भारत-जापान-ऑस्ट्रेलिया और ताइवान के खिलाफ चीन का आक्रामक रवैया, अमेरिकी पत्रकारों पर प्रतिबंध, उइगुरों का नरसंहार और तिब्बत को लेकर दोनों देशों के बीच विवाद है.

साभार- वाशिंगटन से नवभारत टाइम्स का विश्लेषण