जानिए कैसे सीबीएसई के इम्तिहान में 71 साल से फेल हो रही है सरकार

सीबीएसई का रिजल्ट आ गया है. बच्चे तनाव में है. कुछ जान भी दे देंगे. उन्हें एहसास रहेगा क काबिल नहीं थे कि किसी कॉलेज या यूनीवर्सिटी में एडमिशन ले पाते. लूट की यूनीवर्सिटीज में एडमिशन के लिए पैसे न हो पाने के कारण बहुत से पेरेन्ट अवसाद का शिकार हो जाएंगे, कोई बच्चा स्कूल छोड़ देगा तो कोई अपने जीवन को अंधकार में समझने लगेगा.

कभी आपने सोचा कि आपका बच्चा अगर एडमिशन नहीं पा सका तो इसमें उसका कसूर नहीं है. दिल्ली के एक कॉलेज में पिछले दो साल से उन बच्चों को एडमिशन नहीं मिलता जिनके 100 फीसदी नंबर नहीं होते. क्यों ? आज जब 80 फीसदी वाले बच्चे एडमिशन नहीं ले पा रहे तो किसका दोष है ?

कल्पना कीजिए कि अगर सभी बच्चे 100 फीसदी नंबर ले आएं तो क्या सभी को एडमिशन मिल जाएगा ? अगर जवाब है कि सबको नहीं मिल सकता तो इसमें बच्चे , स्कूल या बच्चों के पेरेन्ट का कोई कसूर कैसे हो सकता है. जाहिर बात है कि कसूर किसी और का है. कसूर उनका है जो इस देश की नीतियां बनाते है. कसूर उनका है जो भारत की आज़ादी के 70 साल बाद भी देश के सभी बच्चों के लिए शिक्षा का इंतजाम नहीं कर सके. वो बच्चों को नंबर गेम में फंसाकर उलझा देते हैं और अपनी कमतरी के एहसास को बच्चों और पेरेन्ट्स के सिर डालते हैं.

अब में आपको आंकड़ों की खबर दूं. भारत में बच्चों की शिक्षा के लिए न तो स्कूल पूरे हैं न कॉलेज. ये हाल तब है जब क्यूबा जैसे छोटे देश में भी किसी को अपने एडमिशन की चिंता करने की ज़रूरत नहीं होती. ये हाल तब है जब जर्मनी जैसे देश में नागरियों को करीब करीब मुफ्त शिक्षा मिलती है. वहां स्कूल की फीस नहीं देनी होती. बच्चों को सिर्फ रहने और खाने का खर्च देना होता है वो भी सब्सिडी पर बेहद मामूली दाम में. हमारे देश में सब्सिडी खत्म करने की कोशिश हो रही है. जहां मिलती है वहां के छात्रों को अपमानित किया जाता है और सरकार का ध्यान लूट का अड्डा बनी प्राइवेट यूनीवर्सिटीज पर है जो छात्रों की हाजिरी बहाने बहाने से कम करके उन्हें एक क्लास में दो साल घसीटती हैं ताकि दुगुनी फीस वसूली जा सके. इस जगहों के पढ़ाई के स्तर पर बाद में कभी बात करेंगे.

सिर्फ जर्मनी ही नहीं दुनिया के ज्यादातर सभ्य देशों से भारत कही पिछड़ा है. हमारी सरकार उस अमेरिका की नकल करने मे लगी है जिसकी खुद की हालत शिक्षा और रोज़गार के मामले में खस्ता है.

भारत में पढ़ाई और रोज़गार एक दूसरे से जुड़े हुए हैं. इसलिए रोज़गार की बात करना लाजमी है. पकौड़े और पंक्चर को रोजगार मानने पर ज़ोर दे रही मोदी सरकार को अगर माफ भी कर दिया जाए तो आज भारत में नरेगा और मनरेगा जैसी योजनाओं के आंकड़ों के बावजूद पूरे 55 फीसदी लोगों के पास भी रोज़गार नहीं है. रोज़गार का मतलब व्यापार , खेती, नौकरी सब है.

एक तरफ दुनिया के चीन और जर्मनी जैसे देश 80 फीसदी तक आबादी को रोज़गार दे रहे हैं और स्कूल में रहते ही बच्चे की नौकरी का इंतज़ाम कर देते हैं यहां सरकार उन बच्चों को अयोग्य होने का सर्टिफिकेट बांटती है जिन्हें वो अपनी अयोग्यता के कारण रोज़गार नहीं दे सकती.

सरकार मुर्गो की लड़ाई की तरह कंपटीशन कराती है क्योंकि उसके पास रोज़गार मुट्ठीभर हैं और उसकी नीतियों ने बेरोज़गारों की बड़ी फौज खड़ी कर दी है. उनसे इस समस्या से निपटने के लिए एक एक सर्वमान्य फॉर्मूला गढ़ लिया है. ये फॉर्मूला कहता है आपस में लड़ो जो बच गए वो काबिल माने जाएंगे और बाकी “अयोग्य” .

इस फॉर्मूले को कंपटीशन का नाम दिया गया है. मजबूर बच्चे इस कंपटीशन का शिकार हो जाते हैं यहां भी सब अयोग्य नहीं हैं बल्कि नौकरियां सबको देने की हालत में सरकार नहीं है.

दरअसल भारत को सबके लिए शिक्षा और सबके लिए काम देने का लक्ष्य लेकर काम करना चाहिए. वो इस समस्या को दूर करने के बजाय रोज़गार के साधन खत्म कर रही है. सरकार ने निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने का फॉर्मूला अपनाया है. देश के नागरिकों का हक का पैसा अमीरों की तिज़ोरी में बहाने बहाने से भरा जा रहा है. कभी उसे टैक्स हॉलीडे का नाम देते हैं तो कभी सब्सिडी का . माना जाता है कि ये लोग कारोबार करेंगे तो रोज़गार बढेगा. कारोबार तो तब चलेगा ना जब ग्राहक की जेब में पैसे होंगे. पैसे तो पहले ही कारोबार में लगाने की जगह इधर उधर कर दिये जाते हैं.

खैर अब जब फिर से अगली साल कुछ बच्चे सरकार के इमोशनल टॉर्चर का शिकार हों तो याद रखिएगा कि फेल बच्चे नहीं हो रहे. फेल सरकार हो रही है. देश हो रहा है. अपने प्यारे बच्चे को कसूरवार मानने और उस पर हाथ उठाने से पहले आवाज़ उठाइएगा. अपने देश से मांगिएगा- सबको शिक्षा सबको काम. (पत्रकार गिरिजेश वशिष्ठ की फेसबुक वॉल से)