संकट में पड़ा विहिप का ‘राम मंदिर प्लान’, धर्म संसद में शामिल नहीं होंगे संत

संघ समर्थित विश्व हिंदू परिषद को बड़ा झटका लगा है. अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने विश्व हिंदू परिषद द्वारा बुलाई गई धर्म संसद का बहिष्कार करने की घोषणा की है. इसका मतलब ये हुआ कि भारत का कोई भी अखाड़ा विहिप के धर्म संसद में शामिल नहीं होगा. अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरी महाराज ने विहिप के धर्म संसद के बहिस्कार की जानकारी दी. उन्होंने कहा कि अब कोई भी अखाड़ा इस धर्म संसद में शामिल नहीं होगा.

ये धर्म संसद बीजेपी के नज़रिए से बेहद अहम है क्योंकि आम चुनाव में सिर्फ चार महीने बचे हैं. धर्म संसद के ज़रिए वो राम मंदिर का मुद्दा गरमाना चाहती थी यही वजह थी कि इस धर्म संसद में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत भी आने वाले थे. लेकिन सभी अखाड़ों के बहिस्कार का मतलब है कि इस धर्म संसद में अब कोई भी संत शामिल नहीं हो सकेगा. अखाड़ा परिषद की अवहेलना करना संतों के लिए बड़ी अनुशासन हीनता मानी जाती है.

अखाडा परिषद का कहना है कि विश्व हिंदू परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दरअसल बीजेपी के ही संगठन है और हम नहीं चाहते कि राजनीतिक संगठन अब राम मंदिर पर मुद्दा आगे बढ़ाएं उन्होंने सिर्फ राजनीति की है. परिषद ने कहा 4 साल तक यह लोग राम मंदिर पर चुप रहे अचानक क्यों जाग रहे हैं. उन्होंने कहा कि साधु महात्माओं में मतभेद नहीं है हम बस यह कह रहे हैं कि मंदिर अप सरकार नहीं बना सकती साधु ही बनाएंगे.

2 दिन में आरक्षण का कानून ले आए. तीन तलाक पर कानून ले आए सुप्रीम कोर्ट का फैसला बदलने के लिए कानून ले आए तो राम मंदिर पर कानूनी रास्ता क्यों नहीं लिया. ये धर्म संसद नहीं, राजनीति है. अखाड़ा परिषद इस बैठक में शामिल नहीं होगा. नाही अखाड़ा परिषद के सदस्य शामिल होंगे. सिर्फ महामंडलेश्वर को जाने की अनुमति है. वह इस धर्म संसद में अपनी बात रखेंगे.  मैं स्वरूपानंद सरस्वती के प्रस्ताव का समर्थन करता हूं क्योंकि साधु-संतों को ही राम मंदिर के लिए आगे आना होगा.

अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष नरेंद्र गिरी ने  बताया कि 4 मार्च के बाद साधु-संतों के साथ अयोध्या जाऊंगा और मुस्लिम पक्षकारों के साथ राम मंदिर मसले पर चर्चा होगी सरकार से उम्मीद नहीं अब हम सब मुद्दा सुलझाएंगे.

राम जहां जन्मे, मंदिर वहीं बनेगा. मुस्लिम पक्षकारों से कहेंगे कि मस्जिद की जिद छोड़ दें. गैर विवादित जमीन तो पहले कांग्रेस की सरकार ने भी न्यास को देने की बात कही थी तब इसी बीजेपी विश्व हिंदू परिषद और खुद हमने विरोध किया था.

इससे पहले संतों ने परम धर्म संसद (Dharm Sansad) नाम से स्वतंत्र आयोजन किया था जिसमें राम मंदिर (Ram Temple at Ayodhya) बनाने का एलान किया गया. इस धर्म संसद की अध्यक्षता ज्योतिष पीठाधीश्वर शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने की. की अगुवाई में 3 दिन तक चली धर्म संसद में कहा गया कि साधू संत प्रयागराज से सीधे अयोध्या जाएंगे और 21 फरवरी को अयोध्या में राम मंदिर के शिलान्यास का कार्यक्रम होगा. कुम्भ मेला में 28, 29 और 30 जनवरी को चले धर्म संसद के अंतिम दिन ज्योतिष पीठाधीश्वर स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती द्वारा पारित परम धर्मादेश में हिंदू समाज से बसंत पंचमी के बाद प्रयागराज से अयोध्या के लिए प्रस्थान करने का आह्वान किया है. उन्होंने कहा कि अगर अयोध्या में एकत्रित हुए लोगों को गोलियों को सामना करना पड़ेगा तो भी कदम पीछे नहीं हटेंगे.

धर्मसंसद के समापन के बाद जारी धर्मादेश में कहा गया है, “सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रथम चरण में हिंदुओं की मनोकामना की पूर्ति के लिए यजुर्वेद, कृष्ण यजुर्वेद तथा शतपथ ब्राह्मण में बताए गए इष्टिका न्यास विधि सम्मत कराने के लिए 21 फरवरी, 2019 का शुभ मुहूर्त निकाला गया है.” 

धर्मादेश के मुताबिक, “इसके लिए यदि हमें गोली भी खानी पड़ी या जेल भी जाना पड़े तो उसके लिए हम तैयार हैं. यदि हमारे इस कार्य में सत्ता के तीन अंगों में से किसी के द्वारा अवरोध डाला गया तो ऐसी स्थिति में संपूर्ण हिंदू जनता को यह धर्मादेश जारी करते हैं कि जब तक श्री रामजन्मभूमि विवाद का निर्णय नहीं हो जाता अथवा हमें राम जन्मभूमि प्राप्त नहीं हो जाती, तब तक प्रत्येक हिंदू का यह कर्तव्य होगा कि चार इष्टिकाओं को अयोध्या ले जाकर वेदोक्त इष्टिका न्यास पूजन करें.”   

धर्मादेश में कहा गया है, “न्यायपालिका की शीघ्र निर्णय की अपेक्षा धूमिल होते देख हमने विधायिका से अपेक्षा की और 27 नवंबर, 2018 को परम धर्मादेश जारी करते हुए भारत सरकार एवं भारत की संसद से अनुरोध किया था कि वे संविधान के अनुच्छेद 133 एवं 137 में अनुच्छेद 226 (3) के अनुसार एक नई कंडिका को संविधान संशोधन के माध्यम से प्रविष्ट कर उच्चतम न्यायालय को चार सप्ताह में राम जन्मभूमि विवाद के निस्तारण के लिए बाध्य करे.” उन्होंने कहा, “लेकिन बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि संसद में पूर्ण बहुमत वाली सरकार ने राम जन्मभूमि के संबंध में कुछ भी करने से इनकार कर दिया. वहीं दूसरी ओर, इस सरकार ने दो दिन में ही संसद के दोनों सदनों में आरक्षण संबंधित विधेयक पारित करवाकर अपने प्रचंड बहुमत का प्रदर्शन किया था.”

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