केजरीवाल मिला तो ये अम्मा बहुत पीटेगी

याद है 90 साल की आसमा खातून. याद नहीं है ना. शायद उनकी उम्मीद से भरी और मोतियाबिंद से ढंकी अंदर घुसी हुई झुर्रीदार आंखें याद होंगी. याद आया ? अरे भाई ! जितना आज मीडिया पर सुशांत सिंह राजपूत की चर्चा है, उतनी ही चर्चा उनकी हुआ करती थी. आपको याद नहीं आया होगा क्योंकि आप तो उन्हें शाहीनबाग की दबंग दादी के नाम से जाना करते थे.

वही दबंग दादी जो बिहार के सीतामढ़ी के रायपुर से दिल्ली आई तो अपने पोते का मुंह देखने थीं लेकिन सीएए के खिलाफ जंग और दोयम दर्जे की नागरिकता के फैसले के खिलाफ अपनी उम्र और सेहत की परवाह किए बगैर जम गई थीं. आज पता चला कि वो बीजेपी की एजेंट थीं और दिल्ली के चुनाव में केजरीवाल को हराने के लिए शाहीन बाग पर धरना दे रही थीं.

जी हां आम आदमी पार्टी यही आरोप लगा रही है. उसके मुख्य प्रवक्ता सौरभ भारद्वाज ने यही आरोप लगाया है. दबंग दादी ही नहीं. जो शगुफ्ता हवन में आहूति डाल रही थी और और मंत्र जाप कर रही थी ना. वो भी अमित शाह की एजेंट थी और कलमा पढ़ने वाली शिवानी भी वहीं बीजेपी हैडक्वाटर से आई थी.

लेखक गिरिजेश वशिष्ठ वरिष्ठ पत्रकार हैं. टीवी, इंटरनेट और अखबार की पत्रकारिता में वो अपना लोहा मनवा चुके हैं. नॉ़किंग न्यूज़ के सलाहकार भी हैं

सौरभ भारद्वाज बताएंगे कि कि वो सिख जो अपना मकान बेचकर लंगर लगा रहा था वो भी बीजेपी का एजेंट था ? वो भी एजेंट था जिसने प्रदर्शन के आगे बढकर धरने के खिलाफ वो भी एजेंट थे जो अपना काम धंधा छोड़कर वहां रोज जाकर जम जाते थे. कविता पाठ करते थे. पुस्तकों का पाठ करते थे.

शाहीन बाग इन नेताओं के लिए इसलिए डरावना है क्योंकि इनकी कमर्शियल राजनीति के फेर से दूर जनता की आवाज आज़ादी से उठ रही है और वो खुलकर बिना किसी बिकाऊ और मौकापरस्त बैसाखी के खड़ी हो रही है. ऐसी बैसाखियां इस आंदोलन से सबसे ज्यादा विचलित है.  

सिर्फ आम आदमी पार्टी को इस बात से तकलीफ नहीं है कि लोग बिना रानजीति  के सहारे खुद कैसे खड़े हो गए. बल्कि जिस बीजेपी पर ये शाहीन बाग से जुड़ा होने का आरोप लगा रहे हैं उस बीजेपी का सबसे बड़ा मुस्लिम विरोधी चेहरा माने जाने वाले अमित शाह के अधीन आने वाली पुलिस तो कुछ और कहती है.

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माना कि साजिश बहुत गहरी थी तो दिल्ली पुलिस ने शाहीन बाग के आसपास के रास्ते बंद करके धरने को बदनाम करने की कोशिश क्यों की.  माना कि ये भी साजिश का हिस्सा था तो जब चुनाव हो गए, सरकार बन गई तब छांटछांट कर शाहीन बाग के कार्यकर्ताओं को पुलिस क्यों निशाना बना रही है.

सौरभ भारद्वाज भुला देना चाहते हैं कि जब लॉक डाउन चल रहा था. लोगों के सड़क पर निकलने पर रोक थी तब दिल्ली में पुलिस घर घर जाकर शाहीन बाग के लोगों को उठा रही थी.

