एक मामले ने देश के खुफियातंत्र की पोल खोल दी, आज शर्म का दिन

आलोकवर्मा के गर के बाहर आईबी अफसरों के पकड़े जाने के मामले ने एक झटके में देश के खुफियातंत्र का हाल बयान कर दिया है. या कहें कि पोल खोल दी है. अगर दिल्ली पुलिस ने लाज न बचाई होती तो हालात और भी शर्मनाक होते.

आप कल्पना कर सकते हैं कि देश की सबसे बड़ी खुफिया एजेंसी के चार लोग मामूली सिक्योरिटी गार्ड्स के हाथों पकड़े जाएं. दर असल हुआ ये कि इन 4 लोगों को इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) ने बाकायदा माना कि वो उसके आदमी हैं. पुलिस ने भी जांच की खानापूर्ति करके उन्हें जाने दिया वर्ना बड़ी थू  थू होती.

अपने अफसरों को बचाने के लिए आईबी ने स्वीकार किया है ये चारों उसके ही अधिकारी हैं और रूटीन गश्त पर थे. पकड़ने, पुलिस को सौंपने और रिहा करने की कहानी ने केंद्र सरकार की तीन बड़ी एजेंसियों की किरकिरी करा दी है. बड़ा सवाल ये है कि ये अफसर आलोक वर्मा के घर के बाहर कौनसी रुटीन गश्त कर रहे थे और वहां से भागे क्यों ? इससे भी बड़ी बात ये कि आई बी की रुटीन गश्त क्या होती है?

आईबी पर कई सवाल

आईबी अधिकारियों का कहना है कि उनके चारों अधिकारी रूटीन गश्त पर थे और वीआईपी इलाके में इस तरह की गश्त होती रहती है. कभी-कभी प्रवर्तन अधिकारियों को इसकी जानकारी रहती है, कभी नहीं भी रहती है. इसके बाद सवाल उठ रहे हैं कि अगर रूटीन गश्त थी तो आलोक वर्मा के घर के आसपास इस तरह से जाने की क्या जरूरत थी.

जब आईबी के अफसर सुरक्षाकर्मी के कुछ पूछने पर भागने लगे तो सवाल उठना लाजमी है. क्या देश की सबसे बड़ी खुफिया एजेंसी के अफसर इस तरह रूटीन गश्त करते हैं? क्या पकड़े गए अधिकारियों को फौरन अपने अधिकारियों को नहीं सूचित करना चाहिए था? घटनाक्रम के कई घंटे बाद आईबी ने क्यों माना कि ये उसके आदमी हैं, यह काम तो उसी समय मौके पर ही कर दिया जाना चाहिए था? कहीं ऐसा तो नहीं कि रुटीन गश्त की बात करके आईबी ने अपने जासूसी कांड पर पर्दा डालने की कोशिश की हो. कहीं ऐसा तो नहीं कि ये अफसर गुजरात मॉडल की तर्ज पर वहां वाकई जासूसी कर रहै थे.. पहले भी गुजरात के कई किस्से इस तरह की जासूसी के सामने आ चुके हैं. प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी का नाम भी साहेब के तौर पर ऐसे ही एक किस्से के बाद प्रचलित हुआ था.

सीबीआई की भी छीछालेदर

आलोक वर्मा के सुरक्षाकर्मी पकड़े गए लोगों से जिस तरह से पेश आए इससे भी सवाल उठ रहे हैं कि क्या एक सरकारी सुरक्षाकर्मी को इसकी भी ट्रेनिंग नहीं दी जाती कि वह सरकारी अफसर और प्राइवेट आदमी की पहचान कर सके? अगर अधिकारी अपना परिचय दे रहे हैं तो उनसे इस तरह का व्यवहार कैसे किया जा सकता है? लोगों का कहना है कि सीबीआई अफसर के घर के बाहर इस तरह के घटनाक्रम से इस एजेंसी की छीछालेदर ही हुई है. घूस के आरोप-प्रत्यारोप के बाद हालात ऐसे मोड़ पर आ गए हैं कि यह शोर उठने लगा है कि सीबीआई के चीफ की भी जासूसी कराई जा सकती है, भले ही वो छुट्टी पर भेज दिए गए हों.

दिल्ली पुलिस सबसे निराली

आलोक वर्मा के आवास पर तैनात सुरक्षाकर्मियों ने पुलिस को इसकी जानकारी दी कि आवास के बाहर से 4 संदिग्धों को पकड़ा गया है. पुलिस पहुंची और उनको खींचते हुए थाने ले आई. लोग इस पर भी सवाल उठा रहे हैं कि अगर यह पता चल गया था या यह संदेह भी हो गया था कि ये आईबी के अफसर हैं तो कॉलर पकड़कर खींचते हुए ले जाने का क्या मतलब था? दिल्ली पुलिस को यह पता लगाने में सुबह से दोपहर कैसे हो गई कि पकड़े गए 4 लोग संदिग्ध नहीं बल्कि आईबी के अफसर हैं? पुलिस ने उनके नाम से लेकर आधार नंबर तक सार्वजनिक कर दिए. आधार नंबर सार्वजनिक करना क्या किसी की प्राइवेसी से छेड़छाड़ नही है.

क्या यह प्रोफेशनल तरीका है. एक आरोप यह भी लग रहा है कि अपने पूर्व बॉस को खुश करने के लिए दिल्ली पुलिस ने अनप्रोफेशनल तेजी दिखाई. दूसरा तर्क यह भी दिया जा रहा है कि वर्मा को बदनाम करने के लिए तेजी दिखाई गई. गौरतलब है कि सीबीआई निदेशक बनने के पहले आलोक वर्मा दिल्ली के पुलिस आयुक्त थे.

क्या है मामला

मंगलवार की रात छुट्टी पर भेजे गए सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा के आवास के बाहर से सुबह-सुबह उनके सुरक्षाकर्मियों ने 4 लोगों को पकड़ा था. सुरक्षाकर्मियों का कहना था कि इनकी गतिविधियां संदिग्ध लग रही थीं और ये लोग कुछ बताने को तैयार नहीं थे. बाद में इन्हें पुलिस को सौंप दिया गया था. बाद में आईबी ने कहा कि ये उनके अधिकारी हैं. पूछताछ करने के बाद दिल्ली पुलिस ने उन्हें जाने दिया.

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