आम आदमी पार्टी क्यों नहीं बताना चाहती कि ईस्ट दिल्ली के दंगों में जो पुलिस कार्रवाई हो रही है उसमें ढूंढ ढूंढ कर शाहीन बाग का कनैक्शन निकाला जा रहा है. और तो और जो भी सामाजिक कार्यकर्ता , पत्रकार साहित्यकार शाहीन बाग के आंदोलन से जुड़े थे और वहां धरने पर जाक समर्थन देते रहे उन्हें आजतक निशाना बनाया जा रहा है. यहां तक कि उनके मोबाइल तक दिल्ली पुलिस ने जब्त कर लिए हैं.

इस इलाके से जो जो शाहीन बाग गया था वो दंगे में और दंगे के पीछे शाहीन बाग की साजिश. पूरी ताकत से बीजेपी जिस शाहीन बाग को कुचलने में लगी है. धरना खत्म होने के बाद भी जिसे दो पल का चैन नहीं है वो शाहीन बाग की मास्टर माइंड थी.

दरअसल शाहीन बाग का एक एक्टिविस्ट बीजेपी में शामिल हो गया. और ये समीकरण आप को खाये जा रहा है. आप की समस्या ये है कि उसके बड़बोले विधायक अमानतुल्ला खां का वोटबैंक इसके जाने से खिसक रहा है. खिसकने की वजह ये भी है कि चुनाव की चिंता में बीजेपी शाहीन बाग की समस्याओं से मुंह चुराती रही. अमानतुल्ला खां पर्दे के पीछे तो आंदोलन के साथी होने का दावा करते रहे लेकिन आंदोलन पर चुप रहे.

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अब जब शाहीन बाग में बीजेपी की घुसपैठ हो रही है तो अमानतुल्ला खां बेचैन हैं. उनकी बेचैनी केजरीवाल की बेचैनी है. अमानतुल्ला उन लोगों में से हैं जिनके लिए केजरीवाल ने कुमार विश्वास को छोड़ दिया.

दरअसल बीजेपी की जो हिंदुत्ववादी गंगा बह रही है उसमें बह जाने को केजरीवाल बेताव है. उनकी हर हरकत और हर कदम में हिंदू विरोधी करार दिए जाने का खौफ दिखाई देता है. केजरीवाल हनुमान चालीसा पढ़ते हैं. जन्मदिन पर हनुमान मंदिर जाने लगे हैं. केजरीवाल की सरकार ने पूरा निजामुद्दीन मरकज़ कांड खड़ा कर दिया. मरकज की इमारत में सैकड़ों लोग बंद थे. उन्हे जाने की इजाजत नहीं थी क्योंकि लॉकडाउन था. उस समय कोरोना विदेशों से आता था और मरकज में चालीस देशों के लोग थे. मरकज वाले इमारत खाली करना चाहते थे. उन्होंने बसों से लोगों को लॉक डाउन में घर भेजने की इजाजत मांगी और केजरीवाल सरकार ने मना कर दिया. जाहिर बात है एक इमारत में संक्रामक रोग वाले के साथ सैकड़ों लोगों को बंद कर देगे तो बीमारी फैलेगी ही. लेकिन केजरीवाल ने इसलिए बस नहीं दी कि कहीं कोई मुसलमानों का मददगार न कह दे.

दिल्ली के दंगे खुद केजरीवाल के मुख्यमंत्री रहते हुए. क्या सीएम और उनकी पार्टी के लोगों का फर्ज नहीं बनता था कि पीड़ित इलाकों में जाते और लोगों के दुख दर्द सुनते. क्या केजरीवाल का फर्ज नहीं बनता था कि आम आदम पार्टी की एक जांच टीम भेजती और सच पता लगाती कि सचमुच दिल्ली पुलिस की जांच सही है या साजिश है.

केजरीवाल भले ही बीजेपी पर आरोप लगा रहे हैं लेकिन शाहीन बाग को बदनाम करने की उनकी भी इच्छा उतनी ही मजबूत है जितनी बीजेपी की. वो खुद शाहीन बाग को जिंदा देखना नहीं चाहते. वो खुद चाहते हैं कि शाहीन बाग की शान में दाग लगे रहें. उनका रवैया बीजेपी की बी टीम वाला है. लगता है सब मिले हुए हैं जी.